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जीएसटी की समस्या सिर्फ टैक्स दर नहीं है..

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-संजय कुमार सिंह||

गुजरात चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जबसे जीएसटी में छूट देने की बात कही है – रोज अलग-अलग घोषणाएं हो रही हैं। तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। एक दिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ट्वीट करके कोई घोषणा कर देते हैं और दूसरे दिन राजस्व सचिव अगली छूट का एलान कर देते हैं। इससे आम आदमी को तो यही संदेश जाता है कि अगर मंत्री या राजस्व सचिव चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं। इससे अपेक्षाएं बढ़ती हैं और पूरी न होने पर नाराजगी भी। कायदे से होना यही चाहिए कि जीएसटी कौंसिल की बैठक में निर्णय लिए जाएं और उसके बाद ही कोई घोषणा हो। वह भी हर बार और हर महीने नहीं। वरना नियमों या दरों की कोई गंभीरता ही नहीं रहेगी।

यह अच्छी बात है कि जीएसटी नेटवर्क के सॉफ्टवेयर में आने वाली गड़बड़ियों को भी ठीक करने की कोशिश की गई है और इन सारी चीजों के लिए आवश्यक व्यवस्था भी की जाती दिख रही है। पर मेरा मानना है कि जीएसटी को जल्दबाजी में लागू करने से पहले समझा नहीं गया। चार महीने तक पूरे देश को जीएसटी की प्रयोगशाला बना कर रखा गया और अब जब चुनाव भारी लग रहा है तो उसमें दिखावटी छूट देने की व्यवस्था हो रही है। इसमें कुछ भी व्यावसायिक या पेशेवर नहीं है। इसका नुकसान देशवासियों को हो रहा है। देश की अर्थव्यवस्था को हो रहा है। इसलिए, जो कुछ भी किया जाना है जल्दी और सोच-समझ कर किया जाना चाहिए। हालांकि, पहले कहा जा चुका है कि इसमें एक साल लगेगा। पर रोज-रोज अटकलें तो ना लगें।

जीएसटी का मसला इतना सीधा नहीं है। जीएसटी से परेशानी टैक्स दर नहीं है। टैक्स तो सेवा उपयोग करने वाले से लेकर देना है – इसमें क्या परेशानी हो सकती है। टैक्स की दर से आम आदमी को परेशानी होगी। वह तो बोल ही नहीं रहा है। हालांकि, कारोबारी भी कई बार उपभोक्ता होते हैं और टैक्स की भारी दर उन्हें चुभती है। पर तभी तक जब तक कमाई न हो। जिसकी कमाई है जो हजार रुपए का खाना खा रहा है उसे टैक्स में 100 रुपए देने पड़ें या 200 ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। फर्क तब पड़ता है जब खाने के लिए 100 रुपए नहीं होते हैं। ऐसे आदमी को टैक्स देने में परेशानी होती है। जीएसटी के साथ परेशानी यह है कि कमाई ही खत्म हो गई है।

इसलिए नहीं कि टैक्स दर ज्यादा है। इसलिए कि टैक्स रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया इतनी मुश्किल है कि उसमें समय लगता है, पैसे लगते हैं। चूंकि समय लगता है इसलिए पैसे भी ज्यादा लगते हैं और चूंकि प्रक्रिया मुश्किल है इसलिए कम पैसे लेकर हर कोई रिटर्न दाखिल भी नहीं कर सकता है। बिना कंप्यूटर संभव नहीं है और कंप्यूटर मेनटेन करने का भी खर्च है। ज्यादातर कारोबारी यह सब खुद नहीं कर सकते। इसलिए 20 लाख तक के कारोबार वालों को जीएसटी से पूरी तरह मुक्त किया जाना चाहिए। यह बड़ी राहत होगी। ऐसे लोग अभी भी टीडीएस कटवाते ही हैं, आयकर रिटर्न भरते ही हैं। इसलिए कोई भाग नहीं रहा, भाग नहीं सकता है।

20 लाख रुपए प्रतिवर्ष से कम का कारोबार करने वाले लोगों पर टैक्स वसूलने की जिम्मेदारी और रिटर्न फाइल करने का बोझ वैसे भी अव्यावहारिक है। दिल्ली एनसीआर जैसी जगहों पर बगैर जीएसटी पंजीकरण दूसरे राज्य का काम करने पर प्रतिबंध दूसरा गंभीर मसला है। एनसीआर की कल्पना सीमा हीन आवाजाही के लिए की गई थी। उस दिशा में काम भी हो रहा है। जीएसटी लागू होने से टोल टैक्स चुंगी खत्म होना है और कारोबार पर रोक। वैसे कारोबार पर भी जिसमें कुछ आता-जाता नहीं है। ई-मेल से सलाह या सेवा भेज दी जाती है। जीएसटी में ही नियम है कि 50,000 रुपए से कम के सामान के लिए ई-वे बिल की जरूरत नहीं है। 50 हजार रुपए का सामान मूल्य, वजन औऱ परिमाण के लिहाज से कुछ होगा पर दो पेज की सलाह इस मुकाबले कुछ नहीं होगी पर सरकार को उसपर जीएसटी चाहिए।

सब कुछ व्यापारियों और कारोबारियों पर डालने की बजाय कुछ काम सरकार को अपने ऊपर या अपने अधिकारियों के ऊपर भी डालना चाहिए। ऊपर मैंने जो सुझाव दिए हैं उसे लागू करके सरकार चाहे तो इनका रिकार्ड सभी का या किसी-किसी का चेक करके अगर जीएसटी की चोरी जैसा को मामला मिले तो उसकी मांग कर सकती है, उसपर जुर्माना लगा सकती है। इस तरह हरेक कारोबारी को परेशान करने से बेहतर होगा उसी को परेशान किया जाए जो पकड़ा जाए या टैक्स चोरी करता है। कंपोजिट स्कीम मेरे ख्याल से जजिया वसूलना है। जबरदस्ती है। यह स्कीम ही जबरदस्ती है। कारोबारियों को मजबूरी का अहसास कराती है। इसे भी खत्म किया जाना चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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