अप्रत्याशित होंगे हिमाचल विधानसभा के चुनावी नतीजे..

admin

-विनायक शर्मा||
जनता की जागरूकता, न्यायपालिका की सख्ती और मिडिया के मिलेजुले प्रयासों का सुफल ही कहा जाएगा जिसके चलते देश में उच्च स्तर के भ्रष्टाचार के नित नए खुलासे हो रहे हैं. बड़े-बड़े नेताओं, ऊँची पहुँच व रसूखदार सफेदपोशों के खिलाफ. चुनावी माहोल में इस प्रकार के खुलासे पक्ष-विपक्ष के दलों को आरोप लगाने का न केवल सुअवसर देते हैं बल्कि किसी हद तक चुनावी नतीजों पर प्रभाव भी डालने में भी सफल रहते हैं. मजे की बात तो तब हो जाती है जब सत्ता के संघर्ष में भिड़े दो बड़े दलों के नेताओं पर समान रूप से भ्रष्टाचार व अनियमितताओं के आरोप लगें तो ऐसी परिस्थिति में निर्णायक भूमिका निभाने वाले निष्पक्ष मतदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह देखने की बात होगी. हमारा इशारा निश्चित रूप से भाजपा व कांग्रेस के नेताओं व उनके परिजनों की पूँजी में एकाएक बढ़ोतरी होने के समाचारों व आरोपों की ओर ही है.

हिमाचल प्रदेश विधानसभा के चुनावों के ठीक पहले आंतरिक समस्याओं से घिरी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को जहाँ उनके मनोबल को बढ़ाने और नई उर्जा के साथ चुनावी समर में उतरने की आवश्यकता है उसके ठीक विपरीत तीन बार केन्द्रीय मंत्री रहे वर्तमान मुख्यमंत्री जो सातवीं मर्तबा मुख्यमंत्री बनने का दावा ठोंकने वाले कांग्रेस के वीरभद्र सिंह एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गये. इसके साथ ही उन पर आय से अधिक धन-संपत्ति का मामला विभिन्न अदालतों में चल रहा है जिसमें वो जमानत पर चल रहे हैं. भ्रष्टाचार के आरोपों को झेल रहे वीरभद्र सिंह को परेशान करनेवाला ताजातरीन मामला उनके सुपुत्र और शिमला(ग्रामीण) से विधानसभा के उम्मीदवार विक्रमादित्य सिंह पर एकाएक 1 करोड़ से 84 करोड़ की प्रापर्टी रखने का आरोप है.

दूसरी ओर प्रदेश की सरकार और संगठन से भी वर्तमान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को निरंतर अनेक प्रकार की चुनौतियाँ मिल रही हैं. इस बीच पूर्व केन्द्रीय मंत्री रहे कांग्रेस के पंडित सुखराम ने भी संगठन और सरकार में निरंतर अनदेखी का आरोप लगाते हुए हिमाचल विधानसभा के सदस्य और वर्तमान मंत्रिमंडल के सदस्य अपने सुपुत्र अनिल शर्मा सहित कांग्रेस से किनारा करते हुए न केवल भाजपा की सदस्यता गृहण की बल्कि वीरभद्र सिंह पर अपने विरुद्ध षड्यंत्र रचने का का भी आरोप लगा दिया. भ्रष्टाचार के आरोप में जमानत पर चल रहे पंडित सुखराम को राजनीतिक तौर से कांग्रेस ने अवश्य ही हाशिये पर धकेल दिया है, परन्तु मंडी सहित प्रदेश के कुछ बड़े कांग्रेसी नेताओं पर उनका व्यक्तिगत प्रभाव और कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी पकड़ को नाकारा नहीं जा सकता. मुझे 90 के दशक में कांग्रेस के ही सत्तारूढ़ विधायकदल कांग्रेस द्वारा सुखराम के नेतृत्व में चलाये गए वीरभद्र सिंह हटाओ मुहीम के दौर का आज भी स्मरण है, जब दिल्ली में सुखराम के शासकीय आवास में प्रदेश के अनेक बड़े कांग्रेसी चेहरे एकत्रित हुआ करते थे.

दो दलीय चुनावी मुकाबले के लिए प्रसिद्ध देवभूमि हिमाचल में नयी विधानसभा के गठन के लिए 9 नवम्बर को होने जा रहे विधानसभा चुनावों का नजारा इस बार कुछ अलग और विचित्र सा है. यूँ तो कहा जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनावों के लिए तैयारियां जोरों पर हैं जिसमें विधानसभा की 68 सीटों के लिए होने वाले चुनावों में कुल 476 उम्मीदवारों ने परचा भरा था. नाम वापसी नामांकन रद्द होने के पश्चात् अब केवल 349 उम्मीदवार चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. परम्परागत कांग्रेस के पक्ष में मतदान करनेवाले और 1 प्रतिशत के आसपास मत हासिल करनेवाले वाम दलों के भी 16 प्रत्याशी इन चुनावों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को आतुर है.

प्रदेश के विधानसभा के चुनावों में जो गहमा-गहमी और जिस प्रकार की राजनीतिक भागमभाग व उत्साह पूर्व के चुनावों में हुआ करता था वह इस बार के चुनावों से नदारद है. राजनीतिक दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ-साथ प्रदेश की आम जनता भी खामोश व संशय में दिखाई दे रही है जिसने आनेवाले 5 वर्षों के लिए जन-आकांक्षाओं की पूर्ति और प्रदेश के चहुँमुखी विकास के लिए सत्ता की बागड़ोर सँभालने के लिए अपने जन-प्रतिनिधियों का चुनाव करना है. एक ओर जहाँ चुनाव सर पर आ गया है वहीँ दूसरी ओर अभी तक गुटों में विभक्त सत्तारूढ़ दल कांग्रेस चुनावी वैतरणी पार करने से पूर्व अपनी नाव के तमाम छिद्रों व टूट-फूट की यथासंभव मुरम्मत भी नहीं कर पाया. बागी उम्मीदवारों की समस्या से कांग्रेस व भाजपा दोनों को ही सामान रूप से दो-चार होना पड़ रहा है. भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों को जहाँ 9 बागियों का सामना करना पड़ेगा वहीं इसके विपरीत कांग्रेस के लिए उसके 11 बागी उम्मीदवार परेशानी का सबब बने हुए हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि जहाँ भाजपा को मोदी की लहर और सत्तारूढ़ दल से मतदाताओं की 5 वर्षों की नाराजगी का लाभ मिलने की उम्मीद है वहीँ दूसरी ओर कांग्रेस में आन्तरिक कलह के चलते भीतरघात, मतदाताओं की नाराजगी कांग्रेस के पक्ष में पडनेवाले वाम दलों के परम्परागत मतों के नुक्सान की आशंका कांग्रेसजनों को भी सता रही है. इन सब के बीच चुनावी दंगल में किसी तीसरे गठबंधन या शक्ति की उपस्थिति न होने के कारण सभी सीटों पर सीधी टक्कर की सम्भावना के चलते मतों का स्थानांतरण तो संभव दिखता है, परन्तु मतों के बिखराव की लेशमात्र भी सम्भावना नहीं है. ऐसे हालातों के चलते चुनावी ऊँट किस करवट बैठेगा इसका आंकलन या पूर्वानुमान लगाना बहुत ही कठिन कार्य है.

भाजपा शीर्षकमान ने टिकटों के आबंटन में जिस प्रकार का रुख अपनाया है उससे प्रदेश में स्थापित गुटों और उनके मुखियाओं को तो यह स्पष्ट सन्देश गया है कि संगठन का एकमात्र उद्देश्य चुनाव जीतना है न कि आंतरिक गुटबाजी को प्रश्रय देना. टिकटों के आबंटन और चुनावक्षेत्रों में बदलाव के पीछे की मंशा से यह स्पष्ट भी होता है. वैसे भी सत्ता की ताकत को अलग कर यदि देखा जाये तो भाजपा में वर्तमान में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जिसका प्रदेश के सभी 68 निर्वाचन क्षेत्रों पर यथोचित प्रभाव हो. मोदी के नाम के सहारे चुनावी वैतरणी को पार करने को उद्दत भाजपा संगठन को यह समझना चाहिए कि केंद्र की भांति राज्य स्तर के ऐसे नेता का होना भी आवश्यक होता है जिसकी लगभग सभी चुनावी क्षेत्रों में पैठ हो.

हिमाचल प्रदेश के विधानसभा के 1990 से चुनावों के नतीजों पर यदि एक नजर डाली जाये तो विपरीत परिस्थितियों में भी भाजपा या कांग्रेस को 35 से 36 प्रतिशत मत मिलना इस बात को स्पष्ट करता है कि इस पहाडी प्रदेश में इन बड़े दलों का लगभग 35 प्रतिशत मतों पर एकाधिकार है. शेष रहे 30 प्रतिशत मतों का एक बड़ा भाग निर्णायक भूमिका निभाते हुए जहाँ कांग्रेस या भाजपा को सत्ता की कुंजी सौंपने का कार्य करता है वहीँ कुछ प्रतिशत मत मौसमी दलों या रंग में भंग डालने की नियत से खड़े हुए निर्दलीय प्रत्याशियों के हिस्से में भी आते हैं. 2012 में संपन्न हुए प्रदेश के चुनावों में मात्र 5 प्रतिशत मतों के अंतर ने ही भाजपा के मिशन रिपीट के लक्ष्य को डिफीट में बदल दिया था. इस चुनाव में कांग्रेस ने जहाँ 42.81 प्रतिशत मत लेकर 36 विधायकों को लेकर सरकार बनाने में सफलता मिली थी वहीँ तत्कालीन सत्तारूढ़ दल भाजपा को 38.47 प्रतिशत के साथ 26 विधायकों को लेकर विपक्ष में बैठना पड़ा था. अब यदि 2014 के संसदीय चुनावों के नतीजों को देखें तो वह चुनाव एकतरफा सा दिखाई देता है. भाजपा ने इस चुनाव में प्रदेश की सभी चारों संसदीय सीटों पर अप्रत्याशित विजय प्राप्त की थी. अब यदि दलों को प्राप्त मत-प्रतिशत को देखें तो भाजपा ने जहाँ 53.85 प्रतिशत प्राप्त किये वहीँ कांग्रेस ने भी 41.07 प्रतिशत मत प्राप्त करते हुए अपनी सम्मानजनक उपस्थिति दर्ज करने में सफलता प्राप्त की थी. हालांकि सीटों के मामले में कांग्रेस को शून्य से ही संतोष करना पड़ा था.

राजनीतिक विश्लेषकों का अनुभव यह दर्शाता है कि 2012 के चुनावों में भी जहाँ तत्कालीन भाजपा सरकार के विरुद्ध कोई विशेष मुद्दा नहीं था ठीक उसी प्रकार, वर्तमान कांग्रेस की सरकार के विगत 5 वर्षों के कार्यकाल से भी जनता को कोई विशेष नाराजगी नहीं है. पिछली भाजपा सरकार भी अपनी आंतरिक कलह और भीतरघात के कारण मतदान में पिछड़ गई थी ठीक उसी प्रकार की परिस्थिति को वर्तमान सरकार भी झेल रही है. फिर भी भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवारों में सीधी टक्कर होने के कारण, इतना तो स्पष्ट है कि प्राप्त होनेवाले मतों के प्रतिशत में चाहे बहुत अधिक अंतर न हो, लेकिन सीटों पर विजय के मामले में अनुभव के आधार पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि प्रदेश के वर्तमान चुनावों के नतीजे अप्रत्याशित होंगे. अनेक बड़े वृक्ष धराशाही हो जायेंगे और अनेक ऐसे प्रत्याशी विजयश्री पाने में सफल होंगे जिनके जीतने की भी सम्भावना नहीं थी.

कुल मिला कर यह तो स्पष्ट है कि कांग्रेस के मिशन-रिपीट को मिशन-डिफीट में बदलने में भाजपा सफल रहेगी. वर्तमान सरकार को under water current यानि अदृश्य देशव्यापी मोदी-लहर का मुकाबला भी करना है जिसका कितना असर आगामी चुनावों पर कितना पड़नेवाला है इसका मूर्तरूप तो मतगणना वाले दिन यानि 18 दिसंबर को ही देखने को मिलेगा.

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

जीएसटी दरों से प्लास्टिक उद्योग खफा

-संजय कुमार सिंह|| जीएसटी लागू होने से पहले प्लास्टिक उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत उत्पाद शुल्क और वैट लगता था। इस आधार पर जीएसटी कौंसिल ने प्लास्टिक के ज्यादातर उत्पादों पर 18 फीसदी जीएसटी लागू किया लेकिन कथित लक्जरी आयटम पर 28 फीसदी की दर तय कर दी गई। अब इसमें […]
Facebook
escort eskişehir - lidyabet - macbook servis - kabak koyu
%d bloggers like this: