बंदा बनना है तो कंधा बन ..

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-सुजाता॥

कई दिन हो गए टीवी पर शाहरुख लड़कों को सीख दे रहे हैं कि अगर फेयर और हैण्डसम नहीं होगा तो लड़कियाँ तुझे कंधा बना कर इस्तेमाल करेंगी और तेरे हाथ खुछ नहीं आएगा। रंगभेदी और लिंगभेदी यह विज्ञापन मुझे बार-बार खतरनाक लगता है। इस विज्ञापन से लड़कियाँ बार बार ऑफेण्डेड क्यों न महसूस करें ? लड़कियों की तरह रो मत! लड़कियों की तरह शरमा मत! लड़कियों की तरह डर मत! लड़कियों की तरह मुँह लटॅका कर मत बैठ! की ही तरह ‘कंधा मत बन’ की यह सीख आप उस देश के लड़कों को दे रहे हैं जहाँ परिवारों में लड़के एक गिलास पानी भी अपने हाथ से पीने का संस्कार नहीं लेते। जहाँ ‘मर्द’ होने का अहंकार इतना ज़्यादा है कि ‘ना’ सुनने पर लड़कियो के मुँह पर एसिड डाल जाते हैं या सबक सिखाने के लिए पुराने फॉर्मूले बलात्कार का इस्तेमाल करते हैं। यह विज्ञापन न सिर्फ साँवले रंग का अपमान है बल्कि औरत को भी स्त्रियोचित के लिए अपमानित कर उसके स्टीरियोटाइप में बंद करता है। यह विज्ञापन कई तरह के अर्थ दे रहा है। औरतों की क्रीम इस्तेमाल करना मर्दानगी के लिए शर्म की बात है यह साफ है। छिपा हुआ अर्थ है कि औरत का कंधा बनना भी ! वह तो आपकी मर्दानगी से प्रभावित होकर आपकी दोनो बाहों में झूले तभी बंदा होना सार्थक होगा ।poster2

मै ‘बंदा’ शब्द के इस भयानक नए इस्तेमाल (शायद कूल ड्यूड जैसा साउण्ड करने वाला) से भी चकित हूँ। सब एक ही ईश्वर के बंदे हैं और बंदगी जैसे शब्द सुनते हम बड़े हुए और आज अचानक जब इस संदर्भ में बंदा- बंदी सुनते हैं तो सकपका जाते हैं। मानों पब्लिक स्पेस में लड़कियों के निकल आने से जो चारों तरफ बहार छाई है उसमें तेज़ बाँके बंदों को छोड़ बाकियों के लिए कोई उम्मीद है तो बाज़ार की ऐसी बेहूदी क्रीमों में ही है।

शाहरुख को मैं कहना चाह्ती हूँ कि वक़्त बदल रहा है.. एक पढी-लिखी करियर ओरियण्टेड लड़की दो दिन में ऐसे गोरे रंग के बंदे से ऊब जाएगी जो अकेली खटती हुई पत्नी का हाथ बँटाने की बजाए सिर्फ स्टाइल मारता हो और सण्डे को कुछ मज़ेदार नाश्ता मांगने से पहले देर तक बिस्तर तोड़ता हो। लड़कियों नें अपनी भूमिकाओं में कितनी नई ज़िम्मेदारियाँ अपने कंधे पर उठाई हैं। ऐसे में अगर साथी पुरुष उनका कंधा नहीं बनेगा तो उसका बंदा होना लड़कियाँ ज़्यादा दिन नहीं ढो सकेगीं। इसलिए डियर शाहरुख, लड़कों को अगर बंदा बनना ही है तो उन्हे पहले कंधा तो बनना ही होगा , बोझ ढोने वाला नहीं, दर्द-खुशी-संघर्ष में बराबरी निभाने वाला। थोड़ा कम मर्द ! यानी टिपिकल वाला मर्द नहीं।जैसे लड़कियाँ आज थोड़ी कम लड़की हैं। टिपिकल वाली नहीं। जिनका इलाका सिर्फ घर नही है और चूल्हा नहीं है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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