मी लॉर्ड, कम-से-कम स्वाधीन परिवेश के जीवन को तो क़ानूनी बाध्यताओं में न जकड़ें..

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-ओम थानवी॥

राष्ट्रगान और तिरंगा हमारा गौरव हैं, हम आज़ाद हैं इसकी मुखर गवाही। लेकिन उसे लेकर क्या इन दिनों हम नाहक फ़िक़्रमंद नहीं हुए जा रहे? अब सर्वोच्च न्यायालय भी जैसे इस फ़िक़्र में शरीक़ हो गया है। आदेश है कि सिनेमाघर में फ़िल्म से पहले अनिवार्यतः जन-गण-मन होना चाहिए और उपस्थित दर्शक उस वक़्त खड़े हो जाएँगे।images-1

 

अदालत की यह भावुकता अच्छी नहीं। इसमें हमारा किंचित हीनभाव ही झलकता है। आदर मन से दिया जाता है, आदेशों से उसका प्रदर्शन या दिखावा सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। सिनेमाघर में कोई बैठा रह गया, उठ न सका, क्या उस पर अदालत की अवमानना का मुक़दमा चलेगा?

तीव्र आशंका इस बात की है कि देशभक्ति ब्रिगेड – जिसकी आजकल बहार है – बैठे, चल रहे या ‘ठीक’ से आदर का इज़हार न कर रहे फ़िल्मदर्शकों से सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर उलझती रहेगी। हिंसा पर भी उतारू हो सकती है। ऐसे में भले दर्शकों का फ़िल्म का मज़ा किरकिरा होगा, राष्ट्रगान की भी हेठी ही होगी।

आदर प्रदर्शन की यह बंदिश सिनेमाघर से शुरू होगी, तो क्यों नहीं नाटक, नृत्य, संगीत, कवि-सम्मेलन, विभिन्न रंगारंग कार्यक्रमों, गोष्ठियों, सभाओं आदि में भी पहुँचेगी। या देशभक्ति ब्रिगेड उसकी माँग उठाने लगेगी। तब माननीय न्यायाधीश क्या करेंगे? न्याय सर्वत्र समान होना चाहिए!

मी लॉर्ड, कम-से-कम स्वाधीन परिवेश के जीवन (जीवन) को तो क़ानूनी बाध्यताओं में न जकड़ें।

(वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की फेसबुक वॉल से)

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