नीलोत्पल मृणाल ने फ़ेसबुक पर जिग्नेश मेवानी को लिखा खुला ख़त..

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जिग्नेश मेवानी,

सॉरी! तुमने अचानक से निराश किया।तुम्हें ताज़ा ताज़ा आज तक न्यूज़ के एक कार्यक्रम में सुना।अच्छा नही लगा। साथी एक तो मुझ साधारण को जिसे बमुश्किल कुछ सौ दो सौ लोग एक दो कारणों से जानते होंगे,उसमें भी सारे नही भी। पर जितने जानते होंगे उसमें भी आधे आज से मुझे, संघी हो गए बोल गरियायेंगे और आधे, बोलो देखा युवाओं का ये टुच्चा चरित्र,ये बोल गरियायेंगे।यानि मेरा पूरा मार्केट ख़त्म । न इधर का था न उधर का रहूँगा।इस मूल्यवान फेसबूकिया नुकसान के बावजूद भी जो दिल कह रहा है वो लिख रहा हूँ जिग्नेश।

मुझ जैसे मामूली को जितने लोग भी पढ़ते हैं वो जानते हैं मैं 10 पोस्ट लिखूं तो कभी कभी सारे मोदी जी के भाषणों,उनकी नीतियों,उनके तमाम आडंबरों के विरुद्ध में होते हैं। मुझे हर मोदी जी विरोधी नेता और आलोचक या पत्रकार आकर्षित कर ही लेता है पहले नजर में। जाहिर है कि तुमने भी किया।

पर इसके बावजूद जब मैंने तुम्हे उस इंटरव्यू में सुना तो सोंच में पड़ गया साथी। लगा कि सरकार के छोटे छोटे यहां तक कि संबित जैसे वायरस के एक बयान पर भी लिखता मरता रहता हूँ, अगर आज तुम्हारे अंदाज़ और बयान को यूँ ही जाने दिया तो दुनिया मुझे बाद में समझेगी, मैं पहले खुद समझ जाऊंगा कि भयंकर खोट है मुझमें। आत्मा धक्का दे मुझे मेरे दोहरे चरित्र पर सवाल करने लगी जिग्नेश मेवानी तब जा के लिख रहा हूँ।

भई जिग्नेश अभी अभी राजनीति ने तुम्हे एक जमीन दी है वो भी ठोस जमीन। अभी अभी एक सम्भावना बने हो युवा राजनीति के भविष्य की। ऐसे में हम जैसे साधारण युवा की भी नजर रहती है तुम्हारे ऊपर और ये रूचि भी रहती है कि सत्ता के विरुद्ध एक सशक्त विपक्ष बन के उभरो तुम सब साथी।

लेकिन ये क्या जिग्नेश मेवानी? कैसे तेवर हो गए? कैसी भाषा का इस्तेमाल?इतना उथलापन? इतना हल्कापन?तुमने कहा, मोदी बोरिंग हो गया उसे हिमालय भेजो हड्डी गलाने। वो गया अब, बहुत बोरिंग है। मानसिक रूप से बूढ़ा है। कुछ नही। उसे कोई नही सुनता। उसके पास कंटेंट नही।

तुम्हारे द्वारा इन कहे बातों में भाषायी तौर पर बहुत बड़ा अपशब्द कुछ भी नही। और आज की राजनीति में तो एकदम मान्य और शानदार शब्द थे। पर ये बताओ साथी कि जिस मोदी जी से तुम्हे ये शिकायत है उनके पास कंटेंट नही तो फिर उसी मोदी जी के विरुद्ध तुम क्यों बिना कंटेंट के दो कौड़ी के बोल बोलते गये। अभी अभी चुनाव जीत के आया जिग्नेश क्या देश के pm की नीतियों के विरुद्ध इसी कंटेंट से लड़ेगा कि मोदी हिमालय जा हड्डी गला ले और बड़ा बोरिंग है अब मोदी जी।

राजनीति में क्या जनता फिल्म के मजे लेने बैठी है?क्या ये जो संबित बनाम कन्हैया वाला मजेदार वीडियो है, यही है नयी राजनीति का विकल्प? क्या युवाओं की वैकल्पिक राजनीति संबित का जवाब संबित बन कर देंगी?

क्या अब हम जनता ये देखें कि राजनीति में कौन बोरिंग है और कौन मस्ती भरा नेता है जो अपने जबान से हमे मुफ्त में कॉमेडी सर्कस दिखायेगा। ये सब वायरल वीडियो बुखार का नशा तो नही न जिग्नेश?
देश ने कई फिल्में देखी हैं। मजेदार कलाकार देखे हैं।पर उनको देश नही सौंपा। जब सौंपा तो झेल भी रही है।

तुमने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए जब कहा, मैं हूँ दिलचस्प, देखो मुझे जनता कितना चाहती है।
जब मैंने ये सुना तो बुजुर्गों की बात पर फिर पुख्ता यक़ीन हुआ कि कुछ चीज़ें उम्र से पहले आ ही नही सकतीं वरना कम से कम इतना बचकाना बयान कोई वैसा नया चर्चित युवा नेता कतई नही देगा जो खुद मीडिया की गोदी में हो दिन भर।
तुमने कॉलर पर हाथ रख के जिस तरह अपने विधायक बन जाने की बात को 3 बार दुहराया और एक बार कहा कि, देखो हमारी जीत, उन्नीस हज़ार से जिताया जनता ने तो ये बयान पिछले से भी ज्यादा छिछले अंदाज़ में कहा गया दिखा साथी।तुम खुद बोल के शर्मिंदा दिख रहे थे। साथी मेरे इलाके में पचास हज़ार वोट से जीते विधायक हैं, कोई नही जानता उनको इलाके से बाहर। साथी, विधायकी राजनीति के पीठ की धूल बराबर है। विधायक देश नही बदला करते। अगर देश विधायक से बदलना होता तो यहां 40120 विधायक हैं पुरे देश में भाई जिग्नेश। अभी तक तो ग्लोरियस क्रांत्ति हो जानी थी, पर हुई क्या?

भारत में हर दस गांव के बाद एक पूर्व विधायक भूंजा फांकता मिल जाएगा चाय दूकान में। दोस्त, देश विचार से बदलता है। अपने समय के दिए समाधान और किये संधान से बदलता है। और ये सब करने के लिए राजनीति करनी होती है विधायकी नही।
तुमने बड़े जोश में कहा कि, देश जिग्नेश मेवानी को,उमर खालिद,कन्हैया, शेहला को सुनना चाहता है।
नही मित्र, देश को समझो।
देश तुम लोगों या हम लोगों को अभी नही सुनना चाहता है, असल में मोदी जी इतना बोल चुके हैं कि वो देश अब कान बन्द कर किसी को नही सुनना चाहता है बल्कि अब राजनीती से जनता का कुछ ठोस काम चाहता है, कल्याण चाहता है।

लोकतंत्र देश को भाषण सुनाने का fm gold चैनल नही है मित्र। विकल्प बनो, देश ये चाहता है। इस देश ने लालू से लेकर मुलायम या नीतीश जैसे को आज तक इसलिए याद रखा क्योंकि ये जब राजनीति में उभर रहे थे तब ये विधायकी में जीत का मार्जिन नही बता रहे थे न दिलचस्प होने का दावा कर रहे थे न ही कोई अंजना ॐ कश्यप थी टीवी पर जहां ये मनोरंजक होने का टीवी शो चला करता था। तभी वीडियो के व्यू संख्या से राजनीति नही होती थी। जमीन पर समाधान देना होता था।मंडल बनाम कमंडल की स्पष्ट राजनीति थी, स्पष्ट रास्ते थे।

मेरे जैसा आदमी आज भी गाली सुन के भी अगर लालू यादव का फैन है तो इसलिए नही कि लालू जी ने हेमा मालिनी के साथ जोड़ी बना 7 हिट फिल्म दी थी।
चकोर चश्मा पहिन बुद्धिजीवी होने के गेटअप में जब तुमने अपने दिलचस्प होने के प्रमाण के तौर पर अंजना जी को शायरी सुनाई तो वो बेहद फूहड़ लगा।

और सुनो दोस्त, दुश्मन की ताकत को भी ईमानदारी पूर्वक स्वीकार करो।
मोदी जी चाहे जो हो बोरिंग नही हो सकते। इस आदमी ने इस देश के चुटकुला और व्यंग उद्योग को जितना माल दिया वो कोई दस बार जन्म ले भी न दे सकेगा। दूसरी बात कि ये आदमी मानसिक तौर पर तो कतई बुड्ढा नही हो सकता। मानसिक तौर पर तो वो खल्ली को पटक दे। और करोड़ की मशरूम खा कोई ख़ाक बूढ़ा होगा, ये अल्पेश से ही पूछ लो।

देखो साथी, बात बनाने की शाबाशी को आये हो तो समझो सफल हो अब तुम। कई लोग तुम्हे पीठ ठोकेंगे, और मुझे गाली भी देंगे। पर सच तो ये है कि आक अगर मोदी जी के आक्रोश में हम तुम्हारे व्यवहार को जायज़ ठहरा दें तो ये असल में फिर मोदीमय राजनीति ही गढ़ना होगा जिसमें चेहरे बदलते जायेंगे पर राजनीति बतोली और जुमलेबाज़ ही रह जायेगी। तुम मेरे जैसे साधारण नही हो, बड़ी सम्भावना हो। तो बड़ा दिखो भी। एक पल भी ढीला होना भविष्य को खोना है। आज की राजनीति गिर गयी तो जाने दो, तुम गिरे तो दुःख होगा क्योंकि वो भविष्य की भी राजनीति का गिर जाना होगा।

जो लोग तुम्हारी आज पीठ ठोंक रहे होंगे, उन्हें सामने बस मोदी दिख रहे। भविष्य का समाधान मांगने वाली जनता तुमसे गम्भीर मिज़ाज मांगेगी।क्योंकि नमूने गिरी करने को नेताओं की कमी नही जो लोग जिग्नेश का शो देखने को जान लगा देंगे।अकेले संबित और नरेश अग्रवाल,योगी और तेजप्रताप जैसे लोग काफी हैं।

देखो हमारी पीढ़ी ने कन्हैया कुमार को खो दिया जब वामपंथी धारा ने उसे अपना संबित बना के खर्च कर दिया। हम नही चाहते कि तुम विधायकी की बीड़ी फूंकने में विचारों की मशाल बुझा लो।

निर्णय तुम्हारा है, कि तुम विधायक सांसद होना चाहते हो या सच में युवाओं की राजनीति के नेता। क्योंकि तुम्हारी उम्र के सैकड़ों विधायक हैं इस देश में। जरुरत इस उम्र के नेता की है दोस्त।नफरत के इस दौर को प्यार से जीतो। आक्रोश को पिघला कर विचार बनाओ। उसे तपा कर लोहे का सरिया बना दो जो सत्ता की कुर्सी में छेद कर भेद जाये।

पर मुझे पता है मेरे कहे किसी भी बात का तुम्हारे लिए कोई मतलब नही रह जायेगा जब तुम्हे ये पता चलेगा कि नीलोत्पल मृणाल सवर्ण में पैदा हुआ था और तुम्हे लोग झकझोर के बताएँगे कि तुम तो दलित नेता हो। जय हो।

नीलोत्पल मृणाल

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