बड़े कारोबारियों के लिए जगह छोड़ती जा रही हैं छोटी इकाइयाँ

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संजय कुमार सिंह॥

सन 2007 की बात है। रिलायंस फ्रेश शुरू हुआ था। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद-नोएडा में इसकी शाखाएं थीं। एक मेरे घर के पास भी एक शाखा थी। और चीजों के साथ वहां सब्जियां बहुत सस्ती और ताजी मिलती थीं। मंडी से सस्ती सब्जी खरीदने में होने वाली असुविधा यहां नहीं थी। एयरकंडीशन दुकान, पार्किंग की सुविधा और कितनी भी सब्जी खरीद लो गाड़ी तक या मोहल्ले में ट्रॉली से सामान लाने में कोई दिक्कत नहीं। लिहाजा रिलायंस फ्रेश बहुत जल्दी लोकप्रिय हो गया। सच पूछिए तो दिल्ली एनसीआर में इतने समय से रहते हुए खरीदारी मैंने उन्हीं दिनों की है। मुझे मंडी जाकर सस्ती सब्जी खरीदना कभी अक्लमंदी नहीं लगी क्योंकि एक तो भीड़-भाड़ गंदगी, गर्मी-पसीना, मोल-भाव, बेईमानी-ठगी सब झेलने के बाद सौ-दो सौ रुपए बचा लूं तो क्यों ना किसी गरीब को कमाने दूं। संक्षेप में कहा जाए तो रिलायंस रिटेल की ये दुकानें मोहल्ले के सब्जी वालों के लिए काल बन गईं। धरना-प्रदर्शन हुआ औऱ उत्तर प्रदेश में उस समय की मुख्यमंत्री मायावती ने बहुत ही जल्दी रिलायंस रीटेल को चलता कर दिया। दुकानें बंद हो गईं।

कहने की जरूरत नहीं है कि मायावती ने छोटे दुकानदारों, कारोबारियों, सब्जी विक्रेताओं को प्राथमिकता दी और कार से सब्जी खरीदने जाने वाले हम जैसे लोग महंगी सब्जी खरीदने को मजबूर हुए। 2007 में रिलायंस फ्रेश ग्राहकों को तमाम सुविधाएं और लाभ देने के बाद जो नहीं कर पाया वह 2017 में जीएसटी ने कर दिया है। सब्जी वालों का धंधा भले बंद नहीं हुआ हो छोटे-मोटे सामान बेचकर गुजर करने वाले जीएसटी के नियमों के कारण बेरोजगार हो गए हैं। उनकी जगह बड़े ब्रांडेड रिटेल स्टोर खुलते जा रहे हैं। रिलायंस फ्रेश आउटलेट खुलने के तुरंत बाद व्यापारियों द्वारा उनमें तोड़फोड़ की भी खबर थी। तबकी एक खबर में कहा गया था कि व्यापारियों ने आउटलेट्स को काफी नुकसान पहुंचाया और कर्मचारियों पर हमला भी किया। इसके बाद से गाजियाबाद में तो रिलायंस फ्रेश अभी तक नहीं दिखा है।

दूसरी ओर, जीएसटी लागू किए जाने का असर यह है कि एफएमसीजी क्षेत्र की असंगठित और स्थानीय इकाइयां बड़े संगठित संस्थानों के लिए जगह छोड़ती जा रही हैं। यह प्रवृत्ति सारे देश में है और आईसीआईसीआई सिक्यूरिटीज द्वारा किए गए एक अध्ययन से इसकी पुष्टि भी हुई है। हालत यह है कि बड़ी संस्थाओं के प्रभुत्व के आगे छोटी क्षेत्रीय इकाइयां टिक ही नहीं पा रही हैं और उनके लिए मौजूदा वितरण संरचना से निपटना मुश्किल हो रहा है। अध्ययन के मुताबिक जीएसटी के कारण कारोबार में हो रही बाधा के सबसे बड़े लाभार्थी संगठित डिब्बाबंद खाद्य सामग्री विक्रेता है। बिस्कुट, चिप्स, नमकीन आदि में असंगठित क्षेत्र का योगदान 40 प्रतिशत तक था। जीएसटी लागू किए जाने से पहले आवश्यक तैयारी नहीं करने का नतीजा यह है कि उन्हें भारी घाटा हो रहा है और इसकी लाभ बड़े विक्रेता उठा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि जीएसटी का नुकसान बड़े कारोबारियों को नहीं हुआ है पर उनकी क्षमता और योग्यता के साथ मुश्किल स्थितियों में टिके रहने का लाभ उन्हें छोटे कारोबारियों के मुकाबले कई गुना ज्यादा मिल रहा है। एक तरफ अगर छोटे कारोबारी जीएसटी नियमों में छूट दिए जाने के बावजूद संभल नहीं पाए हैं तो बड़े व्यापारियों को उम्मीद है कि वे जल्दी ही अच्छी स्थिति में होंगे।

एक पुरानी खबर के मुताबिक, डाबर इंडिया और गोदरेज कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स लिमिटेड ने कहा है कि उन्होंने खुद को बदलाव के मुताबिक ढाल लिया है और स्थिर बाजार धारणा के कारण इस तिमाही तक स्थिति पूरी तरह सुधर जाने की उम्मीद है। डाबर इंडिया के मुख्य वित्तीय अधिकारी ललित मलिक ने कहा बताते हैं कि ग्रामीण तथा शहरी दोनों बाजारों में मांग का परिदृश्य बेहतर होने की उम्मीद है। गोदरेज कंज्यूमर्स के कारोबार प्रमुख (भारत एवं सार्क) सुनील कटारिया ने भी ऐसी ही संभावना जाहिर की थी। उन्होंने कहा था, “जून में बड़े स्तर पर खाली किये गये भंडार फिर से भरे जाने लगे हैं।”

बड़े विक्रेता के नजरिए से थोक बाजार को बदलाव के अनुकूल होने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगा। खुदरा बाजार में तेजी से सुधार हुआ और जुलाई-अगस्त के दौरान (ही) यह काफी सामान्य रहा। सुधार के बाबत पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “तीसरी तिमाही के अंत तक हमें बाजार में पूर्ण सुधार दिखेगा। हम आने वाली तिमाहियों में बेहतर प्रदर्शन के लिए आशान्वित हैं।”
मनी भास्कर डॉट कॉम की एक खबर के मुताबिक जीएसटी लागू होने के बाद सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन 20 लाख से कम टर्नओवर वाले कारोबारियों में बना हुआ है। बड़े कारोबारी इन्पुट क्रेडिट नहीं मिलने की आशंका से उनसे बिजनेस कम कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्टीकरण जारी किया है पर रोज नियम बदलने का नुकसान तो होगा ही।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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