Home देश इज ऑफ डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट क्या साबित करती है..

इज ऑफ डूइंग बिज़नेस रिपोर्ट क्या साबित करती है..

-गिरीश मालवीय||

कल विश्वबैंक की इज ऑफ डूइंग बिज़नेस में 130 से 100 स्थान पर आ जाने पर मोदी सरकार खुशी से फूली नही समा रही है लेकिन यह उछाल इसलिए भी है क्योंकि मोदी सरकार ने इसी वर्ष में जीएसटी ओर नोटबन्दी जैसे बड़े कदम उठाए हैं जो वास्तव में बड़े कारपोरेट के हितसाधक हैं और यह कदम वास्तव में छोटे और मध्यम वर्ग के व्यापारियों का धंधा उठाकर बड़े पूंजीपतियों के हाथ मे दे देने की साजिश हैं ओर यह रिपोर्ट उसी तथ्य की पुष्टि करती है.

यह रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में कारोबार शुरू करना, कंस्ट्रक्शन परमिट लेना, ऋण उपलब्धता, अल्संख्यक निवेशकों की सुरक्षा, टैक्स का भुगतान, सीमा पार कारोबार, अनुबंध लागू करना और दिवालियेपन के समाधान जैसे संकेतकों में सुधार हुआ है. लेकिन बाकी स्थानों पर हालात जस के तस बने हुए है.

कल बीबीसी ने एक लेख में इस इज ऑफ डूइंग बिजनेस की पड़ताल की. बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी ने आर्थिक विशेषज्ञ भरत झुनझुनवाला से पूछा तो उन्होंने हकीकत बयान कर दी उन्होंने कहा कि “मुख्य सवाल यह है कि क्या देश के छोटे कारोबारियों के लिए कारोबार करना आसान हो गया है?

इसमें लोगों से बातचीत के आधार पर मेरा अनुभव कहता है कि आम आदमी और छोटे बिज़नेस करने वालों के लिए सुधार नहीं हुआ है.
दूसरा सवाल यह है कि अगर रैंकिंग सुधर रही है तो एफ़डीआई कम क्यों आ रही है? पिछले साल क़रीब सात महीनों में जो एफडीआई (विदेशी निवेश) आया, वो 26 बिलियन डॉलर था. लेकिन उसके बाद 22 बिलियन डॉलर ही आया. यानी एफ़डीआई भी आना कम हो रहा है. अगर रैंकिंग सुधर रही है तो एफ़डीआई कम क्यों आ रही है?”

दरअसल मूल बात यह है कि देश के बाज़ार में मांग ही नही है और नीतिगत स्तर पर मांग पैदा करने का कोई उपाय भी नहीं हुआ है.
भरत झुनझुनवाला कहते हैं कि सरकार इस रिपोर्ट पर अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन इससे ज़मीनी सुधार नहीं हुआ है. मैं दावे से कह सकता हूं कि अब भी निवेश में बढ़ोतरी नहीं होगी, क्योंकि देश में मांग ही नहीं है.

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