Home खेल क्यों राहुल-अखिलेश को यह साथ पसन्द है..

क्यों राहुल-अखिलेश को यह साथ पसन्द है..

-क़मर वहीद नक़वी॥

लखनऊ में रविवार को राहुल-अखिलेश के साझा रोड शो के कुछ राजनीतिक सन्देश बड़े स्पष्ट हैं. एक, यह महज़ उत्तर प्रदेश का चुनावी गठबन्धन नहीं है, बल्कि 2019 का विपक्षी राजनीति का रोडमैप है. यानी गठबन्धन को लम्बा चलना है.

दो, दाँव पर सिर्फ़ एक चुनाव की हार-जीत नहीं है, दाँव पर सिर्फ़ दो पार्टियों का तात्कालिक नफ़ा-नुक़सान नहीं है, बल्कि दाँव पर है दो युवा नेताओं का अपना ख़ुद का राजनीतिक भविष्य.

तीन, चुनाव के बाद अगर ज़रूरत पड़ी तो मायावती के साथ भी हाथ मिलाने में उन्हें गुरेज़ नहीं होगा.

और चार, बीजेपी की तीखी आक्रामक राजनीति और हिन्दुत्व के छुहारे छींटने की रणनीति के मुक़ाबले वह प्रगति, समृद्धि और शान्ति की बात करेंगे.

गले लग-लग कर मिलना राहुल-अखिलेश का

और भी कई बातें थीं, जो इस रोड शो में साफ़ दिख रही थीं. दोनों पार्टियों के गठबन्धन में कसैलेपन को लेकर जितनी बातें अब तक हवा में तैर रही थीं, जिस तरह हिचकोले खाते-खाते मुश्किलों से जोड़-पैबन्द लगा कर यह गठबन्धन बन पाया था, और 22 जनवरी को जैसे तने-ठने चेहरों के साथ राज बब्बर और नरेश उत्तम ने गठबन्धन की घोषणा की थी, उस सबको राहुल-अखिलेश ने गले लग-लग कर काफ़ूर करने की कोशिश की.

मतलब दोनों पार्टियों के छोटे-बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं को सन्देश साफ़ था कि इस गठबन्धन के पीछे दोनों युवा नेताओं की निजी केमिस्ट्री है, इसलिए वह इसे गम्भीरता से लें और गठबन्धन को ज़मीन तक ले जायें.

आख़िर क्यों राहुल-अखिलेश ने रविवार को हर तरीक़े से यह जताने की कोशिश की कि यह साथ सिर्फ़ यूपी को ही नहीं, बल्कि ख़ुद उन दोनों को पसन्द है?

अखिलेश के लिए अब इज़्ज़त का सवाल

दरअसल, अखिलेश के लिए इस गठबन्धन को करना, सफल बनाना और चुनाव में उसे सीटों में बदल कर दिखाना नाक का सवाल है. समाजवादी पार्टी जिन कुछ कारणों से टूट के कगार पर पहुँच गयी थी, उनमें काँग्रेस के साथ गठबन्धन का सवाल भी एक बड़ा मुद्दा था.

मुलायम सिंह काँग्रेस से गठबन्धन के पूरी तरह ख़िलाफ़ थे, जबकि अखिलेश को इस गठबन्धन में बड़ा फ़ायदा नज़र आ रहा था. बाप-बेटे में इस पर काफ़ी ठनाठनी थी. यह ठनाठनी अब भी कहीं से कम नहीं हुई है और मुलायम सिंह यादव एलान कर चुके हैं कि वह गठबन्धन के पक्ष में कोई चुनाव-प्रचार नहीं करेंगे.

तो ऐसे में अखिलेश पूरा ज़ोर लगा कर किसी भी क़ीमत पर इस गठबन्धन को फ़ायदे का सौदा साबित ही करना चाहेंगे. वरना चुनाव के बाद वह राजनीति में उस्ताद अपने पिता के पास क्या मुँह लेकर जायेंगे. इसीलिए ‘अखिलेश को यह साथ पसन्द है!’

राहुल और काँग्रेस दोनों के लिए बड़ा मौक़ा

उधर, 2014 की नासपीटी हार के बाद से लगातार विफलताओं का मुँह देख रहे राहुल गाँधी के चेहरे पर रविवार को पहली बार ग़ज़ब का आत्मविश्वास दिखा. राहुल और काँग्रेस दोनों के लिए यह बड़ा मौक़ा है क्योंकि काँग्रेस को उसकी हैसियत से कहीं ज़्यादा 105 सीटें मिली हैं.

और गठबन्धन के बाद अगर काँग्रेस कुछ बेहतर प्रदर्शन कर पाती है और देश को सबसे ज़्यादा सांसद देनेवाले प्रदेश में 27 साल बाद सरकार में शामिल हो पाती है, तो काँग्रेस में बहुत दिनों से लटकी राहुल की ताजपोशी कुछ चमकदार हो सकेगी. उनके नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर उठ रहे सवाल भी कुछ थमेंगे और 2019 के लिए राहुल और काँग्रेस दोनों अपने आप को कुछ बेहतर ‘पोज़ीशन’ कर पायेंगे.

2019 मे विपक्ष की चुनौती क्या होगी?

2019 का यह संकेत राहुल और अखिलेश ने लखनऊ की अपनी साझा प्रेस कान्फ़्रेन्स में बार-बार दिया. यह सवाल काफ़ी दिनों से उठ रहा है कि 2019 में नरेन्द्र मोदी के सामने विपक्ष की चुनौती क्या होगी? अभी तक किसी के पास इसका जवाब नहीं है.

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद काँग्रेस के निश्चेष्ट पड़े रहने के कारण राष्ट्रीय विपक्ष के शून्य को भरने के लिए दो साल पहले नीतीश कुमार ने सारे समाजवादी धड़ों को एक कर पुराने जनता दल को ज़िन्दा करने की कोशिश की थी. तब समझा जा रहा था कि यह नीतीश की ‘स्मार्ट क़वायद’ है, ताकि अगले लोकसभा चुनाव के लिए वह ख़ुद को विपक्ष के मज़बूत दावेदार के तौर पर पेश कर सकें.

लेकिन जनता दल बन भी नहीं सका, और हाल के दिनों में लालू को अरदब में रखने के लिए नीतीश ने जिस तरह मोदी के साथ पींगें बढ़ायी हैं, उससे वह विपक्ष की राजनीति में फ़िलहाल उस मुक़ाम पर नहीं हैं, जहाँ कुछ समय पहले तक थे.

काँग्रेस क्या विपक्ष की धुरी बन सकती है?

तो फिर कौन? वह धुरी क्या होगी, जिसके इर्द-गिर्द 2019 में विपक्ष इकट्ठा हो. ऐसी सर्वस्वीकार्य धुरी की स्थिति में फ़िलहाल काँग्रेस ही नज़र आती है, जैसा कि अभी नोटबंदी के मुद्दे पर बनी विपक्षी एकजुटता के समय दिखायी दिया था.

लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि काँग्रेस अब से लेकर लोकसभा चुनाव तक के सवा दो सालों में अपनी कुछ लय, कुछ दिशा हासिल कर ले. इस लिहाज़ से उत्तर प्रदेश में उसका मज़बूत आधार बनाना ज़रूरी है, क्योंकि 80 सांसद वहीं से आते हैं. अखिलेश के साथ गठबन्धन काँग्रेस को ऐसा आधार दे सकता है, ऐसी उम्मीद राहुल गाँधी को है.

तो अगर बिहार और उत्तर प्रदेश में काँग्रेस ‘जिताऊ’ गठबन्धनों का हिस्सा बनी रहे, तो उसके लिए बड़े फ़ायदे की बात होगी. फिर वह पश्चिम बंगाल में लेफ़्ट फ़्रंट के बजाय पुरानी काँग्रेसी ममता के साथ तालमेल की सम्भावनाएँ भी टटोल सकती है. और जयललिता के निधन के बाद अगर तमिलनाडु में डीएमके का दुबारा उभार होता है, तो उससे हाथ मिलाने का गणित भी बैठा सकती है.

कैसे बैठेगा गणित?

लेकिन कोई भी गणित तो तभी बैठेगा, जब गुणा-भाग के लिए हाथ में कुछ गिनतियाँ हों. इसीलिए राहुल को उम्मीद है कि ‘यूपी को यह साथ पसन्द आयेगा’ और इसीलिए ‘राहुल को यह साथ पसन्द है!’

राहुल-अखिलेश की जोड़ी को पता है कि नरेन्द्र मोदी-अमित शाह के ‘फ़ायर पावर’ का सामना वह नहीं कर सकते. इसलिए खेल के नियम बदलने की रणनीति भी उन्होंने अपनायी है. राम मन्दिर, कैराना, तीन तलाक़, पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसे ध्रुवीकरण के लट्टुओं के ख़िलाफ़ वह तीन ‘पी’ यानी प्रदेश में ‘प्रोग्रेस’ (प्रगति), ‘ प्रॉसपैरिटी’ (समृद्धि) और ‘पीस’ (शान्ति) की ढाल ले कर मैदान में उतरेंगे.

और हाँ, कम से कम राहुल ने यह कर कि मायावती बीजेपी की तरह ‘देश-विरोधी’ राजनीति नहीं करतीं, यह साफ़ इशारा तो कर ही दिया कि बदक़िस्मती से अगर नतीजे मनमाफ़िक़ नहीं आये, तो सरकार बनाने के लिए मायावती की मदद भी ली जा सकती है.

इतने दिनों में पहली बार लगा कि राहुल ने कुछ आगे की भी सोचना सीख लिया है! अच्छी बात है.

बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए 30 जनवरी 2017 को लिखी गयी टिप्पणी.

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