प्रेस की स्वतंत्रता का भाजपाई अर्थ

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-संजय कुमार सिंह || 

अमित शाह के बेटे के खिलाफ खबर छपने पर 100 करोड़ का दावा और स्टे। हालांकि बहाल नहीं रह पाया। भाजपा के सबसे पैसे वाले सदस्यों में एक माने जाने वाले राजस्यसभा सदस्य का नाम पैराडाइज पेपर में आने पर एक सप्ताह का मौनव्रत और अगले ही दिन अखबारों के लिए विज्ञापन तैयार हो जाना – बताता है कि भाजपा के नेताओं के लिए प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का अलग मतलब है। और इसे रोकने के लिए 40 साल पुराना मामला भी अचानक निकल सकता है। आइए, फिलहाल आरके सिन्हा का मामला देखें।

मौन व्रत वाले सांसद ने अपना पत्र विज्ञापन के रूप में छपवाया है। हालांकि, यह विज्ञापन इंडियन एक्सप्रेस में नहीं है। पता नहीं एक्सप्रेस ने छापा नहीं या उसे दिया ही नहीं गया। भाजपा राज में विज्ञापनों का अपना खेल चल रहा है और वह अलग मुद्दा है। विज्ञापन के रूप में छपा आरके सिन्हा का स्पष्टीकरण उनके सांसद के लेटरहेड पर है और राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को संबोधित है। इसमें उन्होंने विदेशी कंपनी में शेयर होने के आरोप तो स्वीकार कर लिए हैं पर बताया है कि वह क्यों है और कैसे हुआ तथा कैसे गलत नहीं है। चुनाव के समय की जाने वाली घोषणा में इसका विवरण न होने के बारे में सफाई दी है और कारण बताया है कि नियमतः यह जरूरी नहीं है। श्री सिन्हा का यह स्पष्टीकरण अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुआ है।

विज्ञापन के रूप में छपे लेडर हेड पर उन्हें कानून व न्याय मंत्रालय और दूरसंचार मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य भी बताया गया है। विकीपीडिया के मुताबिक वे एक भारतीय पत्रकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक उद्यमी हैं और सिक्यूरिटी एंड इंटेलीजेंस सर्विसेज के संस्थापक हैं। अपने पत्र में श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस पर अनैतिक पत्रकारिता का आरोप लगाते हुए कहा है कि इस अखबार ने दशकों से बरकरार उनकी छवि को निहित स्वार्थों से धूमिल करने की कोशिश की है। श्री सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस के अध्यक्ष विवेक गोयनका, मुख्य संपादक राजकमल झा और संपादकीय कर्मी रितु सरीन और श्याम लाल यादव के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई शुरू करने का आग्रह किया है।

एक्सप्रेस ने यह खुलासा 6 नवंबर को छापा था और उसी दिन उन्होंने लिखकर बताया था कि वे मौनव्रत पर हैं पर आज (09 नवंबर) छपा जवाब अगले ही दिन यानी 7 नवंबर की तारीख का है। इसमें उन्होंने लिखा है कि इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले पत्र में दिए गए तथ्य “पारदर्शितापूर्ण तरीके से” इंडियन एक्सप्रेस टीम के साथ साझा किए गए थे। इसके बावजूद एक्सप्रेस ने बगैर तथ्यों के भ्रम पैदा करने वाली खबर फैलाई है और निहित स्वार्थों के लिए छवि खराब करने का काम किया है। खास बात यह है कि इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर के साथ बॉक्स में इनका पक्ष भी छापा था और यह सूचना भी लगाई थी कि पूरी प्रतिक्रिया के लिए एक्सप्रेस की साइट देखें। मैंने उनकी प्रतिक्रिया एक्सप्रेस की साइट पर नहीं देखी (मुझे देखने की जरूरत नहीं लगी)।

सिन्हा साब पत्रकार हैं, मुझसे भी पुराने और सीनियर पर मुझे लगता है कि एक्सप्रेस ने जो खबर छापी है वह तथ्यों पर आधारित है और जो छापा है उससे संबंधित उनके पारदर्शी जवाब का अंश भी छाप दिया है। बाकी वेबसाइट पर है। और यह तथ्य वे मान रहे हैं कि विदेशी कंपनी में शेयर है और उसकी जानकारी राज्य सभा चुनाव में नहीं दी गई थी। यही एक्सप्रेस की खबर है फिर भी वे एक्सप्रेस पर प्रेस की आजादी के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं। साथ ही कांग्रेस के नेताओं के नाम लेकर कहा है कि दूसरे लोगों को लक्ष्य क्यों नहीं किया जा रहा है। जबकि एक्सप्रेस ने पहले ही दिन लिखा था कि करोड़ों पेज के ये मामले 10 महीने की पड़ताल के बाद छापे जा रहे हैं औऱ अगले 40 दिनों तक छपेंगे। भाजपा की प्रेस की स्वतंत्रता के मायने बिल्कुल अलग लगते हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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