यूआईडीएआई भी राजनीतिक ढंग से काम करेगा, आप तो पेशेवर दिखते..

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-संजय कुमार सिंह||

एक पत्रकार को जबरन 60 दिन हिरासत में रखने के मामले में अभी ठीक से चर्चा भी नहीं हुई और पत्रकार को परेशान करने का एक और मामला सामने आ गया। पिछली बार भक्त पत्रकारों ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि भाजपा सरकार के निशाने पर आए बीबीसी और अमर उजाला के लिए काम कर चुके पत्रकार विनोद वर्मा गैर पत्रकारियों कामों में गिरफ्तार हुए थे। मैं नहीं मानता पर अभी वह मुद्दा भी नहीं है। लेकिन इस बार एक सरकारी विभाग (जो राज्य किसी राज्य सरकार की तरह राजनीतिक बुद्ध से ही नहीं चलता होगा) ने ऐसा ही किया है। यह मानने वाली बात नहीं है कि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने सरकार में बड़े लोगों से इजाजत लिए बगैर उसके खिलाफ रिपोर्ट करने वाली महिला पत्रकार के खिलाफ एफआईआर लिखा दी होगी। वो भी तब जब यूआईडीएआई ने खुद दावा किया है कि जो हुआ वह कोई बड़ी बात नहीं है, कुछ लीक नहीं हुआ, सब कुछ सुरक्षित है।

दूसरी ओर, यूआईडीएआई के चंडीगढ़ क्षेत्रीय कार्यालय ने ट्रिब्यून के संपादक को पत्र लिखकर पूछा है कि, “आपके संवाददाता के लिए (खरीदे गए यूजर आईडी और पासवर्ड से) क्या किसी व्यक्ति के फिंगर प्रिंट और आइरिस स्कैन देखना या प्राप्त करना संभव हुआ और संवाददाता ने उक्त यूजर आईडी और पासवर्ड से डाले और ये आधार नंबर किसके थे।” पत्र में कहा गया है कि ये विवरण 8 जनवरी तक भेज दिए जाएं वर्ना यह माना जाएगा कि किसी फिंगर प्रिंट और / या आयरिश स्कैन को ऐक्सस नहीं किया जा सका। खबर करने वाली रिपोर्टर का नाम एफआईआऱ में डालने और उसके अफसर से पत्र लिखकर उपरोक्त विवरण मांगने का एक मकसद जो समझ में आता है वह यह कि अफसर कह दे कि कोई डाटा नहीं मिला (फिर रिपोर्टर कहती रहे, क्या मतलब?) और उसपर एफआईआर का डंडा है ही – मुकदमा झेलो।

यह सरकार की कार्यशैली है। कानून की धमकी दिखाकर कहलवा लो डाटा मिला ही नहीं और नहीं कहे तो परेशान करके दूसरों को धमकाओ। मामला क्या है? उसका क्या होगा – सब बाद की बातें हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि रिपोर्ट ने जो किया वह अपने आरोप को पक्का करने के लिए किया। अपना काम किया – यह अपराध नहीं है। अब उससे लिखित में स्वीकार करवाकर यूआईडीएआई कानून के तहत अपराध बनाने की कोशिश कर रहा है जो पद का दुरुपयोग है। मामले को दूसरी ओऱ ले जाना है। पर सैंया भये कोतवाल तो यह सब कोई नहीं देखता है। जब यूजर आईडी और पासवर्ड खरीद लेने के बाद यूआईडीएआई नहीं मान रहा है कि डाटा लीक हुआ तो इसके बिना वह कुछ मान लेता – यह सोचना भी बेवकूफी है। हो सकता है, रिपोर्टर को यह अनुभव हो इसलिए उसने यह सब किया हो। पर उसे ही फांस लेना बेशर्मी है।

बात इतनी ही नहीं है। इस मामले पर खबर करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, यूआईडीएआई की मीडिया यूनिट ने संडे एक्सप्रेस की कॉल और टेक्स्ट मैसेज का जवाब नहीं दिया। यूआईडीएआई के सीईओ ने संपर्क करने पर कहा कि वे मीटिंग में हैं। मीटिंग घंटे दो घंटे चली होगी उसके बाद भी अखबार को यह नहीं बताना कि वे क्या कर रहे हैं क्यों कर रहे हैं और पत्रकार के खिलाफ एफआईआर – बताता है कि वे बातें कम काम ज्यादा में यकीन करने का दिखावा कर रहे हैं क्योंकि पहली चूक स्वीकार किया जा चुका है। अधिकारियों का यह रवैया तो समझ में आता है पर सरकार? वह खुद को क्या समझने लगी है? कहने की जरूरत नहीं है कि यूआईडीएआई को दि ट्रिब्यून और उसकी रिपोर्टर का अहसानमंद होना चाहिए कि उसने एक गड़बड़ी का पुख्ता सबूत दिया। पर अधिकारी उलटे उसी को परेशान करने में लगे हैं।

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