पत्रकारों का आर्थिक उत्पीड़न करने वाले मालिक जा सकते हैं जेल..

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मीडिया मालिकों की क्लास लगाना शुरू..  सुप्रीम कोर्ट के इसी रूख की हम कल्पना कर रहे थे..

नई दिल्ली। माननीय सुप्रीम कोर्ट के जिस रूख की हम कल्पना कर रहे थे, ठीक वैसा ही देखने को मिला। माननीय सुप्रीम कोर्ट को मीडिया मालिकों की पूरी कारस्तानी समझ में आ गई है। इसलिए उन्होंने मंगलवार को हुई सुनवाई में शुरू से ही मीडिया मालिकों की क्लास लगाना शुरू कर दिया। इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने तिहाड़ में अकेले बोर हो रहे सहाराश्री को ‘सहारा’ देने के लिए कई मीडिया मालिकों की लिस्ट बना ली है।nnn

इसकी शुरूआत करते हुए दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्ता और महेन्द्र मोहन गुप्ता को अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को कोर्ट में तलब कर लिया है। अब कोर्ट उनसे ही पूछेगा कि क्या वे स्वयं को कानून से बड़ा मानते हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट अगली सुनवाई के दिन दैनिक जागरण के मालिकों को जेल भी भेज सकता है। क्योंकि, पिछली सुनवाई में उन्हें मजीठिया देने का आदेश दिया गया था। इसके बाद दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला, दैनिक हिन्दुस्तान के मीडिया मालिकों का नम्बर आएगा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के श्रमायुक्तों को तीन माह में सभी कर्मचारियों की वसूली करने के आदेश दिए हैं। 25 अक्टूबर को राजस्थान आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक सहित पांच राज्यों की सुनवाई है।

25 अक्टूबर का दिन मीडिया मालिकों के लिए काली दीवाली

पीड़ित कर्मचारियों के वकील कोलिन गोंसाल्विस ने माननीय सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विभिन्न राज्यों से अभी तक जो श्रमायुक्तों की रिपोर्ट आई हैं, उनमें भी मजीठिया नहीं देने की बात है। ऐसे में मीडिया मालिक खुलेआम माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना कर रहे हैं। कोलिन ने इसके साथ ही राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, दैनिक हिन्दुस्तान के मालिकों की कारस्तानियों से भी कोर्ट को अवगत कराया। इस पर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि 25 अक्टूबर को माननीय सुप्रीम कोर्ट दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक हिन्दुस्तान, अमर उजाला के खिलाफ अवमानना का केस ठोक सकता है। इसमें सीधे जेल भेजे जाने का प्रावधान है। माननीय सुप्रीम कोर्ट के इस रूख को देखते हुए संभावना बन रही है कि 25 अक्टूबर का दिन मीडिया मालिकों के लिए काली दीवाली बन जाएगा। क्योंकि, इस दिन इन्हें जेल की भी हवा खिलवाई जा सकती है। अगली सुनवाई में भास्कर और पत्रिका के मालिकों को कोर्ट तलब कर सकता है।

20 जे पर अहम फैसला, मीडिया मालिकों ही हार

वरिष्ठ वकील कोलिन गोंसाल्विस ने कोर्ट को बताया कि मीडिया मालिकों ने किस तरह 20 जे धारा की गलत व्याख्या कर रखी है। जबकि कानून में साफ लिखा है कि जो सैलेरी ज्यादा होगी, वही मान्य होगी। इस पर कोर्ट ने मौखिक कहा कि रिकवरी 20 जे कानून के अनुसार ही होगी। यानी मीडिया मालिकों जिसे ढाल बनाकर अब तक बच रहे थे, उसे एक ही झटके में सुप्रीम कोर्ट ने चकनाचूर कर दिया। इसी सुनवाई के लिखित आदेश में 20 जे पर भी अहम फैसला आएगा। ऐसे में अगली सुनवाई के दिन सभी मीडिया मालिकों पर अवमानना का केस लगना तय है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसूली के मामले में सारे अधिकार श्रमायुक्त के पास हैं। रिकवरी का कोई भी मामला श्रम कोर्ट में नहीं जाएगा। यानी जो श्रमायुक्त अभी तक मीडिया मालिकों का बचाव कर रहे थे, वे अब अपनी खाल बचाने के लिए मजीठया पीड़ित का साथ देंगे।

बर्खास्त, तबादला और सस्पेंशन वाले मामले होंगे रद्द, पीड़ित साथियों को मिलेगी नौकरी

वरिष्ठ वकील कोलिन गोंसाल्विस ने कोर्ट को इस तथ्य से भी अवगत कराया कि जिस कर्मचारी ने भी मजीठिया की मांग की। उसे तबादला, बर्खास्त और सस्पेंड कर दिया गया। श्रमायुक्तों की रिपोर्ट में भी इसका उल्लेख है, जिसमें हजारों की तादाद में पीड़ित कर्मचारियों ने शिकायत दी है और सुप्रीम कोर्ट में भी इस बारे में शपथ-पत्र दिया है। इस पर माननीय कोर्ट ने इस मामले में अलग से शिकायत मांगी और 25 अक्टूबर को इस बारे में आदेश जारी होगा। यानी अब मीडिया मालिकों को इस मुद्दे पर भी मुंह की खानी पड़ेगी और नौकरी से बाहर चल रहे सभी साथी बहाल होंगे। मीडिया मालिकों को उन्हें फिर से नौकरी पर रखना होगा।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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