न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए, भूल गई न्यायपालिका.?

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नदीम एस. अख़्तर॥

भारतीय गणराज्य के एक नागरिक के रूप में मेरा ये मानना है कि संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को लोकतंत्र की रक्षा का परम कर्तव्य दिया है, जिसमें आज हमारा सुप्रीम कोर्ट बुरी तरह फेल हुआ.

दरअसल गुजरात कांग्रेस कमिटी के सचिव ने अपनी -पर्सनल कैपिसिटी- में कोर्ट में एक याचिका डाली और मांग की कि गुजरात विधानसभा चुनाव में वोटों की गिनती 20 फीसद VVPAT पर्चियों के साथ हो ताकि ईवीएम में छेड़छाड़ की आशंका को निर्मूल साबित किया जा सके.

पर सुप्रीम कोर्ट के तेवर ने मामले को तकनीकि पेचीदगियों में फंसा दिया और कोर्ट ने उल्टा सवाल कर लिया कि ये याचिका कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने अपनी पर्सनल कैपिसिटी में क्यों दायर की है और कांग्रेस पार्टी खुलकर -बोल्डली- यानी साहसपूर्वक सामने क्यों नहीं आ रही, अगर उसे ईवीएम से इतनी ही दिक्कत है तो ??!!

मैं मानता हूं कि राहुल और सोनिया गांधी में अभी साहस नहीं है कि वे खुलकर पार्टी की तरफ से ईवीएम पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाएं. वे लोग गौर करें जो ईवीएम में छेड़छाड़ की बात करके बीजेपी की जीत को छोटी बनाते रहते हैं. अरे !! जब राहुल-सोनिया और कांग्रेस पार्टी में ही इतनी हिम्मत नहीं है कि वो सुप्रीम कोर्ट में खुलकर इस बात को कहते तो फिर आप कौन होते हैं बोलने वाले ?? बड़े नकारा लोग हैं कांग्रेस पार्टी में. और आज तो सुप्रीम कोर्ट ने भी पूछ लिया. क्यों भाई कांग्रेस पार्टी ?? खुद सामने नहीं आ रहे. अपने कार्यकर्ता से याचिका डलवा रहे हो. छिपे शब्दों में कहा- कांग्रेस पार्टी, तुम डरपोक है. हिम्मत लाओ, हिम्मत. कोर्ट में खुलकर बोलो.

ये तो रही कांग्रेस की अपनी की हुई फजीहत. अब बात सुप्रीम कोर्ट की करता हूं. माना कि कांग्रेस पार्टी बावली है, सब अनाड़ी वहां पड़े हैं पर माई-बाप. आप तो कानून और संविधान के जानकार हो. आपको लोकतंत्र का प्रहरी संविधान निर्माताओं ने बनाया क्यों है ??!! आपने आज ये कैसे कह दिया कि आप चुनाव आयोग के उस अधिकार (Discretion) में दखल नहीं देंगे, जिसके तहत उसे चुनाव करवाने की शक्ति संविधान में दी गई है. तब तो कल कोई चुनाव आयोग इस देश में लोकतंत्र का गला घोंट दे और आप मुंह देखते रहेंगे??!!

जितनी संविधान की मुझे जानकारी है, उसके हिसाब से सुप्रीम कोर्ट ने आज जो बात बोली, वह तथ्यात्मक रूप से भी सही नहीं है. सुप्रीम कोर्ट को पूरा हक है कि वह संविधान के चुनाव आयोग के किसी भी फैसले पलट सकता है, रोक सकता है और उसका रिव्यू कर सकता है, अगर इस बाबत उसके पास कोई शिकायत लेकर जाता है तो. तभी तो आप कोर्ट हैं, सुप्रीम कोर्ट जनाब !!

माना कि कांग्रेस पार्टी में हिम्मत नहीं है ईवीएम के खिलाफ आपके सामने बोलने की, वहां सब मरे हुए जमीर के लोग पड़े हैं पर अगर उसका एक कार्यकर्ता भी वोटों की गिनती में पारदर्शिता लाने के लिए वीवीपीएटी पर्ची की 20 फीसद गिनती मांग रहा था, तो आपको ऐतराज क्या था ?? सिस्टम में पारदर्शिता आए, ये तो देश के लोकतंत्र के लिए अच्छा ही है ना !! और अगर चुनाव आयोग ठीक से अपना काम नहीं कर रहा है तभी तो मामला आपकी दहलीज तक पहुंचा हुजूर !! आयोग कहता है कि वह हर constituency में सिर्फ एक बूथ पर पर्ची की गिनती करेगा, जो कांग्रेस को मंजूर नहीं है. इसमें झोल हो सकता है, फर्जीवाडा़ हो सकता है, इसलिए अगर हर बूथ पर पर्चियां गिनी जाती हैं, वह भी 25 फीसद तो आपको ऐतराज क्यों और क्या था जज साहब !! सुप्रीम कोर्ट ने ही तो एक फैसले में कहा था ना कि न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए. फिर कहां गया न्याय का वह सिद्धांत ??
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश में एक गलत नजीर बनाई है, जिसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं. सबसे अव्वल बात तो ये हैं कि गुजरात चुनाव के नतीजों की अब कोई प्रामाणिकता नही रहेगी क्योंकि कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष यही आरोप लगाएगा कि ईवीएम में धांधली हुई है, चुनाव आयोग मिला हुआ था और सुप्रीम कोर्ट ने भी उनका ही साथ दिया. सो ये येन-केन-प्रकारेण गुजरात चुनाव जीतने की पूरी conspiracy है. अब बीजेपी की जीत असली भी होगी तो भाई लोग उसे फर्जी और manipulated जीत बता देंगे और कह देंगे कि देखो. ईवीएम में गड़बड़ी की थी, तभी तो चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मैनेज कर लिया और वीवीपीएटी की पर्ची गिनने से इनकार करवा दिया.

सो हे सुप्रीम कोर्ट के माई-बाप जज साहब !! ये राजनीति है. इसकी छींटें आप तक भी आएंगी और भारतवर्ष के इतिहास में ये स्पष्ट रूप में लिखा जाएगा कि एक काल में जब ईवीएम से आर्यावर्त में राजा का फैसला होता था, तब सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने वोटों की पर्ची भी साथ गिनवाने का आग्रह किया था, ताकि लोकतंत्र की इज्जत बची रहे.

क्या ही अच्छा होता कि अगर पर्चियों की भी गिनती साथ कराई जाती और बीजेपी अगर गुजरात चुनाव जीतती तो कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष को सिर झुकाकर अपनी हार स्वीकारनी पड़ती. उनको बोलने का मौका नहीं मिलता. अब तो जितने मुंह, उतनी बातें.

सुप्रीम कोर्ट ने इस देश के लोकतंत्र को बुरी तरह निराश किया है. बेहद दुखद और शर्मनाक है ये.

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