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क्या मोदी सरकार के मंत्री अजीत डोभाल के बेटे के संस्थान को फ़ायदा पहुंचा रहे हैं.?

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द वायर की विशेष रिपोर्ट: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे शौर्य डोभाल द्वारा संचालित इंडिया फाउंडेशन में नरेंद्र मोदी सरकार के चार मंत्री निदेशक हैं. यह संस्थान कई ऐसे विदेशी और भारतीय कॉरपोरेट्स से चंदा लेता है, जो सरकार के साथ सौदे भी करते हैं.

-स्वाति चतुर्वेदी||

 

नई दिल्ली: केरल में चरमपंथी इस्लाम’ और ‘आदिवासियों का बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन’ जैसे विषयों पर विस्तृत आलेख छापने वाले संगठन के तौर पर इंडिया फाउंडेशन का अस्तित्व 2009 से है. लेकिन 2014 से इंडिया फाउंडेशन का जिस तरह उभार हुआ, उसे किसी चमत्कार से कम नहीं कहा जा सकता.

आज यह भारत का सबसे प्रभावशाली थिंक-टैंक है, जो विदेश और भारत के औद्योगिक जगत की प्रमुख हस्तियों को मंत्रियों और अधिकारियों के साथ बैठाकर सरकारी नीतियों पर तफसील से बातचीत करने के लिए मंच मुहैया करवाता है. लेकिन इंडिया फाउंडेशन की अपारदर्शी वित्तीय संरचना, इसमें वरिष्ठ मंत्रियों की निदेशकों के तौर पर उपस्थिति और यह तथ्य कि इसके एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर (कार्यकारी निदेशक) शौर्य डोभाल का घोषित काम जेमिनी फाइनेंशियल सर्विसेज को चलाना है (कंपनी की वेबसाइट यह दावा करती है कि वो ओईसीडी और उभर रही एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के बीच लेन-देन और पूंजी-प्रवाह के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखती है), ये सारे तथ्य मिलकर हितों के टकराव और लॉबीइंग की संभावना को भी जन्म देते हैं. ये वे समस्याएं हैं, जिन्हें सत्ता के गलियारों से हमेशा के लिए मिटा देने का वादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था.

शौर्य डोभाल राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे हैं और यह ‘संयोग’ भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में किसी रोग की तरह फैले वंशवाद की समस्या में एक नया आयाम जोड़ता है.

वर्तमान राजनीतिक माहौल को देखते हुए, इस रिश्ते पर सार्वजनिक तौर पर शायद ही कभी बहस होती है. इस बात का थोड़ा सा अंदाजा लगाने के लिए कि हितों के इस संभावित टकराव को लेकर चुप्पी कितनी अस्वाभाविक है, यह समझने के लिए एक बार को मान लेते हैं कि सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा सऊदी अरब के एक राजकुमार से जुड़े वित्तीय सेवा फर्म के पार्टनर के तौर पर देश के रक्षा मंत्री और वाणिज्य मंत्री को अपने थिंक टैंक मे शामिल करते हैं और फिर सिलसिलेवार ढंग से कई आयोजन करते हैं. इन आयोजनों के लिए पैसा जिन कंपनियों द्वारा चुकाया जाता है, उनका नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता.

जूनियर डोभाल और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव द्वारा चलाए जाने वाले इंडिया फाउंडेशन के निदेशकों में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, वाणिज्य और उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु, दो राज्य मंत्रियों- जयंत सिन्हा (नागरिक उड्डयन) और एमजे अकबर (विदेश मंत्रालय) के नाम शामिल हैं.

चार मंत्रियों, संघ परिवार के एक कद्दावर नेता और एक कारोबारी जिनके प्रभावशली पिता प्रधानमंत्री कार्यालय में हैं, इन सबने मिलकर इंडिया फाउंडेशन को इतना जबरदस्त सांस्थानिक वजन देने का काम किया है, जिसके बारे में थिंक टैंक की दुनिया के प्रतिष्ठित खिलाड़ी भी सिर्फ सपने में ही सोच सकते हैं.

फाउंडेशन द्वारा आयोजित किए जाने वाले हर कार्यक्रम में उस क्षेत्र के प्रमुख नीति-निर्माताओं की शिरकत होती है, जिसके कारण न सिर्फ इनमें काफी लोग आते हैं, बल्कि प्रायोजकों की भी कोई कमी नहीं होती- इन प्रायोजकों में भारतीय और विदेशी सरकारी एजेंसियां और प्राइवेट कंपनियां, दोनों शामिल हैं.

लेकिन इंडिया फाउंडेशन की सफलता का राज, जो कि वास्तव में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है- इन छह लोगों की प्रत्यक्ष उपस्थिति- हितों के टकराव को लेकर कुछ परेशान करने वाले सवाल भी खड़े करती है.

जयपुर में 2016 में संपन्न इंडिया फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और इंडिया फाउंडेशन के निदेशक राम माधव, राजस्थान के गवर्नर कल्याण सिंह और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह. (फोटो साभार: इंडिया फाउंडेशन)

साथ ही इससे इस आशंका को भी बल मिलता है कि क्या विदेशी और भारतीय कंपनियां फाउंडेशन के कार्यक्रमों को समर्थन इसलिए देती हैं, ताकि वैसे मसलों में, जिनमें उनका व्यापारिक हित जुड़ा हो, सरकार की कृपादृष्टि हासिल की जा सके!

एक ट्रस्ट के तौर पर फाउंडेशन के लिए अपनी बैलेंस शीट और वित्तीय लेन-देन को सार्वजनिक करने की कोई अनिवार्यता नहीं है. इसके बोर्ड में निदेशकों के तौर पर मंत्रियों की उपस्थिति के बावजूद, यह अपने राजस्व के स्रोतों के बारे में कोई जानकारी देने से इनकार करता है.

इस रिपोर्ट के लिए द वायर  ने इन सभी छह निदेशकों को एक विस्तृत प्रश्नावली भेजी थी, लेकिन मंत्रियों ने उसका जवाब नहीं दिया. राम माधव ने यह वादा किया कि कोई ‘उचित व्यक्ति’ इन सवालों का जवाब देगा, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ.

इस सवाल पर कि फाउंडेशन के राजस्व का स्रोत क्या है, शौर्य डोभाल भी द वायर  को बस इतना कहने के लिए तैयार हुए: ‘सम्मेलनों से, विज्ञापनों और जर्नल से.’

उन्होंने इस राजस्व के स्रोत को लेकर पूछे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया. और न ही इस बात का ही कोई स्पष्टीकरण दिया कि इंडिया फाउंडेशन, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि यह एक ट्रस्ट के तौर पर रजिस्टर्ड है, आखिर अपने रोज के कामकाज का खर्चा कैसे उठाता है? इस खर्चे में लुटियन दिल्ली के हेली रोड में लिए गए पॉश मकान का किराया और कर्मचारियों के वेतन शामिल हैं.

इंडिया फाउंडेशन को मिलने वाले पैसों के स्रोत की जानकारी देने को लेकर डोभाल का यह संकोच नया नहीं है. 2015 में भी वे द इकॉनमिक टाइम्स  को बस इतना ही कहने को तैयार थे:

ट्रस्ट के तौर पर रजिस्टर्ड फाउंडेशन की फंडिंग के बारे में पूछे जाने पर डोभाल ने कहा- मासिक जर्नल राजस्व का एक बड़ा स्रोत है.

‘हमें प्रायोजक मिले हुए हैं और हमें विभिन्न स्रोतों से विज्ञापन मिलते हैं. यह सब हमारे द्वारा किए जाने वाले कामों या हमारे द्वारा आयोजित किए जाने वाले सेमिनारों के इर्द-गिर्द किया जाता है. हम विभिन्न अंशधारकों के साथ साझेदारी करते हैं. हम अपने हिस्से का काम करते हैं और वे अपने हिस्से का.’

ऐसे में जबकि इसके निदेशकों में मंत्रियों के नाम शामिल हैं, इन ‘चंदों’ और ‘स्पॉन्सरशिप’ का स्रोत जनहित से जुड़ा काफी अहम मामला बन जाता है. लेकिन इसके बावजूद इसके बारे में काफी कम या नामालूम-सी जानकारी है. सिवाय उन तस्वीरों के जिसे इंडिया फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट पर डाल रखा है.

(यहां रिकॉर्ड के लिए बता दें कि इंडिया फाउंडेशन जर्नल के जिन अंकों की द वायर  ने जांच की, उनमें विज्ञापनों की भरमार नहीं थी.)

विदेशी रक्षा कंपनियों से स्पॉन्सरशिप

इंडिया फाउंडेशन के दो आयोजन (एक हिंद महासागर पर और दूसरा ‘स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट’ पर) के प्रायोजकों के नाम तस्वीरों में दिखाई दे रहे थे. उदाहरण के लिए बोइंग जैसी विदेशी रक्षा और विमानन कंपनियां और इस्राइली फर्म मागल, साथ ही डीबीएस जैसे विदेशी बैंक और कई निजी भारतीय कंपनियों के नाम इसमें बतौर प्रायोजक लिखे हुए हैं.

लेकिन इस स्पॉन्सरशिप की प्रकृति यानी कितना पैसा दिया गया और किसे दिया गया, इंडिया फाउंडेशन को या किसी ‘पार्टनर’ को, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है.

द वायर  ने इंडिया फाउंडेशन में निदेशक चार मंत्रियों को चिट्ठी लिखकर फाउंडेशन द्वारा ऐसे आयोजनों की मेजबानी का औचित्य पूछा, जिन्हें ऐसी कंपनियों द्वारा फंड या डोनेशन दिया गया, जिनके कारोबारी मसले उनके मंत्रालयों के साथ जुड़े हो सकते हैं.

निर्मला सीतारमण से यह पूछा गया कि ‘क्या आप यह स्वीकार करेंगी कि आपके इंडिया फाउंडेशन, जो विदेशी कंपनियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर पैसे लेती है, खासकर उन कंपनियों से जिनका आपके द्वारा संभाले गए मंत्रालयों (वाणिज्य एवं उद्योग और अब रक्षा मंत्रालय) से नाता रहा है, के निदेशक के तौर पर काम करने से हितों के टकराव का मामला बनता है?’

ऐसे ही सवाल सुरेश प्रभु, एमजे अकबर और जयंत सिन्हा से भी पूछे गए. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक इनमें से किसी का भी जवाब नहीं आया.

इंडिया फाउंडेशन की वेबसाइट के निदेशकों से संबंधित पेज से

जब एक पूर्व रक्षा सचिव से द वायर  ने यह पूछा कि क्या रक्षा मंत्री के किसी ऐसे फाउंडेशन के निदेशक के तौर पर काम करने को उचित ठहराया जा सकता है, जिसने उनके मंत्रालय से रिश्ता रखने वाली किसी कंपनी से वित्तीय मदद ली है, तो उनका जवाब था कि ‘निश्चित तौर पर इससे बचा जाना चाहिए.’

इस साल मई में सीबीआई ने मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में भारत द्वारा बोइंग एयरक्राफ्ट की खरीद की प्राथमिक पड़ताल शुरू की.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने सीबीआई के प्रवक्ता आरके गौड़ के हवाले से लिखा था, ‘इसमें लगाए गए आरोप 70,000 करोड़ रुपये की लागत से राष्ट्रीय एयरलाइंस के लिए 111एयरक्राफ्ट की खरीद से संबंधित हैं. ऐसा विदेशी एयरक्राफ्ट निर्माताओं को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया. ऐसी खरीद के कारण पहले से ही खस्ताहाल राष्ट्रीय विमानन कंपनी को और वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा.’

फाउंडेशन के एक निदेशक जयंत सिन्हा विमानन राज्यमंत्री हैं. एक ऐसे थिंक टैंक का सदस्य होना, जो एक ऐसी कंपनी से फंड लेता है, जिसके एयरक्राफ्ट की बिक्री पर जांच चल रही है, स्पष्ट तौर पर हितों के टकराव का मामला बनता है.

द वायर  ने एक पूर्व कैबिनेट सचिव से मंत्रियों के इंडिया फाउंडेशन के बोर्ड में बतौर निदेशक काम करने के औचित्य के बारे में सवाल पूछा. उनका जवाब था, ‘अगर मंत्री फाउंडेशन के निदेशक हैं और फाउंडेशन उनसे जुड़े विषयों पर कॉन्फ्रेंस करता है- मसलन भारत को कैसी रक्षा अधिग्रहण रणनीति अपनानी चाहिए- तब निश्चित तौर पर यह हितों के टकराव का मामला है और इससे परहेज किया जाना चाहिए.’

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यहां तक कि कंपनियों द्वारा फाउंडेशन की फंडिंग में भी हितों के टकराव का मामला बन सकता है, अगर कॉन्फ्रेंस का संबंध ऐसी नीति से हो जिसमें कॉरपोरेट का हित हो.’

हमारे चार्टर में लॉबीइंग शामिल नहीं है: डोभाल

इंडिया फाउंडेशन आधिकारिक तौर पर अपने आपको ‘भारतीय राजनीति के मुद्दों, चुनौतियों और संभावनाओं पर केंद्रित एक स्वतंत्र रिसर्च सेंटर’ कहता है.  लेकिन शौर्य डोभाल एक वीडियो इंटरव्यू में काफी साफगोई से कहते हैं, ‘फाउंडेशन हमारे नीति-निर्माण से जुड़े कई आयामों पर काफी नजदीकी ढंग से भाजपा और सरकार के साथ मिलकर काम करता है.’

इस स्वीकृति को थिंक टैंक के मुखिया के तौर पर पारदर्शिता बरतने की कोशिश भी कहा जा सकता है या ‘कॉरपोरेट फाइनेंस और सलाह’ के व्यापार से जुड़े किसी व्यक्ति का सत्ता से नजदीकी का विज्ञापन के तौर पर भी देखा जा सकता है.

जाहिर है यह अकारण नहीं है कि इस इंटरव्यू को जेमिनी फाइनेंशियल सर्विसेज की वेबसाइट पर लगाया गया है.

इससे पहले एक प्राइवेट इक्विटी फर्म जीअस कैपिटल चलाने वाले डोभाल ने 2016 में अपनी कंपनी का विलय जेमिनी फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (जीएफएस) के साथ कर दिया.

जीएफएस के चेयरमैन प्रिंस मिशाल बिन अब्दुल्लाह बिन तुर्की बिन अब्दुल्लाज़ीज़ अल-साऊद, सऊदी अरब के शासक परिवार के सदस्य हैं और अब्दुल्लाह बिन तुर्की बिन अब्दुल्लाज़ीज़ अल-साऊद के बेटे हैं.

जेमिनी का होम पेज संभावित ग्राहकों से कहता है,

‘हम मामले के हिसाब से अपने ग्राहकों के लिए रणनीतिक सलाहकार के तौर पर काम करते हैं. सामान्य तौर पर ये गैर-परंपरागत स्थितियां हैं, जिनमें कॉरपोरेट विवाद समाधान, नए/कठिन बाजारों और जॉइंट वेंचरों में दाखिला (या उससे बाहर निकलना) शामिल है.’

जेमिनी फाइनेंशियल सर्विसेज की कोर टीम: संस्थापक पार्टनर प्रिंस मिशाल बिन अब्दुल्लाह बिन तुर्की बिन अब्दुल्लाज़ीज़ अल साऊद (बाएं) शौर्य डोभाल (बीच में), सैयद अली अब्बास (दाएं).

 

जेमिनी के कार्यक्षेत्र को देखते हुए द वायर  ने डोभाल से यह पूछा कि क्या इंडिया फाउंडेशन के निदेशक के तौर पर उनकी भूमिका में- जहां साफ तौर पर कैबिनेट मंत्रियों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों तक उनकी विशेष पहुंच है, जिनमें से कई नाश्ते की बैठकों और थिंक टैंक द्वारा आयोजित दूसरे कार्यक्रमों में नियमित तौर पर शिरकत करते हैं- और एक फर्म के पार्टनर के तौर पर उनकी भूमिका में, जो विदेशी और देशी निवेशकों के साथ कारोबार करती है- हितों के टकराव का मामला बनता है?

उनका जवाब था, हितों के टकराव का सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि इंडिया फाउंडेशन न तो खुद से, न ही किसी दूसरे की ओर से कोई व्यापारिक लेन-देन करता है.’

साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘इंडिया फाउंडेशन एक थिंक टैंक है, जिसका अस्तित्व 2009 से है. इसकी गतिविधियों में रिसर्च, राष्ट्रीय महत्व के मसले पर एक दृष्टिकोण तैयार करके उसका प्रसार करना शामिल है. इसके काम में लॉबीइंग या इससे जुड़ी कोई अन्य गतिविधि शामिल नहीं हैं.’

भले प्रकट रूप में फाउंडेशन लॉबीइंग में शामिल न होता हो, लेकिन इसके आयोजनों को साफ तौर पर कॉरपोरेट्स और दूसरे हितधारकों को अहम अधिकारियों के साथ मिलने का मौका देने के वादे के इर्द-गिर्द तैयार किया जाता है.

साफ तौर पर इन अधिकारियों को अपनी व्यस्तताओं को बीच में छोड़कर इंडिया फाउंडेशन के निमंत्रण पर आना पड़ता है क्योंकि इसकी पहुंच सरकार के सबसे ऊंचे स्तरों तक है.

जरा इंडिया फाउंडेशन द्वारा फिक्की के साथ मिलकर ‘स्मार्ट बॉर्डर मैनेजमेंट’ विषय पर कराए गए एक आयोजन की प्रचार बुकलेट की भाषा पर ध्यान दीजिए, यह अपने संभावित क्लाइंट्स से पूछता है:

‘आप किससे मिलने की उम्मीद करते हैं’ और उसके बाद मंत्रियों और विभागों की पूरी सूची प्रदर्शित करता है, जो वहां आने वाले हैं.

सरकारी अधिकारी और निजी क्षेत्र के खिलाड़ी कॉन्फ्रेंसों और दूसरे आयोजनों में अक्सर एक-दूसरे से मिलते-जुलते रहते हैं. लेकिन मंत्रियों का निदेशक होना इंडिया फाउंडेशन को अतिरिक्त वजन देता है.

इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या मंत्रियों के पदों का इस्तेमाल एक थिंक टैंक की साख और पहुंच को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है, जो अपने राजनीतिक जुड़ाव को किसी से छिपाता नहीं है?

विदेशी पैसे से भारतीय राष्ट्रवादी दृष्टिकोण’ का विकास

इसकी वेबसाइट के मुताबिक इंडिया फाउंडेशन, ‘भारतीय राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को स्पष्ट’ करना चाहता है. इंडिया फाउंडेशन का विजन एक शीर्ष थिंक टैंक बनने का है, जिसकी मदद से भारतीय सभ्यता के समकालीन समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने में मदद मिल सकती है.’

लेकिन दूसरे स्वयंसेवी संगठनों की ही तरह, जिन पर भाजपा और मोदी सरकार अक्सर ‘राष्ट्रद्रोही’ होने का आरोप लगाती है, इंडिया फाउंडेशन भी अपनी गतिविधियों के लिए विदेशी चंदे पर निर्भर है.

एक ट्रस्ट यानी गैर सरकारी संगठन के तौर पर इंडिया फाउंडेशन की हैसियत को देखते हुए, इसके द्वारा विदेशी चंदे का इस्तेमाल फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशंस रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के अंतर्गत आता है.

हालांकि डोभाल, माधव और चार मंत्री-निदेशकों ने फाउंडेशन को विदेशों से मिलने वाले चंदे को लेकर द वायर  द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब नहीं देने का फैसला किया, मगर गृह मंत्रालय द्वारा संचालित fcraonline.nic.in वेबसाइट इस बात की पुष्टि करती है कि इंडिया फाउंडेशन के पास 2022 तक के लिए वैध एफसीआरए सर्टिफिकेट है और इसका नवीकरण (रिन्यूअल) 6 जून, 2017 को किया गया.

एफसीआरए वेबसाइट से हालांकि यह पता नहीं चलता कि इंडिया फाउंडेशन को पहली बार एफसीआरए सर्टिफिकेट कब दिया गया?

‘रिन्यू की आखिरी तारीख’ का उल्लेख यह दिखाता है कि फाउंडेशन के पास पहले भी एफसीआरए सर्टिफिकेट था, लेकिन एफसीआरए लाइसेंसधारक सभी गैर सरकारी संगठनों के लिए पिछले चार वर्षों के लिए अनिवार्य ‘विदेशी मुद्रा रिटर्न’ फाइलिंग के डेटाबेस की जांच करने पर शौर्य डोभाल के इंडिया फाउंडेशन की कोई एंट्री नहीं मिली.

हालांकि वहां हर साल के लिए एक इंडिया फाउंडेशन का जिक्र जरूर था, लेकिन वह राजदूत सूर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रजिस्टर्ड इंडिया फाउंडेशन है, जो मुख्य तौर पर सड़कों पर घूमनेवाले बच्चों को भोजन और आश्रय और गरीबों को स्वास्थ्य सेवा देने के क्षेत्र में काम करता है.

यह माना जा सकता है कि एफसीआरए की वेबसाइट ने इंडिया फाउंडेशन के सर्टिफिकेट को गलती से नवीकरण के तौर पर दिखा दिया है. द वायर  ने जिस चार्टर्ड अकाउंटेंट से संपर्क किया, उसने सीरियल नंबर के आधार पर बताया कि संभवतः यह सर्टिफिकेट नया है.

इसलिए एफसी रिटर्न का न होना अपने आप में समस्या नहीं है. लेकिन एक नए एफसीआरए रजिस्ट्रेशन से यह सवाल जरूर पैदा होता है कि आखिर यह एनजीओ अब तक विदेशी पैसा हासिल करने में किस तरह कामयाब रहा.

गृह मंत्रालय द्वारा गैर सरकारी संगठनों की किसी खास गतिविधि के लिए विदेशी फंड का इस्तेमाल करने के संबंध में ‘पूर्व अनुमति’ लेने का नियम दिया गया है, लेकिन दिल्ली क्षेत्र के लिए ऐसी इजाजत दिए जाने संबंधी एफसीआरए वेबसाइट के डेटाबेस में 2015 तक इंडिया फाउंडेशन के नाम पर कुछ नहीं मिलता. 2015 के बाद की कोई जानकारी यहां उपलब्ध नहीं है.

द वायर  ने शौर्य डोभाल से इंडिया फाउंडेशन के एफसीआरए आवेदन का ब्यौरा मांगा और साथ ही यह मानते हुए कि एफसीआरए का डेटाबेस अपूर्ण हो सकता है, यह सवाल भी पूछा कि क्या इसने ‘पूर्व अनुमति’ के रास्ते से कोई विदेशी पैसा प्राप्त किया है, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया.

गैर सरकारी संगठन कभी-कभी वाणिज्यिक सेवा करारों (कॉमर्शियल सर्विस काॅन्ट्रैक्ट) के रास्ते से भी विदेशी पैसा प्राप्त करते हैं.

लेकिन डोभाल ने अपने पहले के जवाब में यह कहा था कि इंडिया फाउंडेशन ‘किसी तरह का वाणिज्यिक लेन-देन नहीं करता है’ यानी विदेश से पैसा हासिल करने का यह रास्ता भी पहले से ही बंद दिखाई देता है.

एक ऐसे समय में जब मोदी सरकार ने एफसीआरए के उल्लंघन- चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक- का इस्तेमाल गैर सरकारी संगठनों के बैंक खातों पर ताला जड़ने के लिए किया है, एक थिंक टैंक जिसके निदेशकों में मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता शामिल हैं, का विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता न बरतना दोहरे रवैये की ओर इशारा नहीं करता!

प्रधानमंत्री कार्यालय की चुप्पी

द वायर  ने प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा से पूछा कि क्या उन्होंने और मोदी ने उन मंत्रियों के संभावित हितों के टकराव की ओर ध्यान दिया है, जो निदेशक के तौर पर भी काम कर रहे हैं?

साथ ही इस तथ्य की ओर भी कि शौर्य डोभाल के पिता पीएमओ के शीर्ष अधिकारी हैं, जिनके अधिकार क्षेत्र में ऐसी वार्ताओं का हिस्सा होना शामिल है, जिनका सरोकार ऐसे फैसलों से हो सकता है, जो इंडिया फाउंडेशन के आयोजनों को प्रायोजित करने वाली कंपनियों से ताल्लुक रखते हों?

इस संबंध में भी कोई जवाब नहीं आया.

इन चार मंत्रियों, राम माधव और शौर्य डोभाल के अलावा इंडिया फाउंडेशन के कुछ अन्य निदेशक भी भाजपा से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं- पूर्व स्तंभकार और नामांकित कोटे से राज्यसभा सदस्य स्वप्न दासगुप्ता, सेवानिवृत्त आईएएस और अब नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के निदेशक शक्ति सिन्हा, प्रसार भारती बोर्ड के चेयरमैन ए. सूर्य प्रकाश.

फाउंडेशन के अन्य निदेशकों में भारतीय सेना के थिंक टैंक सेंटर फॉर लैंड वॉरफेयर स्टडीज  के पूर्व निदेशक ध्रुव सी. कटोच, पूर्व नौसैना अधिकारी आलोक बंसल, जिन्होंने इससे पहले इडसा  में काम किया, अशोल मित्तल जो खुद को एक स्टूडेंट मेंटरिंग कंपनी का मैनेजिंग डायरेक्टर बताते हैं, आईसीडब्ल्यूए  के पूर्व अध्यक्ष चंद्र वाधवा और कोलकाता के बावरी ग्रुप के चेयरमैन बिनोद भंडारी शामिल हैं.

(स्वाति चतुर्वेदी पत्रकार हैं और दिल्ली में रहती हैं.)

सौजन्य: द वायर

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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