सभी धर्म पितृसत्ता का नियमन करते हैं..

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-आफताब आलम||

स्त्री की ग़ुलामी का सबसे बड़ा कारक है धर्म, सभी धर्म पितृसत्ता का नियमन करते हैं, चाहे वह ट्रिपल तलाक़ का मामला हो या फिर महिला आरक्षण का या खाप पंचायती हत्याओं का, धर्म हमेशा औरतों के ख़िलाफ़ नज़र आता है. यह विचार आग़ाज़ सांस्कृतिक मंच द्वारा “बेहतर समाज का ख़्वाब और जेंडर का सवाल” विषय पर केन्द्रित पहली भगत सिंह स्टडी सर्कल में मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए इप्टा से जुड़ीं जानी मानी कहानीकार नूर ज़हीर ने व्यक्त किये.img_2216
उन्होंने प्रगतिशील आन्दोलनों की विस्तार में समीक्षा करते हुए कहा, हालाँकि औरतों की बराबरी प्रगतिशील संगठनों में भी अभी आदर्श रूप में नहीं आ सकी है लेकिन यू एस एस आर सहित जिन देशों में क्रांतियाँ सफल हुईं वहाँ औरतों को बराबरी के अधिकार दिए गए. दुर्भाग्य से आबादी का आधा हिस्सा होने के बावज़ूद औरतों का कोई वोटबैंक नहीं है इसलिए राजनीतिक पार्टियाँ भी औरतों के अधिकारों के प्रति सचेत नहीं हैं। इसका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है महिला आरक्षण बिल जो बीस साल से संसद में लंबित पड़ा है. पूर्वी ज़र्मनी में 97 फ़ीसदी महिलायें रोज़गार हासिल कर चुकी थीं लेकिन आज वहाँ पूंजीवादी निज़ाम में सबसे पहले उनसे ही नौकरियां छीनी जा रही हैं. आर्थिक स्वावलंबन स्त्रियों की आज़ादी की राह में पहला और ज़रूरी क़दम है लेकिन सिर्फ़ रोज़गार मिल जाने से भी औरत आज़ाद नहीं हो जाती. ज़रूरी है कि उसे निर्णय लेने का अधिकार दिया जाए.
आज सबसे ज़रूरी है कि लड़कियों के साथ-साथ हम अपने लड़कों को भी बचपन से सिखाएं कि जेंडर समानता सिर्फ स्त्रियों ही नहीं उनकी मुक्ति और एक बेहतर समाज के लिए ज़रूरी है. इस आयोजन म दूसरे मुख्यें वक़्त के रूप में उपस्थित जाने माने कवि और संस्कृतिकर्मी उज्ज्वल भट्टाचार्य ने अस्मिता के प्रश्न पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आज मुक्ति की कोई भी लड़ाई दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों तथा अन्य वंचित तबकों के सवालों के संघर्ष के बिना नहीं लड़ी जा सकती. इन तबकों पर देश में लगातार हो रहे हमले पर हमले हो रहे हैं, वंचित कौम अपना अधिकार मांगने सामने आती हैं तो उन पर ज़ुल्म बढ़ जाता है. शारदा एक्ट का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जिस साल यह एक्ट लागू हुआ उस साल सबसे ज्यादा अल्पवयस्क लड़के-लड़कियों की शादियाँ कराई गईं. यह कट्टरपंथी तत्वों की प्रतिक्रिया थी. लेकिन उस एक्ट के चलते भारतीय समाज में एक बड़ा परिवर्तन हुआ. इसीलिए आज जो भी प्रतिक्रिया हो रही है उसका एक मतलब यह भी है कि स्त्रियों ने मज़बूती से अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. आने वाले समय में स्थितियां उनके लिए बेहतर होंगी.

दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक ताराशंकर जी ने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि “परिवार औरतों के शोषण की सबसे मूलभूत इकाई हैं तब तक औरतों का शोषण होता रहेगा जब तक वे स्वतः इसके खिलाफ नहीं खरी होती।

आई टी एम विश्वविद्यालय , ग्वालियर की प्रोफ़ेसर तथा कवयित्री सुमन केसरी ने कहा कि बदलते हुए समय में स्त्रियों के सपनों का रूप बदल गया है. अब वे अपनी आज़ादी को पहली वरीयता देने लगी हैं. आज के दौर में लड़कियां शादी से पहले अपना कैरियर सुरक्षित करना चाहती हैं जो कि एक शुभ संकेत है.
आग़ाज़ सांस्कृतिक मंच और इस चर्चा के आयोजक़ अशोक कुमार पाण्डेय ने प्रगतिशील आन्दोलनों में स्त्री मुक्ति के प्रश्न को अक्सर हाशिये पर डाल दिए जाने का सवाल उठाया उन्होंने कहा कि देश के कई ईलाकों में लडकियों और औरतों को घर से बाहर निकलने की इजाजत नही है । जिन परिवारों की औरतें घर से बाहर निकल कर घर का काम करती हैं । उन्हें बदनाम करने भी कोई कसर नहीं छोडी जाती , ताकि दुसरी औरतें उन्हें अपना आदर्श न बना ले और घर से बाहर कमाने न निकल जाए !

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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