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-गिरीश मालवीय||

अमेरिका में 1941 में बनी जॉन डो नामक एक फिल्म बहुत लोकप्रिय हुई थी. तभी से अपने आपको गुमनाम रखकर खुफिया कामों में लगे अमेरिकी लोग अपना परिचय अक्सर इसी नाम से देते हैं. आजकल जो बहुत से खुलासे विकीलीक्स, पनामा पेपर्स ओर अब पैराडाईज पेपर्स की शक्ल में हुए हैं उनके मूल में यह अमेरिकी जॉन डो का किरदार ही छुपा हुआ है.

लेख की लंबाई कुछ अधिक है लेकिन थोड़ा पहले से शुरू करते हैं ताकि बात पूरे संदर्भों के साथ समझ मे आ जाये
विकीलीक्स ने दुनिया में सनसनी तब फैला दी थी जब 2007 में अमेरिकी सेना के ग्वांतानामो जेल में यातना शिविर होने का संकेत देने वाले दस्तावेज़ जारी किए , साल 2011 में विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने भारत में काला धन रखने वाले लोगों की लिस्‍ट को जारी किया असांज ने तो दावा किया कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती प्राइवेट जेट भेजकर अपने लिए मुंबई से सैंडल मंगावाती हैं ओर जब तक वे यह चेक नहीं कर लेते हैं कि खाने में जहर तो नहीं तब तब मायावती खाना नहीं खाती हैं.

खैर यह सब बाते तो बहुत से नेताओं के लिए भी कही गयी है
लेकिन इस विकीलीक्स से भी पहले साल 1997 में 65 देशों के लगभग 200 पत्रकारों ने मिलकर एक ऐसा नेटवर्क बनाया जो मूलतः विश्व मे खोजी पत्रकारिता के सामूहिक हित की रक्षा के लिए बनाया गया था इसे आप इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स- यानी आईसीआईजे ICIJ के नाम से जानते हैं.

इसी नेटवर्क का सदस्य इंडियन एक्सप्रेस समूह भी है जिसने पनामा पेपर्स की तर्ज़ पर एक बार फिर पैराडाईज पेपर्स के भारतीय संबंध की खोज की है पैराडाइज पेपर्स में कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों, दुनियाभर की राजनीतिक-फिल्मी हस्तियों, खिलाड़ियों के नाम हैं. लेकिन पनामा पेपर्स में पैराडाइज पेपर्स की तुलना में अधिक राष्‍ट्राध्‍यक्षों के नाम थे. पनामा पेपर्स में जहां 500 भारतीयों के नाम थे, वहीं पैराडाइज पेपर्स में 714 भारतीय कंपनियां और लोग शामिल हैं.

पनामा पेपर्स में जहाँ लॉ फर्म मोसैक फॉन्सेका से दस्तावेज लीक हुए थे. वही इस बार ‘पैराडाइज पेपर्स’ में 1.34 करोड़ दस्तावेज शामिल हैं। इनमें से ज़्यादातर ‘एप्पलबी’ नाम की एक लॉ-फर्म से हैं.

पैराडाइज पेपर्स लीक में पनामा की तरह ही कई भारतीय राजनेताओं, अभिनेताओं और कारोबारियों के नाम सामने आए हैं। आईसीआईजे के भारतीय सहयोगी मीडिया संस्थान इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, इस लिस्ट में कुल अमिताभ बच्चन, नीरा राडिया, नागरिक उड्डयन मंत्री जयंत सिन्हा, भाजपा से राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा, विजय माल्या सहित 714 भारतीयों के नाम शामिल हैं.

यह मामला सामने आने के बाद भारत सरकार ने जांच के आदेश दे दिए है। भारतीय कंपनियों के कथित फंड डायवर्जन और कॉरपोरेट गवर्नेंस में हुई चूक को लेकर सामने आई कॉरपोरेट लीक को लेकर सरकार ने सीबीडीटी चेयरमैन की अध्यक्षता में मल्टी जांच एजेंसी का फिर से गठन किया है.

लेकिन जैसे पनामा पेपर्स की जांच में सरकार को कुछ नही मिला वैसे ही इस पैराडाईज पेपर्स की जांच में भी सरकार को कुछ मिलने वाला नही है ओर उसका कारण यह है कि यह पेपर्स भारत के भाग्यविधाताओं की कलई खोल देते हैं.

देश के सबसे प्रसिद्ध वकील, ओर न्यायपालिका के उच्च पदों पर बैठे लोगों के नाम पनामा पेपर्स में शामिल थे, देश का सबसे मशहूर अभिनेता इस लिस्ट में था देश के सबसे दौलतमंद कारोबारी घराने इसमें मौजूद थे, देश के सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि इस लिस्ट की शोभा बढ़ा रहे थे तो कार्यवाही करता कौन , ओर करता भी किसके खिलाफ ?

क्या पनामा पेपर्स की जांच में कुछ पकड़ में आया जो अब पैराडाईज पेपर्स में कुछ पकड़ में आएगा, अब सवाल यह पैदा होता है कि पनामा पेपर्स की जांच में कुछ ठोस सामने क्यो नही आ पाया.

दरअसल पनामा पेपर्स से सामने आए ज़्यादातर विदेशी खातों के मामले में आरबीआई के नियमों का पालन किया गया है. आधिकारिक तौर पर कहा गया है कि क़रीब 90 प्रतिशत खातों में आरबीआई की लिब्रलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) का इस्तेमाल किया गया है. बाकी बचे जो खाते नियम विरुद्ध खोले गए हैं, उनके खाता धारकों पर ही अब कार्रवाई की जाएगी. 2004 में लागू की गई एलआरएस स्कीम के तहत भारतीय नागरिक अपनी आय का वह हिस्सा विदेश भेज सकते हैं, जिस पर भारत में आयकर चुका दिया गया हो. पनामा लीक्स से सामने आए भारतीयों के कुल खातों में से 90 प्रतिशत आरबीआई की लिब्रलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) के तहत खोले गए हैं. पनामा पेपर्स के ज़रिये सामने आए क़रीब 500 भारतीयों के विदेशी खातों में से क़रीब 90 प्रतिशत खाते नियमों के तहत सही पाए गए हैं.

2004 में जब यह स्कीम शुरू की गई थी, तब एक वित्तीय वर्ष में केवल 25 हज़ार डॉलर यानी 15 लाख रुपये ही बाहर ले जाए जा सकते थे.लेकिन मोदी जी के राज में अब इसे बढ़ाकर दो लाख पचास हज़ार डॉलर यानी 1.63 करोड़ रुपये किया जा चुका हैं.

तो कार्यवाही होगी कहा से सिर्फ 10 प्रतिशत खातों पर थोड़ी बहुत कार्यवाही होगी जो बार माल्या की शक्ल दिखा कर पूरी बता दी जाएगी
अब आप अमिताभ बच्चन का ही उदाहरण लीजिए जिनका नाम पनामा पेपर्स में भी आया था, अमिताभ बच्चन ने आयकर विभाग को भेजे गए अपने जवाब में उन चार कंपनियों से किसी तरह का संबंध होने या उनमें हिस्सेदारी से इंकार किया था, जिनके बारे में पनामा की विधि सेवा प्रदाता कंपनी मोस्सैक फोंसेका के लीक दस्ताव़ेजों में दावा किया गया था. अमिताभ ने कहा था कि उनके नाम का दुरुपयोग किया गया है और वह सी बल्क शिपिंग कंपनी लिमिटेड, लेडी शिपिंग लिमिटेड, ट्रेजर शिपिंग लिमिटेड और ट्रैम्प शिपिंग लिमिटेड के बारे में कुछ नहीं जानते. वह कभी भी इनमें से किसी कंपनी के निदेशक नहीं रहे. लेकिन, बाद में पनामा लीक्स से मिले कागजातों के आधार पर अमिताभ बच्चन के दावे ग़लत पाए गए. अमिताभ बच्चन की एबीसीएल लॉन्च होने से दो वर्ष पहले ही उक्त चारों कंपनियां रजिस्टर्ड हुई थीं. चारों कंपनियां उमेश सहाय और डेविड माइकल पेट ने स्थापित की थीं.

तो अमिताभ पर कुछ कार्यवाही हुई क्या?  बिल्कुल भी नही!
नीरा राडिया का नाम भी पनामा पेपर्स में आया था नीरा राडिया की ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में एक जनसमूह का कामकाज पनामा की लॉ फर्म मोसेका फोंसेका देखती थी। लीक हुए दस्तावेजों में उनके नाम की स्पेलिंग में परिवर्तन है। हालांकि मीडिया की कंपनी वैष्णवी कम्यूनिकेशंस ने इन आरोपों का सर्मथन किया था राडिया के अनुसार 1994 में उनके पिता इकबल मेनन ने ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में क्राउन मार्ट इंटरनेशनल कंपनी खोली थी। लेकिन वे उसमें हिस्सेदार नहीं रही हैं। राडिया ने कहा कि विदेशों में उनकी सपंत्तियों की भारत में जानकारी पहले ही दी थी.

कुछ कार्यवाही हुई क्या कुछ भी नही
समीर गहलोत का नाम भी पनामा पेपर्स में आया था, उस खुलासे में पता चला कि इंडिया बुल्स नाम के मालिक समीर गहलोत ने बहामास और जर्सी के जरिए परिवार के सदस्यों के नाम पर ब्रिटेन, बहामास, जर्सी, नई दिल्ली, यूके और करनाल की जनसमूहों के माध्यम से लंदन में 3 संपत्ति खरीदी। जिन्हें आवासीय और होटल परियोजनाओं में बदल दिया गया। यह संपत्ति अक्टुंबर 2012 में बने एसजी परिवार संस्था की हैं। समीर का जवाब था कि उन्होंने भारत में कर चुकाने के बाद ही निवेश किया
कोई कार्यवाही नही हुईं.

केपी सिंह का नाम भी पनामा पेपर्स में उछला था, डीएलएफ के प्रमोटर 2010 में ब्रिटिश वर्जिन आईलैंड में कंपनी खरीदी थी और कुशल पाल सिंह (केपी सिंह) और उनके परिवार के नौ सदस्यों के नाम से ब्रिटिश वर्जिन आईलैंड में ही वाइल्डर लिमिटेड के नाम से कंपनी हैं, क्या कोई जांच नतीजा निकला कुछ भी नही.

ये भारत है अमेरिका नही है यहाँ रोज कितने ही जॉन डो पैदा होते हैं और मार दिए जाते हैं किसे पता चलता है इस बार भी कुछ नही होगा.

[गिरीश मालवीय की फेसबुक वाल से]

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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