तो क्या जीत सभी नाजायज को जायज बना देगी..

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-प्रशांत टण्डन॥

गुजरात के चुनाव में काफी कुछ दांव पर लगा था मोदी और अमित शाह का – केवल इन दोनो का ही नही इनके दोस्तो का भी. जो दांव पर लगा था वो राजनीतिक नफा नुकसान और प्रतिष्ठा से ज्यादा मुश्किल में डालना वाला था.

चुनाव हार जाते तो 2002 के कत्लेआम की जांच, एहसान जाफरी का कत्ल, इशरत जहॉ, सोहराबउद्दीन, कौसर बी जैसे एनकाउंटरों की जांच के तमाम पहलू और सबूत जो अदालत तक नही पहुंचे शायद उजागर होते और इंसाफ का पक्ष मज़बूत होता. अमित शाह द्वारा एक महिला का पुलिस के ज़रिये पीछा करने की ऑडियो रिकार्डिंग सामने आ चुकी है पर गुजरात की पुलिस फाइलो में इस वारदात और न जाने कितनी ही ऐसी घटनाओं के सुराग दफ्न हो. राज्य में कांग्रेस की सरकार आती तो ये कहना मुश्किल है कि वो इन मुद्दो या जांच में कितनी दूर तक जाती – लेकिन ये ख्याल ही इन दोनो में सिहरन पैदा करता रहता होगा कि इन फाइलो को और भी कोई देखेगा.

अंबानी और अडानी का भी ज्यादातर करोबार गुजरात में ही है. राहुल गांधी के भाषणो से टाटा भी परेशान हुये होंगे.

लिहाजा कोई कसर नही छोड़ी गई होगी कि किसी भी तरह सरकार बचानी है. जो सामने दिखा वो हार्दिक की सीडी, मोदी के पाकिस्तान की साजिश जैसे बयान, जिग्नेश के खिलाफ साजिश जैसे तमाम हथकंडे थे पर जो परदे के पीछे हुआ होगा वो इससे कही ज्यादा होगा.

चुनाव आयोग एक तरफा रहा..सवर्ण मीडिया तो है ही इनकी गोद में.

ईवीएम और कांग्रेस:
उत्तर प्रदेश के नतीजो के बाद मायावती और अखिलेश यादव ने ईवीएम से छेड़छाड़ का मुद्दा उठाया. नुकसान कांग्रेस को भी हुआ लेकिन पंजाब ने भरपाई कर दी – वहॉ केजरीवाल ईवीएम पर बोले. पंजाब की जीत ने ईवीएम पर कांग्रेस के पैर वापिस खीच लिये.

गुजरात के चुनाव में कांग्रेस ने ईवीएम को मुद्दा बनाया लेकिन नतीजे ऐसे आये कि कांग्रेस एक बार फिर इस पर चुप हो जायेगी. कांग्रेस क्या तमाम वो लोग जो ईवीएम पर संदेह करते रहे है वो हार जीत के आंकड़ो पर व्याख्या करते नज़र आयेंगे.

बहुत होशियारी से कांग्रेस को ईवीएम की बहस से हटा दिया गया है.

न गंगास्नान से सभी पाप कट जाते और न ही चुनाव की जीत नाजायज को जायज बना देती है. गुजरात के चुनाव में जो गंदगी सामने आई है, चुनाव आयोग की निष्पक्ष भूमिका पर सवाल खड़े हुये है और ईवीएम पर लगातार संदेह बढ़ा है – इन सभी मुद्दो पर लगातर बहस और पड़ताल की ज़रूरत है और इन बीमारियों का ईलाज भी ढूढ़्ने की भी.

सोचने समझने वाला तबका और विपक्षी पार्टियॉ गुजरात के नतीजो के राजनीतिक विश्लेष्ण में पड़ गई तो इन्हे अंदाज़ नही है कि 2019 में क्या होगा. क्या पता गुजरात उसी का ड्रेस रिहर्सल हो.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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