बैंकों का ख़स्ता हाल, यूबीआई का घाटा बढ़ा..

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अरूण माहेश्वरी॥

मोदी-जेटली दावा कर रहे थे कि नोटबंदी से बैंकों का ख़ज़ाना नगदी से भर जायेगा, उद्योगों को आसान दरों पर क़र्ज़ मिलेगा, बैंकों को भारी लाभ होगा, जनता की तकलीफ़ों के बावजूद अर्थ-व्यवस्था का विकास होगा ।

जीडीपी, जिसे आर्थिक विकास का सबसे बड़ा मानदंड माना जाता है और पूँजी निर्माण (अर्थात उद्योगों में निवेश) इनके अब तक जो आँकड़े आए हैं वे वृद्धि की दर में लगातार गिरावट के आँकड़े हैं । यही हाल बैंकों से दिये जाने वाले क़र्ज़ का है । उसमें वृद्धि के भी कोई संकेत नहीं है । सबसे मज़ेदार है बैंकों की अपनी अवस्था की बात । आज ही अख़बारों में है कि युनाइटेड बैंक आफ इंडिया को 2017-18 की जुलाई से सितंबर की तिमाही में रेकर्ड 344.83 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है जबकि पिछले साल इसी तिमाही में उसे 43.53 करोड़ का नुक़सान हुआ था । इसके पहले अप्रैल-जून की तिमाही में 211.46 करोड़ का नुकसान था ।

यह घाटा बैंकों के एनपीए में लगातार वृद्धि की वजह से हो रहा है । अर्थात, जनता का जो भी रुपया बैंकों में आया उसमें से बहुत कम ही बैंकों के पास जमा रह पाया है और जो जमा रहा भी उसका इस्तेमाल बैंक से क़र्ज़ लेने वाले बड़े लोगों की डूबत के घाटे को पूरा करने में ख़र्च होता जा रहा है ।

मोदी की नोटबंदी इसी प्रकार आम लोगों की गाढ़ी कमाई को खींच कर बैंकों के मार्फ़त पूँजीपतियों को सौंपने की मशीन थी । और मोदी आम लोगों से कह रहे हैं, आओ ! अपनी बर्बादी का जश्न मनाओ ।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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