छह महीने पुराने स्टॉक के नियम से परेशान हैं कारोबारी..

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-संजय कुमार सिंह||

जीएसटी नियमों के अनुसार देश में इसकी शुरुआत, यानी एक जुलाई 2017 के छह महीने बाद संबंधित इनवॉयस के बगैर किसी सामान पर ट्रांजिशनल क्रेडिट का दावा नहीं किया जा सकेगा। यानी छह महीने पहले खरीदे गए सामान अगर अभी तक नहीं बिके हैं तो उसे बेचने और उसपर जीएसटी लेने जमा करने में दिक्कत है। मैं बहुत तकनीकी विस्तार में नहीं जाकर मोटे तौर पर ऐसे बताऊंगा कि विक्रेता जो सामान खरीदता है वही बेचता है। जीएसटी में उसे हिसाब देना है कि उसने कब किससे कितने में क्या सामान खरीदा उसपर क्या टैक्स दिया। और इसमें तालमेल होना चाहिए। नियम के लिहाज से पहली नजर में यह भले ठीक लग रहा है पर जीएसटी लागू होने से पहले से खरीदे (जब इस तरह हिसाब रखना जरूरी था, नियम ऐसे नहीं थे और मुमकिन है कुछ सुविधाएं भी रही हों) सामान के मामले में अब यह नियम है छह महीने बाद उसपर ट्रांजिसनल जीएसटी क्रेडिट दावा नहीं किया जा सकेगा। मोटे तौर पर इसका मतलब यही है कि पुराने सामान बेचे ही नहीं जा सकेंगे।

ऐसे में विक्रेताओं के समक्ष यह समस्या है कि वे अभी तक नहीं बिके सामान का क्या करें। मजबूरी में पहला तरीका यही हो सकता है कि सस्ते में बेचने की कोशिश की जाए। चर्चा है कि सिले-सिलाए कपड़ों से लेकर कई दूसरे सामान जो खराब नहीं होते हैं और बाद में भी बेचे जा सकते हैं, मजबूरी में छूट पर या सस्ते में बेचने पड़ेंगे और खुदरा विक्रेताओं के पास ऐसा स्टॉक भरा पड़ा है। ऐसे में अनुमान है दिसंबर में इन्हें आधी कीमत तक पर बेचा जा सकता है या कहिए कि बेचना ही पड़ेगा। इस आशय की खबर बिजनेस टुडे ने इकनोमिक टाइम्स के हवाले से छापी भी है। खुदरा विक्रेताओं के पास 31 दिसंबर से पहले स्टॉक खत्म करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। स्टॉक खत्म करने के लिए सस्ते में बेचे जाने वाले सामान में रसोई के उपकरणों से लेकर खिलौने आदि सब कुछ होंगे। अखबारों ने जानकार सूत्रों के हवाले से छापा है कि विक्रेताओं को बहुत मामूली मुनाफे पर अपना स्टॉक खत्म करना होगा।

हालांकि, कई खुदरा विक्रेताओं को उम्मीद है कि सरकार छह महीने की मियाद को बढ़ाएगी और जीएसटी के तहत ट्रांजिशनल क्रेडिट का दावा करने की अंतिम तिथि आगे बढ़ेगी। कुछ दुकानदार घाटे में या कम मुनाफे पर सामान बेचने के मुकाबले जोखिम उठाने की योजना बना रहे हैं और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी कार्रवाई करने की भी योजना बना रहे हैं। वकीलों की राय मुकदमा करने पर अदालत से राहत मिलने की उम्मीद दिलाती है। ऐसे में जानकारों का अनुमान है कि सरकार कारोबारियों के हक में फैसला करेगी। आप जानते हैं कि दिवाली के मौके पर इस बार बिक्री अच्छी नहीं हुई इसलिए भी स्टॉक बचा रह गया है। अभी तो कारोबारी इस स्टॉक को रखने की समस्या से जूझ रहे हैं (क्योंकि सामान बिक नहीं रहे हैं) बाद में जब यह बेचने लायक नहीं रह जाएगा तो और बड़ी समस्या होगी। जैसा कि मैं पहले लिख चुका हूं, जीएसटी कौंसिल की बैठक नौ नवंबर को होने वाली है और इस बार भी पिछले महीने की तरह चुनावी फैसले होने की उम्मीद है।

सेल्स टैक्स बार एसोसिएशन, दिल्ली ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसे सुनवाई के लिए 30 अक्टूबर 2017 को सूचीबद्ध किया गया था। इसके जरिए जीएसटीएन के पोर्टल या सॉफ्टवेयर की कई गड़बड़ियों का जिक्र किया गया है और कोर्ट को यह बताया गया है कि इन गड़बड़ियों से जीएसटी के प्रावधानों पर अमल करने में कंसलटेंट्स या कर निर्धारकों को काफी परेशानी हो रही है। बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सुधीर सांगल ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है, “6 नवंबर को जीएसटीएन के साथ बैठक और 11 दिसम्बर को अदालत में अगली सुनवाई निर्धारित है” । हाईकोर्ट में वकीलों का प्रतिनिधित्व श्रीमती प्रेमलता बंसल, वरिष्ठ अधिवक्ता और श्री पुनीत अग्रवाल ने किया।

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति प्रतिमा एम. सिंह की खंडपीठ ने सिस्टम की तमाम गड़बड़ियों का नोटिस लिया और जीएसटीएन की उपाध्यक्ष श्रीमती काजल सिंह को जीएसटीएन के टेक्निकल और लीगल विभाग का काम संभालने वाले व्यक्तियों की टीम के साथ बार एसोसिएशन के तीन प्रतिनिधियों से 6 नवंबर 2017 को मिलने का निर्देश दिया, ताकि वह उनकी परेशानियों, चिंताओं और सिस्टम में गड़बड़ियों को समझ सकें। अदालत ने जीएसटीएन को खुले दिमाग से इन मुद्दों पर विचार करने और इसे अपने खिलाफ याचिका न मानने के लिए कहा। जीएसटीएन 11 दिसंबर 2017 को सीलबंद लिफाफे में स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष दाखिल करेगा।

इस बीच, व्यापारियों को सामान सस्ते में बेचना पड़ा तो सरकार कह सकती है कि जीएसटीएन से आम लोगों को सामान सस्ते में मिल गया। अगर चुनावी लाभ लेने के लिए तारीख बढ़ा देती है तो कारोबारी खुश हो जाएंगे। जीएसटी की प्रयोगशाला में सरकार के दोनों हाथ में लड्डू है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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