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बोर्ड और सरकार की नूरा-कुश्ती..

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-शीबा असलम फ़हमी॥

जब मुस्लिम नारीवादियों ने मनमानी तीन तलाक़ और दुसरे नारी-विरोधी रिवाजों के विरूद्ध संघर्ष को एक तयशुदा दिशा दे दी थी, जब समाज में इन रिवाजों के विरुद्ध हर तरफ जागरूकता और विरोध पैदा हो गया था, जब सिर्फ इतना सा बाकी था की एक विधिक व्यवस्था दे के एकतरफा तलाक़ को अमान्य घोषित कर दिया जाए तब ही मौजूदा मर्दवादी सरकार ने, पर्सनल लॉ में सुधार की जड़ में, यूनिफार्म सिविल कोड का मट्ठा डाल दिया.unnamed
भारतीय मुस्लमान महिलाऐं यूनिफार्म सिविल कोड नहीं मांग रहीं, वे यूनिफार्म सिविल कोड की उतनी ही विरोधी हैं जितना ऐसा कोई भी इंसान होगा जो की विविधता में यक़ीन रखता हो, या अपने धर्म के अनुसार अपने निजी मामले तय करना चाहता हो. एकतरफा तीन तलाक़ के मुद्दे में यूनिफार्म सिविल कोड को चर्चा के केंद्र में ला कर दक्षिणपंथियों ने बहुत मौक़े से एक दुसरे की मदद की है. आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इससे बड़ा तोहफा और क्या देती ये मर्दवादी सरकार कि सम्मान, अधिकार की बहस को ‘इस्लाम बनाम राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ’ बना दिया जाए, ‘इस्लाम बनाम सेकुलरिज्म’ बना दिया जाए? और मौलाना शाहबानो दौर को वापिस ला खड़ा करें?
भारत में २००२ की गुजरात हिंसा और २०१३ की मुज़फ्फरनगर हिंसा मुस्लमान महिलाओं के विरुद्ध जघन्य अपराधों के लिए याद रखी जाएगी लेकिन ये घटनाएं इसके लिए भी याद रखी जाएंगी की मौलानाओं ने मुस्लिम महिलाओं के इन्साफ के लिए सरकार को दबाव में नहीं लिया, कोई रैली नहीं की, कोई हस्ताक्षर अभियान नहीं चलाया, सरकार की ईंट से ईंट बजा देने की धमकी नहीं दी, यानी वो सारी धमकियाँ जो ये कठमुल्ले मुस्लमान औरतों के खिलाफ खड़े हो कर आज दे रहे हैं, तब नहीं दी गयीं .
तस्वीर साफ़ है भारत में मुस्लमान महिलाओं पर घर के अंदर हमला हो या घर के बाहर, सरकार नाइंसाफी करे या शौहर, इन मर्दों की मर्दानगी आराम फरमाती रहती है.
आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की मंशा ये है की मुसलमान मर्द घर के अंदर किसी भी तरह का अपराध-बदसलूकी-नाइंसाफी करे उस पर किसी तरह की जवाबदेही, क़ानूनी कार्रवाही या रोक नहीं लगनी चाहिए. तीन तलाक़ की हर वक़्त लटक रही तलवार के साये में मुस्लमान बीवी चूँ नहीं कर सकती. ये घरेलु आतंकवाद उसे चुप रहने पर मजबूर कर देता है. आज़ादी से ले कर आजतक भारत के मुस्लमान मर्द अपने परिवार के अंदर एक ‘लीगल हॉलिडे’ के मज़े ले रहे हैं, और यह मुमकिन हो रहा है आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी खाप पंचायत की प्रेशर-पॉलिटिक्स की वजह से. इस बोर्ड के रहते मुस्लमान महिलाओं को न अपने क़ुरानी-हक़ मिल सकते हैं न संवैधानिक-हक़.
बोर्ड का अब तक का रिकॉर्ड है की ये कभी भी महिलाओं के हक़ के लिए नहीं खड़ा हुआ. इसने जब भी सरकार से कुछ माँगा है वो महिलाओं के खिलाफ ही रहा है. पाठकों को याद दिला दूँ की इसी बोर्ड ने मुस्लमान बच्चों को शादी की न्यूनतम आयु सीमा के क़ानून के दायरे से बाहर रखने के लिए सरकार से गुहार लगाई थी ताकि बाल-विवाह और जबरन-विवाह होते रहें और बेटियों की शिक्षा, स्वास्थय, रोज़गार, तरक़्क़ी जाए भाड़ में. इसी आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने २००२ में तलाक़ के पंजीकरण के (मुम्बई हाई कोर्ट के) अदालती आदेश का विरोध किया था ताकि मक्कार शौहरों को झूठ बोलने की आज़ादी बनी रहे और वो आर्थिक ज़िम्मेदारियों से बचने के लिए झूठ बोल सकें की ‘तलाक तो मैंने बहुत पहले दे दिया था’, भले ही उसका कोई सबूत न हो, कोई गवाह न हो.
बात इतनी सी है की इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में मुस्लमान महिलाऐं सिर्फ ये मांग कर रही हैं की उनकी शादीशुदा ज़िंदगी बा-इज़्ज़त, बा-हुक़ूक़ और बे-खौफ़ हो. ऐसी न हो की पति को चोरी करने से रोकें तो पति तीन तलाक़ मुंह पर मार के हर ज़िम्मेदारी से बरी हो जाए और महिला बेचारी बेसहारा, बेघर, बे-वसीला सड़क पर आ जाये. ऐसा अपराध अगर एक प्रतिशत महिलाओं के साथ भी हो रहा है तो क़ानून को पीड़ितों की रक्षा करनी ही चाहिए. लेकिन इतनी सी बात मुस्लमान मर्दवादियों को हज़म नहीं हो रही, जबकि वो ख़ुद अपने हुक़ूक़, बराबरी और आज़ादियों की लड़ाई, हुकूमत और दक्षिणपंथी विचारधारा से, हम महिलाओं की मदद से लड़ रहे हैं. इन मर्दों को अपने फायदे के लिए संविधान, सेकुलरिज्म, लोकतंत्र और ह्यूमन राइट्स के सभी पहाड़े याद हैं, लेकिन अपने घर की ड्योढ़ी लांघते ही ये १४०० सौ साल पीछे चले जाना चाहते हैं. समाज में ऐसा महिला विरोधी माहौल तैयार कर देने के बावजूद मुस्लमान लड़कियां जब पढ़-लिख जाती हैं तो वो सिर्फ अपने नहीं बल्कि सबके खिलाफ होने वाले अत्याचारों के विरूद्ध संघर्ष करती हैं. राणा अय्यूब, शबनम हाश्मी, सीमा मुस्तफा, सबा नक़वी, ज़ुलैख़ा, नूरजहां, अंजुम जैसी संघर्षशील बेटियां जब मुस्लमान मर्दों के साथ हो रही नाइंसाफी की जंग लड़ती हैं तब ये समाज से वाहवाही लूटती हैं, लेकिन यही और इनके जैसी महिलाऐं जब अपने लिए इन्साफ मांगें तो मौलाना और उनके अंधभक्त ज़मीन आसमान एक कर देते हैं.

कोई ताजुब नहीं होना चाहिए की दक्षिणपंथियों को ऐसी संघर्ष शील सबला महिलाऐं नहीं चाहिए, लिहाज़ा मुस्लमान महिलाओं के पाँव में बेड़ियाँ डालने का काम अगर उनके चचेरे भाई खुद घर के अंदर ही कर दें तो और भी सुभीता. बोर्ड और सरकार की ये नूरा कुश्ती किस अंजाम पर पहुंचेगी ये साफ़ है. लेकिन हमारा संघर्ष जारी अगली सदियों तक, भले ही मर्दों ने तय पाया है कि, मर्दों के हस्ताक्षर द्वारा, मर्दों के लिए,मर्दवादी सरकार से, मरदाना लड़ाई लड़ी जाएगी!

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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