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हे धनुर्धर अर्जुन, तुम शिखंडी नहीं हो..

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-त्रिभुवन॥

झीलों की इस नगरी उदयपुर में कुछ लालची मुनाफाखोर आए दिन निर्दोष लोगों के जीवन को संकट में डालकर उनके चेहरों पर आंसुओं की झीलें बनाते रहते हैं। पूरा प्रशासनिक अमला असहाय होकर देखता रहता है। थोड़ी कानूनी कार्रवाई होती है और फिर इसे भुलाकर हम सब अगली दुर्घटना का इंतजार करते हुए एक और हादसे के लिए तैयार हो जाते हैं।

पुलिस अफसर कहते हैं, ऐसी फैक्ट्रियों की जांच करना हमारी जिम्मेदारी नहीं।
लेकिन दु:शासनों से लड़ने वाला अर्जुन ही अगर खुद को शिखंडी मान ले तो भगवान कृष्ण भी क्या कर सकते हैं!

आईपीसी का अध्याय 14 लोक स्वास्थ्य को लेकर इतना स्पष्ट है कि ऐसे हादसों से पहले पुलिस कहीं भी कभी भी कुछ भी कर सकती है। इसमें कहा गया है कि लोक स्वास्थ्य, आम लोगों का कुशल क्षेम, नागरिकों की सुविधाएं, शिष्टता और सदाचार पर प्रतिकूल असर डालने वाले सभी अपराध पुलिस के दायरे में आते हैं।

आईपीसी में 268 से लेकर 294 तक 26 ऐसी धाराएं हैं, जिनके सहारे पुलिस ऐसे किसी भी अस्पताल, वाहन, फैक्टरी, व्यक्ति, वाहन और मशीन के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है, जो लोक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है।

धारा 268 पुलिस को लोक न्यूसेंस फैलाने वालों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का अधिकार देती है तो 269 आैर 270 में वह संक्रामक रोग फैलाने वालों को जेल की हवा खिला सकती है।

आप भले मानें कि यह खाद्य अपमिश्रण का मामला है, लेकिन बीट कांस्टेबल को अधिकार है कि वह मिलावटी या गंदी चीजें बेचने वाले को धारा 272 और 273 में पैक कर दे।

पुलिस धारा 274, 275 और 276 में नकली दवा बेचने, बनाने और आपूर्ति करने वालों की धर पकड़ कर सकती है।

यही नहीं, पुलिस भले पल्ला झाड़े और इसे अपना काम न माने, लेकिन पुलिस की यह संवैधानिक ड्यूटी है कि अगर कोई किसी जल स्रोत को दूषित करे तो वह उसे नाप ले। उसे झीलों में गंदगी फैलाने वालों को धरपकड़ करने और उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज करने का अधिकार है।

आए दिन कोई कोई प्रदूषण फैलाता रहता है, लेकिन पुलिस अगर धारा 278 में कार्रवाई करे तो किसी की क्या मजाल कि फिर कोई ऐसी हिम्मत कर ले।

आप देखते हैं, कई बार कोई वाहन बिलकुल उल्टी साइड से आ रहा है, किसी को मार ही डालेगा या कोई अपने वाहन को बेतहाशा भगाए ला रहा है, लेकिन कोई कुछ कर ही नहीं पाता। लेकिन पुलिस धारा 279 में कार्रवाई करे तो सड़कों पर ऐसी दहशतगर्दी दूसरे दिन रुक जाए।

मामला चाहे सल्फॉस बेचने का हो या विषैले पदार्थ बेचने का, पुलिस हर जगह कार्रवाई कर सकती है। विस्फोटक पदार्थ के बारे में किसी का उपेक्षापूर्ण आचरण पुलिस को धारा 286 के तहत कार्रवाई का अधिकार देता है।

अगर किसी की मशीन मानव जीवन को संकट में डालने की आशंका ला रही है तो पुलिस को वहां भी कार्रवाई का अधिकार है। यानी आप न तो मोटरसाइकिल पर किसी को पीछे बिठाकर सरिये ले जा सकते हैं और ना ही किसी ट्रक या ट्रेक्टर ट्रॉली में बाहर लटका कर गर्डर या ऐसा कोई सामान ढो सकते हैं।

आईपीसी पुलिस को यह अधिकार तक देती है कि कोई भवन बनाए या तोड़े तो उससे किसी का मानव जीवन संकट में न आए।

आप देखते हैं कि कुछ लोग छुट्टी के दिन अतिक्रमण करते हैं या किसी की आड़ में नियम विरुद्ध निर्माण कर लेते हैं, लेकिन पुलिस ऐसे मामले में धारा 291 के तहत कार्रवाई कर सकती है। लेकिन अगर महाभारत का अर्जुन अपने आपको शिखंडी मान ले तो आप क्या कर सकते हैं।

पुलिस को यह एहसास ही नहीं कि उनका एक बीट कांस्टेबल भी अपने कर्तव्य को पूरा करने पर डट जाए तो वह जनता को खतरा पैदा करने वाली किसी फैक्टरी को क्या, ताकतवर से ताकतवर अपराधी को भी सीधा कर सकता है। लेकिन हमारे पुलिस महकमे का अभ्यास ही ऐसा पड़ गया है कि ताकतवर प्रहरियों का यह काबिल और सक्षम बल अपने आपको नखदंत होते हुए भी उनसे विहीन समझता है, क्योंकि हमारे सत्ताधीशों ने पूरे सिस्टम को खराब कर दिया है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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