जीएसटी दरों से प्लास्टिक उद्योग खफा

Page Visited: 237
0 0
Read Time:6 Minute, 20 Second

-संजय कुमार सिंह||

जीएसटी लागू होने से पहले प्लास्टिक उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत उत्पाद शुल्क और वैट लगता था। इस आधार पर जीएसटी कौंसिल ने प्लास्टिक के ज्यादातर उत्पादों पर 18 फीसदी जीएसटी लागू किया लेकिन कथित लक्जरी आयटम पर 28 फीसदी की दर तय कर दी गई। अब इसमें जीएसटी का फायदा क्या हुआ? फायदा तो तब होता जब 18 प्रतिशत से कम वाले को 5 प्रतिशत या अधिक से अधिक 12 प्रतिशत की रेंज में रखा जाता और इसकी भरपाई कुछेक लक्जरी आयटम से की जाती जिसे साढ़े 17 की जगह 18 या 28 प्रतिशत (हालांकि यह बहुत ज्यादा है) के वर्ग में रखा जाता। अभी कुछ ही आयटम पर टैक्स 12 प्रतिशत है। इस हिसाब से अभी तो टैक्स बढ़ा ही है। और इनपुट टैक्स क्रेडिट के लाभ की बात की जाए तो उसकी प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है और उसके बदले कई छोटे उत्पादक टैक्स दायरे में आ गए हैं – उनका क्या होगा। इस तरह तो कीमतें बढ़ेंगी, उद्योग धंधे का नुकसान होगा जबकि दावा उपभोक्ताओं को लाभ होने का किया जा रहा है।

प्लास्ट इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष केके सेक्सरिया कहते हैं कि जीएसटी की दरें जल्दबाजी में तय की गई हैं। प्लास्टिक फर्नीचर, बुने हुए तारपोलीन (तिरपाल), बगैर बुने रैफिया फैब्रिक, ऑफिस एवं स्कूलों को आपूर्ति किए जाने वाले प्लास्टिक के सामान, पीवीसी फ्लोरिंग, पीई इंटर लॉकिंग मैट्स, वैक्यूम फ्लास्क और अन्य कई प्लास्टिक के सामान जिनका कहीं उल्लेख नहीं है, उनका इस्तेमाल मुख्यत: आम लोगों द्वारा किया जाता है। ऐसे सामान पर जीएसटी दर 28 फीसदी लागू करना आम लोगों के साथ छोटे उद्योगों के ऊपर भी गहरा आघात है। जिन उत्पादों का इस्तेमाल आम लोग करते हैं उन पर दर ज्यादा है जबकि जिनका उपयोग उद्योग जगत या फिर पैसे वाले करते हैं उन पर जीएसटी दर कम है इसीलिए सरकार को इन विसंगतियों को दूर करना होगा।

प्लास्टिक कारोबारियों के संगठन प्लास्ट इंडिया के वीके तापडिय़ा कहते हैं कि सरकार स्वच्छ भारत की बात करती है लेकिन प्लास्टिक से तैयार होने वाले शौंचालयों पर जीएसटी 28 फीसदी है। पढ़ेगा तो बढ़ेगा इंडिया का प्रचार किया जाता है लेकिन स्कूल में इस्तेमाल होने वाली पानी की बोतल, पेंसिल बॉक्स और फर्नीचर पर जीएसटी 28 फीसदी है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सबको घर देने की बात सरकार कर रही है लेकिन पीवीसी फ्लोरिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक 28 फीसदी के वर्ग में रखी गई है। गरीबों द्वारा अपनी झोपड़ पट्टी को बारिश से बचाने के लिए तिरपाल का इस्तेमाल किया जाता है वह भी 28 फीसदी के दायरे में है।

प्लास्टिक इंडस्ट्री के जानकार जयेश भाई कहते हैं प्लास्टिक इंडस्ट्री में करीब 80 फीसदी उत्पादन एमएसएमई कारोबारी करते हैं। अभी तक 1.5 करोड़ रुपए तक का कारोबार करने वाली इकाइयों पर उत्पाद शुल्क नहीं लगता था यानी सिर्फ वैट देकर कारोबार होता था लेकिन अब सभी को जीएसटी पंजीकरण कराना ही होगा। ऐसे में ये विसंगतियां एसएमई को सबसे अधिक प्रभावित करेंगी। जिससे प्लास्टिक उत्पाद की कीमत करीब 10 फीसदी बढ़ जाएगी। देश हित में जीएसटी को लागू किया जा रहा है लेकिन इन विसंगतियों को दूर करके ही इसके लक्ष्य को पाया जा सकता है।

यही हाल फर्नीचर का है और इसपर मैं पहले लिख चुका हूं। पहले 12 फीसदी टैक्स लगा करता था, जिसको बढ़ा कर 28 फीसदी कर दिया गया है. अब फर्नीचर के छोटे-बड़े शोरूम्स के मालिकों के साथ-साथ फर्नीचर बनाने वाले छोटे से छोटे फैक्ट्री मालिक या कारोबारी भी टैक्स के दायरे में आ जाएंगे, जिनको अभी तक टैक्स के नाम पर एक पैसा नहीं देना पड़ता था। जीएसटी लागू होने के साथ-साथ किसी भी तरह का फर्नीचर लग्जरी आइटम की कैटेगरी में आ जाएगा. इसी के चलते उस पर लगने वाला टैक्स 28 प्रतिशत कर दिया गया है यानी अगर अब आप कोई फर्नीचर खरीदने की सोच रहे हैं तो आपको ज्यादा पैसे चुकाने पड़ेंगे। फर्नीचर व्यापार संघ के प्रेसिडेंट रतिंदर भाटिया का कहना है, ‘हमारा विरोध जीएसटी को लेकर नहीं है, हम फर्नीचर को लग्जरी आइटम की कैटेगरी में रखने से नाराज़ हैं, फर्नीचर किसी भी घर के लिए लग्जरी नहीं जरूरत है और उस पर 28 फीसदी कर लेना कहीं से जायज़ नहीं है।’

(बिजनेस स्टैंडर्ड, राजस्थान पत्रिका और आजतक के साइट पर प्रकाशित खबरों के आधार पर)

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this:
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram