टूजी घोटाला : सरकार और मंत्री के विवेक पर कुछ छोड़ना ही होगा..

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संजय कुमार सिंह॥
टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। सीबीआई अदालत में यह घोटाला साबित नहीं हुआ और सीबीआई ने यह कहा बताते हैं कि इस मामले को उच्च अदालत में चुनौती दी जाएगी। इसलिए यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है लेकिन इस पर खूब लिखा जा रहा है। और दोनों तरफ से लिखा जा रहा है। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है जिनकी राय में यह घोटाला है। ऐसे लोगों की राय में आरोपियों का छूट जाना सामान्य नहीं है और दूसरी ओर, ऐसे लोग भी हैं जो इसे घोटाला मानते ही नहीं हैं। मुझे भी लगता है कि इसे घोटाला मानना सरकार या मंत्रियों के निर्णय लेने की क्षमता को चुनौती देना है।

मोटे तौर पर मूल मुद्दा यह है कि पहले जिस काम या जो सेवा मुहैया कराने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती थी वह तकनीक की उपलब्धता के कारण अब कम खर्च और निवेश में उपलब्ध कराया जा सकता था। भविष्य में इस तकनीक की देश के लिए उपयोगिता थी और सरकार के पास उसके उपयोग का अधिकार बेचने या बांटने का अधिकार था। जनहित का ख्याल रखते हुए इसे सुपात्रों को मुफ्त दिया जा सकता था (सुपात्रों के चयन में बेईमानी की गुंजाइश थी) या भुगतान करने की क्षमता का ख्याल रखते हुए इसे बेचा जा सकता था। तीसरा विकल्प इसे बेचकर (देश के लिए) अधिकतम कमा लेने का था। सरकार ने दूसरे विकल्प का चुनाव किया और उस समय के सीएजी ने तीसरे विकल्प से प्राप्त हो सकने वाली राशि को प्राप्त राशि में घटा कर बाकी को घोटाले की रकम या घाटा बताया।

मोटा-मोटी मामला यही है और यह नीति से जुड़ा मामला है। वैसे ही जैसे सरकार अभी तक रेलवे को जनसेवा का साधन मानती थी और न्यूनतम संभव किराए में रेलवे का परिचालन किया जाता था। कोशिश रहती थी कि कमाई माल भाड़े से हो जाए पर यात्री किराया न्यूनतम रखा जाए – जनता की सुविधा के लिए। इसमें विकलांगों, मरीजों, बच्चों और बुजुर्गों को छूट शामिल है। देश में आम आदमी के लिए आवा-जाही का साधन मुख्य रूप से रेल है और इसे किसी प्रतिस्पर्धा का सामना भी नहीं करना है। इसलिए रेलवे चाहे जो किराया रखे, विकलांगों को छूट देने की बजाय उनसे प्रीमियम वसूले – कौन मना कर सकता है। अगर यह सब सरकार नहीं कर रही होती और उसे वोट नहीं लेना होता तो कौन गरीब और विकलांग की परवाह करता। कमाने वाले कमाते ही हैं। पर जनसेवा मानकर रेलवे को (राज्य परिवहन की बसों को भी) सस्ता रखा जाता है।

अब कोई कहे कि सस्ता रखने में घोटाला है, राजस्व का घाटा हो गया – तो होता ही है। सरकार इसीलिए होती है और इसी से अगली बार जीत कर आती है। ये मामले जनता की अदालत में तय होने वाले हैं, अदालतों में नहीं। पर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के ऐसे ही मामले को अदालत में चुनौती दी गई। अदालत का फैसला आ गया है। उसपर टीका टिप्पणी बेकार है। अदालत की अवमानना है। इसका असली फैसला जनता की अदालत में होगा। मीडिया का काम था इस मामले को निष्पक्ष रूप से जनता के समक्ष रखना पर मीडिया ने इसमें मौका देखा, टीआरपी और मुफ्त में जगह भरने या समय निकालने का मौका देखा। उसका नुकसान उसे है। उसकी साख खराब हो चुकी है। सरकार का काम था कि वह आम आदमी को पढ़ा-लिखा समझदार बनाती। उसने नहीं बनाया। उसका नुकसान उसे हुआ। एक फर्जी घोटाले को मुद्दा बनाकर उसे चुनाव में हरा दिया गया। हालांकि यूपीए की हार सिर्फ इस एक मुद्दे से नहीं हुई है। पर वोटर और भक्तगण जितने समझदार और अक्लमंद हैं उसके लिए जो जिम्मेदार है उसे उसका फल भुगतना ही होगा।

इस मामले को बेहतर समझने के लिए विकीपीडिया के पेज देखिए। हिन्दी का पेज ज्यादा दिलचस्प है। उसपर लिखा है, “यह लेख विषयवस्तु पर व्यक्तिगत टिप्पणी अथवा निबंध की तरह लिखा है। कृपया इसे ज्ञानकोष की शैली में लिखकर इसे बेहतर बनाने में मदद करें। (मई 2015)।” मैंने तो इसे आज देखा लेकिन इस सूचना के साथ मई 2015 पहले से लिखा हुआ है। अगर यह तभी से है जो विकीपीडिया ने मई 2015 में वही कहा था जो सीबीआई अदालत ने अब कहा है। जो लोग अंग्रेजी औऱ हिन्दी दोनों पढ़-समझ सकते हैं वो 2जी घोटाले पर विकीपीडिया के अंग्रेजी और हिन्दी के पन्ने को पढ़ लें। अंग्रेजी हिन्दी का अंतर तो समझ में आएगा ही अंग्रेजी वाले से यह समझ में आ जाएगा कि 2जी घोटाला क्यों घोटाला नहीं है। हालांकि, अंग्रेजी या हिन्दी में जो लिखा है वह शुरू से ऐसा ही नहीं है। इसका संपादन सीबीआई का फैसला आने के बाद किया गया गया है।

हिन्दी में विकीपीडिया के पेज पर कहा गया है, “केंद्र सरकार के तीन मंत्रियों जिनको त्याग करना पड़ा उनमे सर्वश्री सुरेश कलमाड़ीजी जो कि कामनवेल्थ खेल में 70,000 हजार करोड़ का खेल किये। दुसरे महारास्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हद जिनको कारगिल शहीदों के लिए बने आवास में ही उलटफेर किया। तीसरे राजा साहब जिन्होंने 1 लाख 76 हजार करोड़ का वारा न्यारा किया। इस प्रकार राजा द्वारा किया गया घोटाला स्वातंत्र भारत का महाघोटाला होने का कीर्तिमान स्थापित किया।” इसमें वर्तनी से लेकर भाषा शैली तक नोट करने लायक है।

आइए, अब अंग्रेजी वाले पेज से शुरू की लाइनें लेते हैं – The 2G spectrum loss is a scam colluded by politicians and govern officials under the United Progressive Alliance (Congress) coalition government. On 2 February 2012, Supreme Court of India ruled on a public interest litigation (PIL) related to the 2G spectrum allocation. The court declared the allotment of spectrum “unconstitutional and arbitrary”, cancelling the 122 licenses issued in 2008 under A. Raja (Minister of Communications & IT from 2007 to 2009), the primary official accused. According to the court, Raja “wanted to favour some companies at the cost of the public exchequer” & “virtually gifted away important national asset[s].”
अंग्रेजी में घोटाले के बारे में जो भी कहा गया है वह अदालत के हवाले से है जबकि हिन्दी में लेखक की राय है, सूचना नहीं। यहां याद आ रहा है कि बचपन में मां कहा करती थी, अगर कोई कहे कि कौवा कान ले गया तो कौवा के पीछे दौड़ने से पहले अपना कान देख लेना चाहिए। यहां हम सब कौवा के पीछे दौड़ते रहे। ये नहीं देखा कि कान तो सही सलामत है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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