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नदीम एस. अख़्तर॥

IIM जैसे प्रबंधन संस्थानों में पढ़ रहे छात्रों को करणी सेना और संजय लीला भंसाली से सीखना चाहिए. केस स्टडी करना चाहिए. मार्केटिंग, पब्लिसिटी, राजनीति, धर्म, इतिहास, ग्लैमर, बॉलिवुड और व्यावहारिक दुनियावी दुकानदारी का अद्भुत मेल.

यानी एक तीर से कई-कई शिकार. नवोदित संगठनों के लिए करणी सेना रोल मॉडल है. हींग लगे ना फिटकरी और रंग चोखा. अरविंद केजरीवाल ने तो उपवास कर-करके अपना संगठन खड़ा किया लेकिन शिवसेना से प्रेरित करणी सेना जैसे संगठन रातोंरात बिना कुछ किए धरे -फेमस- हो जाते हैं.

बस, दुश्मन बड़ा बना लो और उससे भिड़ जाओ. चाहो तो उसमें जातीय गौरव, इतिहास और धर्म-देशभक्ति जैसे रस सुविधानुसार घोल लो. ऐसा कॉकटेल बनेगा कि देसी-विदेशी मीडिया में छाए रहेंगे. बॉलिवुड से लेकर राजनीति का हर छुटभैया आपके संगठन को नाम से जानेगा. कौन ? करणी सेना. अच्छा वही, जिसने भंसाली को पीटा था. ठीक किया था !!!

और भंसाली के बारे में क्या कहिए. फिल्म बनाने के लिए ऐसा विषय चुनो कि विवाद दौड़ते हुए पीछे-पीछे आएं. बड़ा बजट और बड़े सितारे. हो गया काम. इतिहास में दम हो ना हो, फिल्म की स्क्रिप्ट ऐसी हो कि काम बन जाए. सब जानते हैं कि इस लोकतंत्र में फिल्म बनेगी तो चाहे कितने भी विवाद हो जाएं, रिलीज तो होगी ही. और विवाद उसे एक Perfect Launching Pad देंगे, जो करोड़ों खर्च करके भी कोई प्रोड्यूसर नहीं दे सकता. राजनीति से लेकर मीडिया और समाज से लेकर नीचे का आम आदमी. चाय की दुकान से पान की दुकान तक, सोशल मीडिया से लेकर टीवी मीडिया तक, बस फिल्म की ही चर्चा हो.

कोई फिल्म की नायिका के नैन-नक्श पर साहित्य लिख रहा है, कोई जाति का इतिहास खंगाल रहा है, कोई देसी-विदेशी की परिभाषा बता रहा है, कोई इतिहास को नए सिरे से लिखने की वकालत कर रहा है, कोई धर्म के नाम पर इतिहास के नृपों के कर्मों का लेखाजोखा रख रहा है, कोई राजनीति चमका रहा है, कहीं कोई टुटपुंजिया सिर पर ईनाम रखके अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहा है….मतलब भंसाली के एक यत्न पे इतने सारे उपक्रम एक साथ चलें, तो मान लीजिए कि भंसाली के पास सुपर ब्रेन है. उनकी एक फिल्म ने कितने मस्तिष्कों में कितने ज्वार उत्पन्न किए और विषय को राजनीति के शीर्ष से लेकर चाय-पान की दुकान तक पहुंचा दिया तो समझ लीजिए कि IIM Ahmadabad के छात्रों के लिए भंसाली Ultra Modern Management Guru हैं. कंपनियां अरबों खर्च करके भी इतना प्रचार और ऐसी लहर पैदा नहीं कर सकतीं, जितना भंसाली ने महज कुछ करोड़ खर्च करके अपनी फिल्म के जरिए कर दिया.

सो संजय लीला भंसाली और करणी सेना दोनों को सलाम. आप लोग ग्रेट हो. समय का सदुपयोग कोई आप लोगों से सीखे और उस कहावत को कंठस्थ कर ले कि- आम के आम और गुठली के भी दाम. जिंदाबाद !!!

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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