मेरा भी अपहरण और रेप हो सकता था.. अपूर्वा प्रताप सिंह

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-अपूर्वा प्रताप सिंह॥

अप्रैल 2013 में मेरी बड़ी कज़िन बहन की शादी थी और तभी मेरे exams हो रहे थे। पापा ने मुझे डिस्टर्ब न हो इसलिए घर के पास ही एक होटल में मेरे लिए रूम बुक किया था ताकि में वही रहूं और पढूं।

मेरा केमिस्ट्री का पेपर सुबह 7 बजे से था। मैं लेट हो रही थी, हड़बड़ी में साढ़े छह पर निकली। निकलते ही मुझे दूर से एक स्कार्पियो दिखी, मुझे वो मेरे एक जानने वाले की लगी तो मैंने स्कूटर स्लो करते हुए उस गाड़ी को ध्यान से देखा, उससे पास होते हुए समझ आ गया कि यह वो नही है जो सोच रही थी, आगे बढ़ गयी।

पर वो स्कॉर्पियो में बैठे दो लड़कों ने क्या सोचा और वो पीछे लग गए। मैं ने स्कूटर की स्पीड बढ़ा ली थी पर वो मेरे बगल में आके गाड़ी का दरवाजा खोल के हाथ बढाने लगे मेरी ओर। मैंने स्पीड अचानक स्लो की और दूसरे रास्ते मुड़ गयी जहां मुझे अंदाज़ था कि एक दूध का चट्टा है और सुबह लोग होंगे वहां। आगरा वाले जानते होंगे नेता जी के चौराहे से अंदर उच्चायुक्त का घर भी है उस रास्ते पर। वहां तक पहुंचते हुए उन दोनों ने मेरा हाथ पकड़ के खींचा और मैंने स्पीड बढाई। उनके मेरा हाथ खींचने के कारण स्कूटर डिस बैलेंस हुआ और मैं फिसलते हुए गिर गयी। मेरी जीन्स घुटनो से और टॉप कंधे से फट गया। उन लोगों ने गाड़ी रोकी मेरे पास। पर स्कूटर गिरने की आवाज़ तेज़ थी तो चट्टे से लोग देखने निकले बाहर। उन्हें देख के दोनों लड़के भाग गए। गाड़ी पर कोई नम्बर नही था बस सपा का झंडा था।

मेरे पैर कांप रहे थे, लोगों ने मुझे उठाया। स्कूटर भी खड़ा किया। चूंकि मेरा exam था तो दिमाग गया कि पेपर छूट जाएगा। मैं जल्दी में कॉलेज पहुंची पेपर शुरू हो गया था, examiner को मेरे कपड़े दिखे लेकिन उन्होंने कुछ पूछा नही, बाकी लोग मुझे घूर रहे थे। हथेली, घुटनो और कोहनी से खून निकल रहा था। लिखते हुए डर के मारे हाथ कांप रहे थे।

Exam से घर लौटी तो घर में इतनी भीड़ थी शादी के कारण कि बस किसी को कुछ कहा नहीं, काफी दिन बाद बताया।

मान लेते हैं कि उस दिन मेरे संग कुछ हो जाता या मैं उसी के लिए रिपोर्ट लिखाती तो ? जैसा घृणात्मक रवैया मुझे देखने को मिल रहा है वार्णिक के लिए वैसा ही मेरे लिए आप लोग निकालते। आप लोगों की टुच्ची तफ्तीश में जो बातें मेरा कैरेक्टर डिसाइड करती वो ये होतीं –

लड़की अपने घर नही रह रही थी कुछ दिन से, बल्कि होटल में रहती थी।
लड़की क्लास ग्यारहवीं में गालियां दिया करती थी।
लड़की के सब लड़के दोस्त हैं, लड़कों के संग ड्राइव पे जाती थी।
लड़की ने जींस क्यो पहनी थी।
लड़की एन शादी के दिन भी शादी में नही गयी थी मतलब उसका किसी से मिलने का इरादा था उस रात।

फेसबुक पर प्यूबर्टी पर पोस्ट लिखती थी।
लड़की के हाथ मे किसी फोटो में पार्टी के वक्त ग्लास था।
इतना सब कुछ होने के बाद भी लड़की पेपर देने पहुंच गई, यानी लड़की भोली नही थी, खेली कगाई थी, मासूमा होती तो घर जा के रोती, बाप भाई को बताती।
सबसे बड़ी बात – लड़की ने उन लड़कों को गौर से क्यो देखा !
इति सिद्धम कि अपूर्वा एक निहायत ही अय्याश लड़की है और लड़कों के उसको लाइन न मारने के कारण उनसे बदला लेने को यह सब किया।

कहानी खत्म ! पर आप जैसे लोग कभी नहीं समझ पाएंगे कि गिर के उठने में हिम्मत चाहिए होती है, ऐसा कुछ होने के बाद कई दिनों तक डर में जीते हैं, पैर चलते हुए कांपते हैं। पर आपके लिए यह बस गॉसिप करने के मुद्दे हैं।

आपको पता है मैंने घर में क्यो नही बताया था वहां जबकि वो भीड़ तो मेरे अपने ही रिश्तेदारों की थी क्योंकि मुझे विश्वास ही नही था कि पेरेंट्स के सिवा कोई समझ पायेगा यह भी डर था कि लोग सलाह न दें कि घर से निकलना कम कर दो।

आज मुझे लगता है कि मैंने सही किया नही बताया। यह पोस्ट भी मैं पसोपेश में लिख रही हूँ, मेरा पूरा खानदान यहां है, इसे पढ़ने के बाद वो क्या रिएक्शन देंगे !
दुख है यह कि आप तो मरेंगे ही नही लेकिन यह बेशर्म लड़कियां यह सब झेल के भी जिंदा क्यो रह जाती हैं !!

लेखिका- अपूर्वा सिंह, आगरा यूनिवर्सिटी से पहले साइंस ग्रेजुएट हुई फिर पॉलिटी में मास्टर्स किया हुआ है। फिलहाल जानवरों के लिए प्रायसरत हैं, गुड़गांव में डॉग्स शेल्टर कम फोस्टर पर काम कर रही हैं, यह उनके निजी विचार हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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