इंफोसिस को विलेन बनाने की कोशिश, अब उसकी भी सुनिए..

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-संजय कुमार सिंह||

आप पढ़ चुके हैं कि व्यापारियों की संस्था कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) ने जीएसटी दाखिल करने में हो रही समस्याओं के लिए जीएसटी नेटवर्क के पोर्टल और इसे बनाने तथा इसका रख-रखाव करने वाली कंपनी – इंफोसिस को जिम्मेदार ठहराया है। और इसकी जांच कराने तथा इसपर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है। अंग्रेजी अखबार, दि टेलीग्राफ ने इस मामले को प्रमुखता से प्रकाशित किया है और इससे कई खुलासे हुए हैं। आरोप लगने के बाद कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनपर पहले ध्यान नहीं दिया गया था या जिनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम रही। सबसे पहले तो सीएआईटी को भाजपा का करीबी बताया जा रहा है और कुछ कारोबारियों का कहना है कि इस पूरे मामले में इंफोसिस को विलेन बनाने की कोशिश सरकार की अपनी नाकामियों से ध्यान बांटने के लिए है।

यह अब जानी और मानी हुई बात है कि जीएसटी को बगैर तैयारियों के थोप दिया गया है। और तो और जीएसटी लागू करने से पहले इसके लिए बनाए गए नेटवर्क पोर्टल का परीक्षण ही नहीं किया गया। ध्यान दिलाए जाने के बावजूद। और यह बात अरुण शौरी ने “ढाई लोगों की सरकार” वाले अपने बहुचर्चित टीवी इंटरव्यू में भी कही था। उनका कहना था कि जीएसटी का सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी ने इसके ट्रायल का अनुरोध किया था जिसे अनसुना कर दिया गया। टेलीग्राफ ने इस संबंध में एक व्यापारी के हवाले से लिखा है, “यह (इंफोसिस पर आरोप) गड़बड़ियों से भरी, खराब डिजाइन वाली कराधान प्रणाली की जिम्मेदारी टालने की कोशिश है जबकि इन्हीं वजहों से यह एशिया की सबसे जटिल कराधान प्रणाली बन गई है।”

इस संबंध में इंफोसिस ने एक बयान में कहा है, “(नेटवर्क) सिस्टम ने अपनी सफलता का प्रदर्शन पहले ही कई प्राचलों पर कर दिया है। आज की तारीख तक 37 करोड़ इनवॉयस अपलोड किए जा चुके हैं …. 70 लाख करदाता सफलता पूर्वक नई प्रणाली को अपना चुके हैं और देश ने 29 लाख नए पंजीकृत करदाता दर्ज किए हैं।” विज्ञप्ति में आगे कहा गया है, “31 अक्तूबर 2017 की स्थिति के अनुसार जीएसटी पोर्टल पर 2.26 करोड़ रिटर्न दाखिल किए गए हैं और 1.4 करोड़ (भुगतान) लेन-देन किए जा चुके हैं।” कुछ व्यापारियों का कहना है कि टैक्स से संबंधित गड़बड़ियों के जवाब में सरकार हमेशा टैक्स की दर के साथ छेड़-छाड़ करती रही है इससे समस्या जटिल हो गई है। इसमें करदाताओं के वर्गीकरण की सीमा बदलना और छोटे कारोबारों के लिए अंतरराज्यीय बिक्री की बाधाओं पर पुनर्विचार करना शामिल है।

अखबार ने केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) के पूर्व चेयरमैन सुमित दत्त मजूमदार के हवाले से लिखा है, “आमतौर पर इतनी बड़ी प्रणाली की शुरुआत से पहले उसका परीक्षण किया जाता है। इससे इसका काम-काज देखने और इसके जरिए रिटर्न फाइल करने वाले (इसका उपयोग करने वाले) लोग टैक्स देने की पूरी प्रक्रिया से सहज हो जाते हैं। इससे बीच में उठ सकने वाली समस्याओं से निपटने में भी सहायता मिलती है। दुर्भाग्य से हमलोगों ने इसका परीक्षण किया ही नहीं।”

जीएसटी के कारण कई छोटे कारोबारों का मुनाफा कम हो गया है और वे धंधा बंद करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। जीएसटी में इनपुट क्रेडिट का प्रावधान है और सरकार ने कहा था कि वह लाभ का विस्तार जीएसटी से पहले के उत्पादन तक करेगी। इन दावों का भुगतान करने में नाकाम रहने से कारोबारियों के पास अपने परिचालन जारी रखने के लिए कार्यशील पूंजी ही नहीं रह गई है। इसके अलावा कर प्रणाली अलोकप्रिय साबित हुई है क्योंकि सरकार ने टैक्स की छह दरों का चुनाव किया जबकि ज्यादातर देशों में आमतौर पर एक या दो दर हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि कारोबारों के लिए कागजी कार्रवाई का पहाड़ खड़ा हो गया। कारोबारों की सहायता के लिए नियमों में बदलाव का उद्देश्य अक्सर राजनीतिक होता था और अगले महीने के शुरू में गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मशहूर गुजराती खाद्य सामग्री खाकड़ा पर टैक्स का मामला ऐसा ही है।

एक हजार सदस्यों वाले रेफ्रिजरेशन एंड एयर कंडीशनिंग ट्रेडर्स एसोसिएशन के नेता और यूनाइटेज एजेंसीज के प्रबंध निदेशक मनीष सेठ ने कहा, “हमारे लिए यह एक मुश्किल स्थिति है। एक जटिल कानून, इसमें बार-बार होते बदलाव और ऐसा नेटवर्क जो अक्सर धोखा देता है – ने जीवन मुश्किल कर दिया है।” कंपनी ने ईमेल किये गये ‘भाषा’ के सवालों के जवाब में कहा, “परियोजना की जटिलता तथा प्रबंधन में तेज बदलाव को देखते हुए हमारे कुछ सबसे बेहतरीन इंजीनियर जीएसटीन टीम की मदद कर रहे हैं। कारोबारियों की दिक्कतों को दूर करने के लिए इंफोसिस ने इंजीनियर की संख्या बढ़ाने के लिए कहा था। इसपर कहा गया है, “वे नौ राज्यों में ऐसा कर चुके हैं और अन्य में इसके लिए नवंबर तक का समय मांगा है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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