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-संजय कुमार सिंह||

इसमें कोई शक नहीं है कि कर व्यवस्था के रूप में जीएसटी एक अच्छी प्रणाली है। इस प्रणाली से किसी को शिकायत नहीं है। वैसे ही जैसे कालेधन को खत्म करने के लिए नोटबंदी एक अच्छा तरीका है पर उसे लागू करने का तरीका ऐसा था कि फायदा हुआ नहीं, नुकसान जरूरत से ज्यादा हो गया। जीएसटी का भी वही हश्र होता दिख रहा है। रोज होते सुधार उसकी अच्छाइयों को खत्म कर देंगे और बुराइयों से कोई राहत नहीं मिलेगी।

सबसे पहले तो मैं अपना ही उदाहरण दूं। जीएसटी लागू होने के बाद मेरे ग्राहकों ने कह दिया कि बगैर जीएसटी पंजीकरण के वे मुझे काम नहीं देंगे। एक जुलाई के बाद हुए काम का भुगतान भी नहीं दिया। नियमानुसार, खर्च बुक ही नहीं कर सकते थे यानी वो ये नहीं दिखा सकते थे कि जीएसटी लागू होने के बाद उन्होंने किसी अपंजीकृत सेवा प्रदाता या विक्रेता से काम लिया। जो पर्चेज ऑर्डर देते हैं उन्होंने पर्चेज ऑर्डर ही नहीं दिया। कह दिया जीएसटी में नहीं बन सकता है। देखते हैं, करते हैं। आप तो समझते हैं। पहले मैं समझता नहीं था। बाद में समझने लगा तो कोई बात ही नहीं। कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि जुलाई में किए काम का मेरा भुगतान अभी तक नहीं मिला है। मिलेगा की नहीं, पक्का नहीं है। मैं सब जानता हूं, इसलिए झगड़ा नहीं कर सकता और कुढ़ने की आदत नहीं है इसलिए बीपी नहीं बढ़ रहा। हालांकि पत्नी का बढ़ गया। इलाज चल रहा है।

मेरे पैसे नहीं मिले, इसकी चर्चा मैं पहले कर चुका हूं और आज नहीं करता अगर ये नहीं बताना होता कि नियमों में संशोधन का कोई लाभ नहीं हुआ है। जी हां, नियमों में ऐतिहासिक संशोधन छह अक्तूबर की बैठक के बाद हुआ था। आज एक महीना पूरा होने के बाद, पुरानी स्थिति बहाल नहीं हुई है। मैं पहले की तरह काम करता रह सकता हूं – इस आशय का मेल मेरी ग्राहक कंपनियों ने भेजा है। पर ना पुराने पर्चेज ऑर्डर आए ना नए काम आ रहे हैं। जाहिर है, काम कराने वालों की अपनी समस्या है। अपनी दिकक्त है। और एक दिक्कत तो यही कि खर्चा बुक ही नहीं किया है तो भुगतान कैसे करे? और जब पहले का भुगतान नहीं किया तो नया काम कैसे कराएं। कौन करेगा और फिर 31 मार्च के बाद (या बीच में ही) कोई नया फरमान आ जाए तो कौन झेलेगा। कर्मचारी, जिन्हें जीएसटी के नियम झेलने हैं उन्हें तो तनख्वाह मिल ही रही है उन्हें इससे क्या मतलब कि मेरा या मेरे जैसे सेवा प्रदाताओं का घर चल रहा है कि नहीं। इसलिए, मान लीजिए, छूट का लाभ नहीं हो रहा है। ऐसे ही चलता रहा तो नहीं होगा।

जीएसटी के नियम ऐसे हैं कि छोटा कारोबारी टिक ही नहीं पा रहा है और बड़े के लिए “ईज ऑफ बिजनेस” का लॉली पॉप है। नेटबैंकिंग और ऑनलाइन खरीद का जमाना है। पड़ोस का सामान भी अमैजन और फ्लिपकार्ट के जरिए खरीदने की स्थितियां बनाई गई हैं। और इन ऑनलाइन विक्रेताओं ने क्या किया? नेटवर्क ही तो बनाया था। कथित “ईज ऑफ बिजनेस” के लालच में कई छोटे बड़े विक्रेताओं ने ऑनलाइन कंपनियों से ताल-मेल किया। पर जीएसटी आते ही ऑनलाइन कारोबार के लिए पंजीकरण जरूरी हो गया। कई नए आयटम टैक्स दायरे में आ गए। लिहाजा बड़ी ऑनलाइन कंपनियों ने काम देना बंद कर दिया। कई लोग सारा निवेश और तैयार माल लेकर बैठे हैं। नियम बदलते रहें उसे ऑर्डर नहीं मिलेगा तो वह कहां बेचे अपना माल?

जीएसटी की प्रयोगशाला के एक पाठक ने लिखा है, “मैंने एक साल पहले अतिरिक्त आय के लिए एक ऑनलाइन कंपनी के साथ साड़ी रीटेलर के तौर पर व्यवसाय शुरू किया था। चूंकि कपड़ा व्यवसाय में किसी भी तरह का कोई टैक्स नहीं लगता इसलिये मुझे ये सरल लगा। मुझे टैक्स से संबंधित जानकारी नहीं है। जीएसटी की वजह से एक जुलाई के बाद मुझे अपना काम बंद करना पड़ा जबकि इससे होने वाली मेरी आय मात्र 10 से 15 हजार रुपए प्रति माह थी। मैं सीए के पास सलाह लेने गया तो उसने मुझे जीएसटी पंजीकरण कराने से साफ मना कर दिया। उसने कहा तत्काल काम बंद कर दो इसी में भलाई है। बाद मे मैंने एक न्यूज में पढ़ा कि जीएसटी के बाद अमैजन, फ्लिपकार्ट ने 85 हज़ार रीटेलर्स को डीलिस्ट कर दिया है। आज मेरे पास एक लाख रुपए से उपर का माल रखा है पर अब समझ मे नहीं आ रहा कि इसका क्या करूं, क्योंकि मेरी कोई दुकान भी नहीं है।” और खानदान में पहली बार नौकरी कर रहे भक्त घूम-घूम कर बता रहा है कि उसके परिवार में जो पहले टैक्स नहीं देते थे वो जीएसटी पंजीकरण करा रहे हैं। हालांकि मुझे ऐसा कोई नहीं मिला।
#GSTkasach

[वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की फेसबुक वाल से]

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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