क्या बिना लाइसेंस चल रहा न्यूज़ चैनल ??

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राजस्थान में धूमधाम से खड़ा हुआ एक न्यूज़ चैनल इन दिनों फ़र्ज़ी तरीके से चल रहा है. खबर है कि इस चैनल को सुचना व प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से जारी हुए लाइसेंस की अवधि काफी समय पहले खत्म हो चुकी है और चैनल अब तक इसको रिन्यू नहीं करवा पाया है और अब बिना लाइसेंस के चल रहा है.unauthorized-tv-channel

विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पहले ये चैनल महुआ चैनल के लाइसेंस पर रन कर रहा था मगर महुआ का खुद का लाइसेंस भी मुद्दत पहले ही रद्द हो चुका है और महुआ का मालिक पीके तिवारी आर्थिक फर्जीवाड़े के आरोप में जेल में है. अब जब महुआ ही बन्द हो गया है तो राजस्थान में उसके लाइसेंस से चल रहे इस न्यूज़ चैनल को स्वतः ही बन्द हो जाना था मगर चैनल फ़र्ज़ी तरीके से चल रहा है. वैसे भी जिस चैनल के लाइसेंस पर चैनल चलता है उसका नाम सुचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार की अनुमति लिए बिना बदला भी नहीं जा सकता तो यह चैनल महुआ के लाइसेंस पर महुआ के नाम से ही चलना चाहिए था. मगर यह भी नहीं किया गया.
जब हमने चैनल के प्रोमोटर से जब इस बाबत जानकारी लेनी चाही तो पहले तो साहब  फोन ही नहीं उठा रहे. इसके बाद हमने उनसे एसएमएस के ज़रिये सवाल किया तो उन्होंने उसका भी कोई उत्तर नहीं दिया इसका मतलब दाल में पक्का ही कुछ काला है. अब देखना ये है कि नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बिना लाइसेंस चल रहे इस न्यूज़ चैनल पर भारत सरकार क्या कार्रवाई करती है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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