ब्लैक लिस्टेड करेंसी किंग कंपनी डे ला रु का खेल और कांधार कांड..

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-अखिलेश अखिल॥

हम नहीं जानते कि हमारी सरकार नोटबंदी के जरिये हमारा कल्याण कर रही है या फिर कोई राजनितिक और आर्थिक खेल कर रही है। देश की जनता को मोदी जी पर यकीं है। इसलिए कि कही उसकी दरिद्रता दूर हो जायेगी।

चूँकि हमारे देश में नोटबंदी को लेकर कई तरह के किस्से सामने आ रहे हैं वैसे में दुनिया में करेंसी बनाने वाली कंपनियों की जांच पड़ताल जरूरी है। नोटबंदी के इस प्रयास के पीछे मोदी जी की राजनीति कालाधन निकालने भर की हो सकती है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इस खेल के पीछे कोई बड़ी विदेशी साजिश तो नहीं?images-7

ये बातें इसलिए भी कही जा रही है कि जिस आठ नवंबर की रात्रि में मोदी जी राजपत्र संख्या 2652 के तहत देश के 500 और 1000 के नोट को रद्दी बता रहे थे उसी रोज दुनिया में और दो घटनाएं भी हो रही थी । अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत हुई थी और इंगलैंड की प्रधानमंत्री थेरेसा में भारत में नोटबंदी और ट्रम्प की जीत का जश्न मना रही थी।

हो सकता है यह सब महज संयोग हो लेकिन इसके पीछे की राजनीति भी हो सकती है। आपको बता दें कि ब्रिटिश कंपनी डि ला रू दुनिया भर में करेंसी किंग कंपनी के रूप में जानी जाती है। यह कंपनी दुनिया के 150 देशों से ज्यादा की करेंसी छापती है और वहां की सरकार को अपने काबू में भी रखती है। यह कंपनी भारतीय नोट भी छापती रही है। लेकिन एक घटना के बाद पिछली सरकार ने इसे ब्लैक लिस्ट कर दिया था। लेकिन अब फिर इस कंपनी की हमारी सरकार के साथ साठ-गांठ होने की बात सामने आ रही है । सच क्या है इसकी जानकारी सरकार से अपेक्षित है लेकिन यह साफ है कि नोटबंदी के पीछे की एक कहानी मुद्रा की तिलस्मी दुनिया के करेंसी किंग के इर्द गिर्द भी घूमती नजर आ रही है। माया -मोह से परे प्रधानमन्त्री मोदी जी की तरफ देश देख रहा है कि इस नोटबंदी से चाहे जो परेशानी उठानी पड़ रही है अगर देश का भला हो जाए तो सोने पर सुहागा। बीजेपी के अन्य नेताओ से लोगो को यह उम्मीद थी भी नहीं। लेकिन जो रपट सामने आ रही है वह बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है।

सरकार ने अभी हाल ही में 500 और 1000 रूपये के नोटों को बन्द करके 2000 के नये नोटों को पेश करने का निर्णय लिया है। बताया जा रहा है कि ऐसा करने से नकली नोटों एफ आई सी एन, की सहायता से होने वाले आतंकवाद की फंडिंग को रोकने और विध्वंसक गतिविधियां जैसे जासूसी, हथियारों की तस्करी, ड्रग्स और प्रतिबंधित वस्तुओं की कालाबाजारी को रोकने में मदद मिलेगी। लेकिन ऐसे में सवाल यह बन रहा है कि क्या हमारी नई मुद्रा की छपाई में वही कम्पनियाँ तो शामिल नहीं हैं जो कालीसूची में डाली गयीं थीं और जिन कंपनियों की मिलीभगत से पाकिस्तान में नकली मुद्रा छपने के कारखाने चलते थे?
वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान नकली मुद्रा रैकेट का पता लगाने के लिए सीबीआई ने भारत नेपाल सीमा पर विभिन्न बैंकों के करीब 70 शाखाओ पर छापेमारी की तो उन शाखाओं के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा था कि जो नोट सीबीआई ने छापें में बरामद किये हैं वो बैंकों को रिजर्व बैंक से मिले हैं उसके बाद सीबीआईने भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानो में छापेमारी में जाली 500 और 1000 मूल्यवर्ग का भारी गुप्त कैश पाया था, लगभग वैसे ही समान जाली मुद्रा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा भारत में तस्करी से पहुँचाया जाता था।

अब सवाल है कि यह नकली मुद्रा भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानो में कैसे पहुंची? 2010 में सरकारी उपक्रमों संबंधी संसदीय समिति चैक गयी कि सरकार द्वारा पूरे देश की आर्थिक संप्रभुता को दांव पर रख कर कैसे अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी को 1 लाख करोड़ की छपाई का ठेका दिया गया?
अमेरिकी नोट कंपनी (यूसए), थॉमस डे ला रू (ब्रिटेन) और गिसेक एंड डेवेरिएंट कंसोर्टियम (जर्मनी) । ये वो तीन कम्पनियां है, जिसे भारतीय मुद्रा की छपाई करने के लिए ठेका दिया गया था। इस घोटाले के बाद रिजर्व बैंक ने अपने वरिष्ठ अधिकारी को तथ्य तलाशने के लिए डे ला रू के प्रिटिंग प्लांट हैम्पशायर (ब्रिटेन) भेजा। रिजर्व बैंक अपनी सुरक्षा कागज की आवश्कताओं का 95 फीसदी का आयात उसी कंपनी से करता था जो कि कम्पनी के लाभ का एक तिहाई था । फिर भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा डे ला रू को नये अनुबन्ध से दूर रखा गया। डे ला रू के इस झूठ के कारण सरकार द्वारा इसे काली सूची में डाल दिया गया । जिसके कारण 2000 मीट्रिक टन कागज, प्रिटिंग प्रेस और गोदाम आदि सब ऐसे ही पड़े रह गए। इस असफलता के बाद डे ला रू के सीईओ जेम्स हंसी, जो इंग्लैंड की रानी का धर्म-पुत्र है ने बहुत ही रहस्यमय तरीके से कम्पनी छोङ दी। अपने सबसे मूल्यवान ग्राहक “भारतीय रिजर्व बैंक” को खोने के बाद डे ला रू के शेयर लगभग दिवालिया हो गए। इसके फ्रेंच प्रतिद्वन्दी ओबेरथर ने इसका अधिग्रहण करने के लिए नीलामी की कोशिश की जिससे कंपनी किसी तरह बची। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को भेजी शिकायतों में अन्य कम्पनियों का भी उल्लेख किया है। इसमें फ्रेंच फर्म अर्जो विग्गिंस, क्रेन एबी (यूसए) और लाविसेंथल (जर्मनी) शामिल है! हालांकि अभी हाल ही में जनवरी 2015 में गृहमंत्रालय ने जर्मन कंपनी लाविसेंथल को प्रतिबंधित कर दिया, जो कि आरबीआई को बैंक नोट पेपर बेचने के साथ-साथ पाकिस्तान को भी कच्चा नोट बेच रही थी। ऐसे में सवाल उठता है कि कौन हैं ये रूपया छापने वाले? और वो भारत सरकार के मुद्रण तक पहुचे कैसे? कालीसूची में और दिवालियापन के कगार पर होने के बावजूद भी वो लोग कैसे भारतीय बाजार में दुबारा प्रवेश करने की तैयारी कर रहें हैं? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आम भारतीयों को इसके बारे में कुछ पता क्यों नही है? यहाँ पर हम पैसे बनाने वालो का एक छोटा सा किस्सा रख रहे हैं।
मुद्रा कारोबार में प्रमुख क्षेत्र हैं कागज, प्रिंटिंग प्रेस, नोट, स्याही और इंटीग्रेटर्स। इन कामों का जिम्मा सेवा देने वाली कंपनी के कार्यों में आता हैं। ऐसा माना जाता है कि यह व्यापार यूरोप में बहुत ही गुप्त तरीके से लगभग दर्जन भर कम्पनियो द्वारा किया जाता है। इन कम्पनियो की शुरुआत 15वीं सदी के बाद से मानी जाती है। डे ला रू कंपनी का इतिहास और इसके संचालन और कंपनी के संयंत्र का किस्सा इसके 1000 साल पहले से है। डे ला रू ब्रिटिश हुकूमत का आधिकारिक क्राउन एजेंट था, जो कि अभी भी बैंक ऑफ इंग्लैंड के लिए नोट प्रिंटिंग का काम करता है। आधिकारिक इतिहास के अनुसार भारत में बैंक नोट मुद्रण सरकार द्वारा 1928 में भारत सुरक्षा प्रेस की स्थापना के साथ शुरू किया गया । नासिक में प्रेस के चालू होने तक भारतीय करेंसी नोट यूनाइटेड किंगडम के थॉमस डे ला रु जियोरी द्वारा मुद्रित किया जाता था। स्वतंत्रता के बाद भी 50 सालों से भारत अपने रुपये की छपाई डे ला रू से खरीदी हुई मशीन से ही कर रहा है। जो की एक स्विस परिवार जिओरी द्वारा संचालित होती है और नोट मुद्रण व्यापार पर उसका लगभग 90 फीसदी का नियंत्रण है। लेकिन 20वीं सदी के अन्त तक कुछ ऐसी घटनाएँ हुई जिसने सब कुछ बदल के रख दिया।
इंडियन एयरलाइन्स फ्लाइट संख्या -814 का अपहरण 24 दिसम्बर 1999 को भारतीय एयरलाइन्स फ्लाइट संख्या 814 का कुछ गनमैन द्वारा अपहरण कर लिया गया था।

अपहरणकर्ताओं ने विमान को विभिन्न लोकेशन से उड़ाने का आदेश दिया। अमृतसर, लाहौर और दुबई से होते हुए अपहरणकर्ताओं ने अन्त में उसे कान्धार (अफगानिस्तान) में उतारने का आदेश दिया जो कि उस समय तालिबान के नियंत्रण में था। उस विमान हाइजैक वाली घटना में जो नहीं दिखाया गया और जिसे लोग जानते भी नहीं, वह था उस फ्लाइट में मौजूद एक रहस्यमय आदमी। उसका नाम था रोबेर्टो जियोरी और वही डे ला रु का मालिक था। जिसकी वर्ल्ड करेंसी प्रिंटिंग व्यापार पर लगभग 90फीसदी आधिकार है। 50 वर्षीय जिओरी, जिसके पास इटली और स्विट्जरलैंड की दोहरी नागरिकता है, स्विट्जरलैंड के सबसे आमीर आदमियों में एक है। स्विट्जरलैंड ने अपने इस मुद्रा राजा के अपरहण से निपटने, उसकी सुरक्षित रिहाई और नई दिल्ली पर दवाब डालने के लिए हवाई अड्डे पर अपना एक विशिष्ट दूत भेजा। स्विस प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाईजैक के दो दिन बाद रविवार २६ दिसम्बर को स्विस विदेश मंत्री जोसफ डिस की अपने भारतीय समकक्ष जसवंत सिंह के साथ काफी लम्बी टेलीफोनिक बातचीत हुई। स्विस सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए राजधानी बर्न में अलग से एक सेल बनाई और अपने एक विशिष्ट दूत हैंस स्टादर को कान्धार भेजा जो नियमित रूप से ‘बर्न’ को रिपोर्ट करता था। स्विस अखबारों की रिपोर्ट की मानें तो विशिष्ट विमान से स्विट्जरलैंड तक सुरक्षित वापसी के दौरान और बाद में भी रोबेर्टो जियोरी स्विस सरकार के विशिष्ट सुरक्षा घेरे में रहा।
लेकिन यहाँ इस कहानी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी लापता है। यह माना जाता है कि रोबेर्टो जियोरी की सुरक्षित रिहाई के लिए फिरौती भारत सरकार द्वारा चुकाई गयी थी। इस मुद्दे पर न सिर्फ राजनीतिक वर्गों से बल्कि खुफिया तंत्र ने भी आवाज उठाई थी। यह बात कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए ही बहुत शर्मनाक है और निकट भविष्य में संसद को हिला देने की अहमियत रखती है। उस विमान हाइजैक का चाहे जो भी उद्येश्य रहा हो, किन्तु भारतीय जेलो में बन्द आतंकवादियों के सुरक्षित रिहाई के लिए प्लेन अपहरण की रिपोर्ट लिखी गयी। कारवाई 7 दिनों तक चली और बाद में भारत से तीन आतंकवादियों की रिहाई की सहमति पर बात बनी । तीन आतंकी मुश्ताक अहमद जरगर, अहमद उमर सईद शेख, और मौलाना मसूद अजहर विमान अपहरण के नाम पर छोड़े गए। ये आतंकी बाद में मुंबई आतंकी हमले सहित अन्य आतंकी कार्यवाही में शरीक रहे।
क्या डे ला रु नई रुपये के नोटो की छपाई में शामिल है?
इकनोमिक टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार नोट्स मोटे तौर पर अत्यन्त गोपनीयता के साथ मैसूर में छपी है, जबकि कागज जिस पर मुद्रण किया गया है वह इटली, जर्मनी और लन्दन से आऐ थे। अधिकारियो के अनुसार प्रिंटिंग अगस्त-सितम्बर में शुरू हुआ और 2000 रुपये के लगभग 480 मिलियन और 500 रुपये की लगभग एक समान संख्या में नोट मुद्रित किये गए। भारतीय रिजर्व बैंक का मैसूर स्थित भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड, और डे ला रु जियोरी के साथ अनुबन्ध है जो कि वर्त्तमान में केबीएजियोरी, स्विट्जरलैंड नाम से है। दि हिन्दू की खबर के मुताबिक भारत बैंक नोट पेपर यूरोपीय कंपनियों लौइसेन्थल जर्मनी, डी ला रु यू के, क्रेन स्वीडन, अरजो विग्गिन्स फ्रांस और नीदरलैंड से आयात करता है।
भारतीय सुरक्षा एजेंसी के अनुसार भारत ने 2014 में दो यूरोपीयन कंपनियों को कालीसूची में डाल दिया था क्योकि उन्होंने समझौते में शामिल सिक्योरिटी पेपर की प्रिंटिंग की शर्तों को पाकिस्तान के साथ भी साझा कर दिया था। लेकिन बाद में प्रतिबन्ध हटा लिया गया और कंपनियों को कालीसूची से हटा दिया गया। क्यों? प्रतिबन्ध हटाने का कारण जो दिया गया वह कुछ यूँ था- एक अधिकारी ने बताया कि “ये कम्पनियां 150 सालों से काम कर रही है। वे एक देश की जानकारी दूसरे देश से साझा कर के अपने व्यापार में बाधा नही डालेंगी। इन कम्पनियों में से कुछ छोटे देशों के लिए नोट प्रिंट करती है। जाँच के बाद यह पाया गया कि दोनों फर्मो ने सुरक्षा शर्तों से समझौता नही किया था और इसलिए प्रतिबंघ हटा लिया गया।’

हालांकि अपनी ही जांच में ब्रिटेन के ही सीरियस फ्रॉड ऑफिस ने पर्दाफाश किया था कि डे ला रु के कर्मचारियों द्वारा जान बूझ कर अपने 150 ग्राहकों में से कुछ के लिए कागज विशिष्ट परीक्षण प्रमाण पत्र का गोलमाल हुआ था। हाल ही में पनामा पेपर में ये भी पता चला की डे ला रु ने 15फीसदी अतिरिक्त घूस नई दिल्ली के व्यापारियों को रिजर्व बैंक के कॉन्ट्रैक्ट को सुरक्षित करने के लिए दिया। रिपोर्ट भी थी कि डे ला रु ने रिजर्व बैंक सेटलमेंट के लिए चालीस मिलियन पाउंड का भुगतान किया, जो कि नोटो के पेपर के उत्पादन के लिए हुआ था।

बावजूद डेलारू को मंजूरी दी गयी है। डे ला रु के साथ मिलकर मध्य प्रदेश में एक सिक्योरिटी पेपर मिल, अनुसन्धान और विकास केंद्र की स्थापना की जाएगी ।डे ला रु के नये सीईओ मार्टिन सदरलैंड ने इंडिया इन्वेस्टमेंट जर्नल के एक साक्षात्कार में कहा कि नकली नोटों के विषय पर ‘यूनाइटेड किंगडम और भारत के बीच नवम्बर 2015 में हुए रक्षा एवं अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग भागीदारी समझौते’, के तहत डे ला रु दोनों देशों का जालसाजी के विषय पर समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह बात और है कि डे ला रु पर से प्रतिबन्ध हटाने और कालीसूची से नाम हटाने के सम्बन्ध में कोई आधिकारिक घोषणा (समाचार रिपोर्ट के अलावा) नहीं की गयी है। डे ला रु जो कि रिजर्व बैंक का ठेका खोने के बाद लगभग दीवालिया हो गया था, अब 6 महीने में इसके शेयर में 33.33 फीसदी की भारी वृद्धि की सूचना है। अब सवाल है कि क्या नये भारतीय मुद्रा की छपाई में कालीसूची में डाले गए क्राउन एजेंट कंपनियों की भागीदारी है?, जिसने भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर पाकिस्तान के लिए नकली नोटों के सोर्स और सप्लाई की?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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