क्योंकि सरकार हत्या का कारखाना न बन जाए..

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-हिमांशु कुमार॥

आखिर क्या कारण है कि गौरी लंकेश की हत्या पर जितना हंगामा बरपा है उतना दूसरे पत्रकारों की मौत पर क्यों नहीं होता ?

जिज्ञासा स्वाभाविक है उत्तर खुद ही खोजना पड़ेगा.

जितना हंगामा दामिनी काण्ड में एक लड़की की बलात्कार के बाद हत्या पर हुआ उतना दूसरी लड़कियों के साथ बलात्कार और हत्याओं पर क्यों नहीं हुआ.

आप सड़क पर कब आते हैं ?

जब आपको डर लगता है.

जब किसी घटना से आप डर जाते हैं और आपको लगता है कि ठीक ऐसा ही आपके साथ भी हो सकता है, तो आप खुद की सुरक्षा के लिए उस घटना का विरोध करते हैं.

जैसे एक मुस्लिम लड़के जुनैद को मारा गया तो सबको लगा कि किसी को अगर सिर्फ मुसलमान होने की वजह से मार डाला जाएगा तो ऐसे में हमारे बच्चे कैसे बाहर निकलेंगे और ट्रेन में सफर कर पायेंगे ?

सब यह भी जानते थे कि इस समय सत्ता पर बैठी हुई पार्टी इस तरह की साम्प्रदायिक आधार पर होने वाली हत्याओं को समर्थन देती है.

और अगर सरकार अपने ही देश के नागरिकों की सम्प्रदाय के आधार पर हत्या करने वालों को समर्थन देगी तो सरकार तो हत्या का कारखाना बन जायेगी क्योंकि सरकार की तो बहुत ताकत होती है.

इसलिए लाखों लोग पूरे देश में नॉट इन माई नेम अभियान में सड़कों पर निकले.

हांलाकि उसके बाद भी कई लोग ट्रेनों में मार डाले गये लेकिन लोग प्रदर्शन करने नहीं गए.

क्योंकि उन प्रदर्शनों का मकसद सरकार को डरा कर उसे इस तरह की हत्याओं के समर्थन से हटाने का था.

क्योंकि कोई भी प्रदर्शन अपराध को नहीं रोक सकता.

सरकार को रोक सकता है.

प्रदर्शन सरकार के खिलाफ होता है अपराध के खिलाफ नहीं.

इसी तरह गौरी लंकेश अगर साम्प्रदायिकता के खिलाफ ना लिखतीं और उनकी हत्या होती.

तो उतना ही हल्ला मचता जितना दूसरे पत्रकारों के लिए होता है.

लेकिन चूंकि वे हिंदुत्व की साम्प्रदायिकता के खिलाफ लिख रही थीं और बार-बार खुद पर बढ़ने वाले खतरे के खिलाफ लिख और बोल भी रही थीं.

तो जैसे ही उनकी हत्या हुई और दक्षिणपंथी कट्टर समूहों ने गाली गलौज शुरू की वैसे ही लोगों का गुस्सा केन्द्रीय भाजपा सरकार के खिलाफ बढ़ने लगा.

फिर से जनता को लगा कि अगर सरकार अपने खिलाफ लिखने वाले की हत्या करवा देगी तो कल जब हम सरकार का विरोध करेंगे तो सरकार हमारी भी हत्या करवा देगी.

इसलिए फिर से पूरे देश में जनता सड़कों पर निकल आयी.

अगर गौरी लंकेश का झगड़ा भी किसी छोटे मोटे अधिकारी या नेता से होता और वो उन्हें मरवा देते तो देश में इतना हंगामा ना होता.

जब भी संवैधानिक नागरिक अधिकारों पर सरकार का हमला होता है तब जनता सड़कों पर आ जाती है.

अगर सरकार लोगों के बोलने, घूमने फिरने खाने पीने पर रोक लगायेगी तो जनता इसी तरह घर से बाहर आकर विरोध करेगी.

क्योंकि जनता को जब अपने ऊपर खतरे का अहसास होता है वह तभी घर से बाहर आती है.

शुक्र मनाना चाहिए कि जनता सत्ताधारी गुंडों से अभी भी इतना नहीं डरी है कि सड़क पर उतरने में डरे.

हांलाकि सत्ता से जुड़े गुंडे लगातार जनता की हिम्मत तोड़ने के लिए उन्हें यही ताने दे रहे हैं कि फलाना मारा गया तब क्यों चुप रहे वगैरह वगैरह.

हम संतुष्ट हैं कि जनता बीच-बीच में आपना गुस्सा दिखा देती है और सत्ता में बैठे गुंडों को उनकी औकात पता चल जाती है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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