पीढ़ियों के संघर्ष में ‘मूर्ति’ के सामने ‘सिक्के’ की बलि

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-बब्बन सिंह॥

ये तो पहले से तय था कि वर्तमान वैश्विक माहौल व प्रमोटरों के साथ लगातार मतभेदों के कारण विशाल सिक्का इन्फोसिस के एमडी और सीईओ पद पर बहुत दिन नहीं रह पाएंगे और आज ऐसा हो भी गया। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह अंतरिम तौर पर यूबी प्रवीण राव को कंपनी की जिम्मेदारी सौंप दी गई है और उनका इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार करते हुए अगली व्यवस्था अर्थात 31 मार्च, 2018 तक उन्हें एग्जिक्युटिव वाइस चेयरमेन पद पर काम करने को कहा गया है। उम्मीद है नए एमडी और सीईओ की नियुक्ति तब तक हो जाएगी।

दरअसल, पिछले छः महीने से कंपनी में कामकाज की संस्कृति में बदलाव, वेतन वृद्धि, नौकरी छोड़नेवाले कर्मचारियों की बढ़ती तादाद, कंपनी छोड़नेवालों को दिए जानेवाले मुआवजे आदि को लेकर प्रमोटर खासकर, कंपनी के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति लगातार काफी मुखर रहे थे। कंपनी के पूर्व सीएफओ राजीव बंसल को मिले मुआवजे पर तो उन्होंने गहरी आपत्ति जताई थी। ऐसे माहौल में ये तय हो गया था कि या तो प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी बेचकर बाहर हो जाएंगे या सिक्का को बाहर होना होगा।

बहरहाल, विशाल सिक्का ने बाहर हो गए पर उन्होंने जाते-जाते अपने मन की भड़ास निकाली और अपने इस्तीफे में अच्छे काम को लगातार नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हुए अपने इस्तीफे में लिखा है कि ऐसे रुकावट भरे माहौल में मेरे लिए काम करना मुश्किल हो गया है इसलिए मैंने इस्तीफा दिया है। हालांकि उन्होंने उनपर लगे तमाम आरोपों के बारे में लिखा है कि वे सारे आरोप बेबुनियाद और झूठे साबित हुए हैं पर उन्होंने शेयरधारकों के हित में इस्तीफा दिया है।

भारतीय संदर्भ में इस पूरे घटनाक्रम को दो पीढ़ियों की लडाई के रूप में देखना जायज होगा। बहुत दिन नहीं बीते जब हमने टाटा ग्रुप में भी इस तरह के संघर्ष को देखा था। हालांकि वहां हटाए गए चेयरमैन साइबर मिस्त्री का टाटा ग्रुप में अच्छी-खासी हिस्सेदारी थी इसलिए इस घटना की शत प्रतिशत तुलना उससे नहीं हो सकती। फिर भी सरसरी तौर पर दोनों जगहों के फेरबदल को देखा जा सकता है।

हालांकि दोनों कंपनियों के दैनिक कामकाज की ख़बरें ज्यादा बाहर नहीं आती हैं फिर भी हमारा अनुमान है कि इनफ़ोसिस में भी टाटा की तरह ही संघर्ष का मूल कारण दैनिक कामकाज में पुराने दिग्गजों के दखल की कोशिश रही होगी। साइबर व सिक्का दोनों इतने अनुभवी तो थे ही कि वे बड़े (बोर्ड) स्तर के संघर्ष को संभाल सकें पर दैनिक कामकाज को रिमोट के माध्यम से चलाने के अपने पुराने वरिष्ठों की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए वे तैयार नहीं थे। लेकिन वे भूल गए कि भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस अभी इतना मजबूत नहीं हुआ है और न ही उनके पुराने वरिष्ठ अपने जीवन भर के योगदान को इतनी जल्दी भूल जाएंगे। वैसे हमारा मानना है कि यह मानव सुलभ मूलभूत कमियां हैं जो दुनिया के किसी देश में देखी जा सकती है। पर परंपरा और नैतिक मूल्यों के बदलाव के कारण अमेरिका जैसे देश में माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों से बिल गेट्स जैसों ने अपनी सेवानिवृत्ति को बहुत सहज ढंग से लिया और दैनिक काम-काज से अपने को पूरी तरह अलग कर लिया। फलतः वहां दो पीढ़ी के संघर्ष सतह पर नहीं आए।

सिक्का तो निश्चित रूप से उस परंपरा और नैतिकता के वाहक हैं। आज के उनके इस्तीफा के कंटेंट से भी इसी बात की पुष्टि होती है। वे नारायणमूर्ति या अन्य प्रमोटरों को अपने दैनिक जीवन में बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं थे। उनके आदर्श स्टीव जोब्स जैसे कॉर्पोरेट के माहिर खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपने मूल्यों की रक्षा के लिए अपने द्वारा स्थापित कंपनी से बाहर हो जाना उचित समझा पर किसी तरह का समझौता नहीं किया। संयोग से किस्मत ने उनका साथ दिया और वे न केवल अपनी कंपनी में वापस लौटे बल्कि उसे एक छोटी-सी अमेरिकी कंपनी से दुनिया की अव्वल कंपनी बना दिया। देखना है कि सिक्का वैसा कुछ कर पाते हैं या नहीं।

वैसे स्टीव बनना आसान नहीं क्योंकि वे एक सजग उद्यमी थे और उनकी एक व्यापक सोच थी। सिक्का के बारे में हम इतने निश्चितता से ये बातें नहीं कह सकते क्योंकि उन्होंने आज तक ऐसा कुछ नहीं किया जो उस तरफ इशारा करे। हां, वे एक अच्छे कॉर्पोरेट मैनेजर हैं। इस बात की पुष्टि इस बात से भी होती है कि कंपनी में रहते हुए उन्होंने मूर्ति सहित किसी प्रमोटर को सामने से कोई चुनौती नहीं दी बल्कि कॉर्पोरेट स्टाइल में चुप्पी साधे रहे और उपयुक्त समय देख इस्तीफा थमा दिया और अपनी भड़ास भी निकाल ली। इस बात की पुष्टि कुछ समय बाद हो जाएगी जब वे किसी और बैनर तले नजर आएंगे।

जैसे राजनीति में दो व्यक्ति के संघर्ष को विचारधारा का जामा पहनाया जाता है वैसे ही टाटा और इनफ़ोसिस के इस संघर्ष में भी सिद्धांतिक तौर पर अलग-अलग मुद्दे को उछाला गया। पर नए और पुरानी पीढ़ी के समर्थकों की आपसी संघर्ष ने इसे एक ऐसे अंजाम पर पहुंचाया जिससे किसी भी पक्ष को बहुत लाभ नहीं होने जा रहा बल्कि व्यापक अर्थों में नुक्सान ही होगा। लगभग छः महीने के अंतराल में इन दोनों कंपनियों में मुख्य कार्यकारी को अपने काम को छोड़ना पड़ा। वैश्विक व देश की अर्थव्यवस्था के वर्तमान हालात तो यही बतलाते हैं कि इससे उबरना न तो टाटा और न इनफ़ोसिस के लिए आसान होगा। लेकिन असली आकलन तो समय ही करेगा।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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