ग्लैमर की चाहत : देश की हकीकत

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-ललित सुरजन||

भारत की रीता फारिया ने 1966 में मिस वर्ल्ड का खिताब जीता था। इस सौन्दर्य प्रतियोगिता में मुकुट पहनने वाली वे पहली भारतीय होने के साथ-साथ पहली एशियन युवती भी थीं, स्वाभाविक है कि उन दिनों रीता फारिया ने अखबारों में खूब सुर्खियां बटोरीं। तेईस वर्षीय रीता मूलत: गोवा की थीं और उनका मध्यवर्गीय परिवार तब की बंबई में रहता था। रीता उस समय एमबीबीएस अंतिम की छात्रा थीं और कुछ माह बाद ही डॉक्टर बन गई थीं। मिस वर्ल्ड स्पर्धा के आयोजकों के साथ प्रतिभागियों को एक अनुबंध करना होता है। रीता फारिया को भी खिताब जीतने के बाद एक साल के लिए इस अनुबंध के तहत काम करना पड़ा जिसमें कुछेक सौंदर्य प्रसाधनों के लिए मॉडलिंग करने के अलावा उन्हें वियतनाम अमेरिकी सेना के मनोरंजन के लिए भी जाना पड़ा। इसे लेकर रीता फारिया की देश के भीतर बहुत आलोचना हुई क्योंकि भारत की जनता का खुला समर्थन अमेरिकी आधिपत्य से आजाद होने से लड़ रही वियतनामी जनता के साथ था।

भारत की प्रथम विश्व सुंदरी को प्रायोजक कंपनी के साथ हुए करार का पालन तो करना ही था, लेकिन यह अच्छा हुआ कि उन्होंने ग्लैमर की दुनिया से तुरंत बाद विदा ले ली। उन्होंने उसके बाद मॉडलिंग न कर एक डॉक्टर के रूप में काम करना प्रारंभ किया। एक डॉक्टर से ही विवाह किया और चकाचौंध से अपने आपको दूर कर लिया। उन्हें धीरे-धीरे लोग भूल भी गए। लगभग तीन दशक बीत गए। 1994 में उनका नाम पुराने लोगों को एक बार फिर याद आया जब सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या ने क्रमश: मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड के खिताब हासिल किए। फिर तो भारत में जैसे विश्व सुंदरियों की कतार ही लग गई। युक्ता मुखी, प्रियंका चोपड़ा, डायना हेडन, लारा दत्ता आदि ने बाद के वर्षों में इन प्रतियोगिताओं में विजय मुकुट धारण किया। 1966 और 1994 के बीच जो तीन दशक बीते उस दरम्यान भारत में बहुत से परिवर्तन आए।1960 के दशक का भारत आत्मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ रहा था। तीन-तीन युद्ध, अकाल, संसाधनों का अभाव, इन कमियों के बावजूद जनता कृतसंकल्प थी कि एक नए देश का निर्माण करना है। विश्व रंगमंच पर भारत किसी का पिछलग्गू बनने के बजाय तीसरी दुनिया के देशों का नेतृत्व कर रहा था।
1966 में एक भारतीय युवती का विश्व सुंदरी बनना हमारे लिए एक खबर तो थी, लेकिन उसमें कोई बहुत गर्व करने लायक बात हमने नहीं समझी। देश की जनता जानती थी कि ऐसी सौंदर्य प्रतियोगिताओं का असली मकसद सौंदर्य प्रसाधनों की बिक्री बढ़ाना है, लेकिन 1994 आने तक भारत ने अपने आपको नवपूंजीवादी वैश्विकतंत्र से जोड़ लिया था। 1991 में पी.वी. नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था की नींव भारत में डाली गई वह बिना विघ्न-बाधा के चली आ रही है। सच तो यह है कि इसका बीजारोपण 1980 के आसपास हो चुका था। यद्यपि उसे अंकुराने में एक दशक का वक्त लग गया। इसलिए जब 1994 में भारत की दो किशोरियों ने विश्व सुंदरी के खिताब जीते तो देशवासियों को लगा मानो उन्होंने दुनिया को मुट्ठियों में कर लिया हो।

इन प्रतियोगिताओं के असली मकसद पर परदा डालने के लिए बेजोड़ बहाने ढूंढे गए। कहा गया कि मिस वर्ल्ड हो या मिस यूनिवर्स, यह खिताब अंग प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि प्रतिभागी के बौद्धिक स्तर को आंक कर दिया जाता है जबकि इस बौद्धिक स्तर के परीक्षण के लिए मात्र एक सवाल पूछा जाता था। जिस प्रतियोगिता में प्रतिभागी की देहयष्टि का परीक्षण इसलिए होता हो कि वह एक आकर्षक मॉडल बन सकती है या नहीं को किनारे कर सिर्फ एक सवाल में उसकी बुद्धिमत्ता मान ली गई और हम अपने देश की एक किशोरी के पुरस्कार जीतने पर खुशी से झूम उठे। यह इसलिए हो सका क्योंकि हमारी आंखों में एक नया सपना पलने लगा था। मैंने लगभग उन्हीं दिनों लिखा था कि ”इंडिया हैज अराव्इड” के गुरूर में हम अपने जीवन की वास्तविकता को नजर अंदाज कर रहे हैं। यही समय तो था जब शेयर मार्केट में उछाल आना शुरू हुआ था और हर्षद मेहता को देश के नौजवानों के लिए आदर्श सिद्ध किया जा रहा था। एक तरफ सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय, दूसरी तरफ हर्षद मेहता और केतन पारेख; एक तरफ विश्व सुंदरियां, दूसरी तरफ पूंजी बाजार के सटोरिए।

आप जानना चाहेंगे कि आज मुझे ये सारे प्रसंग क्यों याद आ रहे हैं। हुआ यह कि देश की बहुप्रसारित और प्रतिष्ठित पत्रिका इंडिया टुडे का 30 अक्टूबर 2017 का अंक मेरे सामने आया तो बीते दिनों के ये प्रसंग अनायास ध्यान आ गए। इस अंक की कवर स्टोरी या मुख्य कथा स्वदेशी सुपरमॉडल्स पर है। मुख पृष्ठ पर पुणे की एक मॉडल रसिका नवारे की न्यूयार्क में खींची गई तस्वीर है जिसमें वह गगनचुंबी इमारतों की ऊंचाइयों से होड़ ले रही है, साथ में शीर्षक है कि दुनिया के फैशन जगत में कैसे भारतीय मॉडल उच्च शिखर तक पहुंच रहे हैं। पत्रिका में प्रकाशित यह सचित्र आलेख तथ्यपरक है और सूचित करता है कि भारत की युवतियां मॉडलिंग की दुनिया में अपार सफलताएं प्राप्त कर रही हैं। पुणे, अहमदाबाद, बंगलुरु, मुंबई यहां तक कि ऊंटी, करनाल और रूद्रपुर जैसे छोटे नगरों से निकलकर ये लड़कियां पेरिस, मिलान, न्यूयार्क और लंदन जैसे महानगरों में धाक जमा रही हैं।

कुल मिलाकर रोचक पठनीय सामग्री है, लेकिन इससे आगे बढ़कर यह हमें नए भारत की एक नई सामाजिक सच्चाई से भी परिचित कराती है। भारत की कोई लड़की मिस वर्ल्ड बने या सुपरमॉडल, यह उसकी निजी पसंद, अभिलाषा, परिश्रम का परिणाम है। जैसे बछेंद्री पाल या संतोष यादव की एवरेस्ट विजय पर हमें गर्व होता है, वैसे ही देश की इन लड़कियों की कड़ी स्पर्धा में सफलता पर भी हम प्रसन्नता व्यक्त कर सकते हैं। भारतीय स्त्री पारंपरिक, रूढ़िवादी ढांचे से निकल कर अपनी नई अस्मिता स्थापित कर रही है, अपनी स्वतंत्र पहचान बना रही है, तो यह भी प्रसन्नता का विषय होना चाहिए। लेकिन मेरे मन में एक अलग किस्म का सवाल उभरता है कि भारत की नई पीढ़ी जो स्वप्न देख रही है क्या वह उसका अपना अकेले का स्वप्न है या उसके मनोलोक में कहीं देश की भी कोई तस्वीर है। यदि है तो वह किस तरह की है।

मुझे एक बात रह-रह कर परेशान करती है कि बीते वर्षों में हमने भारत को दो समानांतर सामाजिक इकाइयों में विभक्त कर दिया है। एक तरफ नितांत निजी इच्छाएं हैं जिनको पूरा करने की चाहत में एक वर्ग अपनी सारी शक्ति खर्च कर दे रहा है और इच्छा यदि पूरी हो जाए तो शेष समाज से वह एक अमिट दूरी बना लेता है। दूसरी तरफ लगभग सौ करोड़ की विशाल आबादी है जिसके सामने शायद कोई सपना ही नहीं है। जिसकी इच्छाओं पर पहरा बैठा दिया गया है। देश की प्रभुसत्ता जिनके हाथों में है वे उसे बीच-बीच में थपकियां देकर बहलाते रहते हैं। इसके विस्तार में न जाकर सिर्फ स्त्रियों की ही बात करूं तो इस विशाल वर्ग में वे लड़कियां हैं जिनका विवाह बचपन में कर दिया जाता है, जिनके कन्यादान के लिए सरकार पैसे देती है और आकर्षक नामों की सरकारी योजनाएं चलाई जाती हैं। अनेक प्रकार से मोहताज बेटियां क्या स्वप्न देखें और कैसे देखें?

सचमुच एक नया भारत बन रहा है, जिसमें मुखपृष्ठ पर सुपरमॉडल है और भीतर भगवा वस्त्रधारी योगी युवा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का सात पेज का विज्ञापन! देश को इन दोनों समानांतर धाराओं के बीच अपना रास्ता तय करना है।

{ललित सुरजन प्रसिद्ध दैनिक देशबंधू के संपादक हैं}

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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