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गुलाब कोठारी जी, खुद के गिरेबान में भी तो झांक लें……

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-राकेश कुमार शर्मा||

जयपुर। राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी आजकल राजस्थान सरकार को कोसते हुए खूब संपादकीय लिख रहे हैं। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को टारगेट करते हुए उनके लेख में भ्रष्ट लोकसेवकों के बचाने के संबंध में लाए गए विधेयक, मास्टर प्लान में छेड़छाड़, भ्रष्टाचार को लेकर खूब टीका-टिप्पणी होती है। इन लेखों में वे सुप्रीम कोर्ट, राजस्थान हाईकोर्ट के फैसलों का खूब हवाला देते हैं। आज के लेख में भी गुलाब कोठारी ने भ्रष्ट लोकसेवकों के बचाने वाले काले कानून में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है। साथ ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को लपेटते हुए यह फैसला किया है कि जब तक काले कानून को सरकार वापस नहीं लेती है, तब तक पत्रिका सीएम राजे व उनसे संबंधित समाचार को प्रकाशित नहीं करेंगी।

गुलाब कोठारी के दोगलेपन के साथ हम नहीं है। आज उनके मन-मुताबिक काम नहीं हो रहे हैं तो वे सरकार और सीएम राजे के खिलाफ है। कल उनकी पटरी बैठ जाएगी तो गुणगान करने से नहीं चूकेंगे। वे बार-बार सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड में राजस्थान पत्रिका व अन्य मीडिया संस्थानों को अपने पत्रकारों व गैर पत्रकारों के वेजबोर्ड, एरियर देने के आदेश दे रखे हैं। कोर्ट में मुंह की खाने के बाद भी वे कोर्ट के आदेश की पालना नहीं कर रहे हैं। बेजवोर्ड के लिए संघर्षरत तीन सौ से अधिक पत्रिका कर्मियों को गुलाब कोठारी और उनके संस नीहार कोठारी व सिद्धार्थ कोठारी ने नौकरी से बर्खास्त करके, दूसरे राज्यों में तबादले और निलंबित करके प्रताड़ित किया। प्रताड़ना का यह दौर आज चल रहा है। खैर यह प्रताड़ना ज्यादा नहीं चलेगी। जल्द ही गुलाब कोठारी एण्ड संस को मुंह की खानी पड़ेगी इस मामले। मास्टर प्लान और भ्रष्टाचार पर खूब जोशीले संपादकीय लिखते हैं, लेकिन खुद के कारनामे उन्हें नहीं दिखते। हां राजस्थान के बिल्डर, नेता, अफसर और जागरुक लोग इनके जमीनी और विज्ञापन प्रेम के बारे में खूब जानते हैं और भुगतभोगी भी। इनके भी जमीनी कारनामों कम नहीं है। चाहे दिल्ली रोड का हो या सेज का, किसी से छुपा नहीं। पत्रिका में रहते हुए मेरी कितनी ही खबरें इनकी सौदेबाजी की भेंट चढ़ी। दूसरे पत्रकार साथियों की खबरों के साथ भी ऐसा होता रहा है। हां, जलमहल झील मामले में इनकी चलने नहीं दी। वो कल भी मेरे व मेरी टीम के हाथ में था और आज भी…यह जरुर है इसकी कीमत नौकरी देकर चुकानी पड़ी।

गुलाब कोठारी जी, दूसरों को कानून का पाठ पढ़ाते समय, पहले खुद के गिरेबां में झांक लेना चाहिए। पहले अपने कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन-भत्ते दे, जिसे बारे में सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है। श्रम कानूनों की पालना पहले खुद करें। कर्मचारियों के लिए आठ घंटे तय हैं, लेकिन बारह से पन्द्रह घंटे तक काम लिया जा रहा है। कुछ महीनों से तो पत्रिकाकर्मियों को प्रिंट के साथ टीवी चैनल, वेबसाइट में भी झोंक रखा है। पत्रिका ने एक कारनामा किया है। 50 से 70 रुपए रोज के हिसाब से पत्रकार तैयार कर रही है। बेकारी के इस युग में युवा इस कीमत में पत्रकारिता करने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसी बहुत सी बातें है, जो पत्रिका और पत्रिका के मालिकों के थोथे आदर्शों को उजागर कर करती है। वो समय-समय पर की जाएगी और सामने भी लाई जाएगी।

सीएम वसुंधरा राजे, गाहे-बगाहे गुलाब कोठारी और उनके संपादकीय मण्डल के भुवनेश जैन, राजीव तिवाडी, गोविन्द चतुर्वेदी आपको और आपकी सरकार के बारे में अपने लेखों में सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट का हवाला देकर कानून का पाठ पढ़ाते रहते हैं। पत्रिका प्रबंधन कितना कानून की पालना करते हैं, किसी से छुपा नहीं है। हम पत्रकारों ने आपके श्रम विभाग और मुख्य सचिव को मजीठिया बेजबोर्ड मामले में सैकड़ों परिवाद दे रखे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश रखे हैं। सरकार की एक इच्छा शक्ति इन्हें घुटने टिका सकती है। इनके जमीनी कारनामें कम नहीं है। आप भी इनके कारनामों की जांच करवाकर उनकी पोल जनता के सामने ला सकते हैं। ताकि जनता के बीच इनकी हकीकत व सच्चाई सामने आ सके।

राकेश कुमार शर्मा राजस्थान पत्रिका, जयपुर के चीफ रिपोर्टर रहे हैं..

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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