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गुजरात के पाटीदार आन्दोलन के बाद महाराष्ट्र में मराठा आन्दोलन..

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-उमेश कुमावत||

महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन फिर जोर पकड़ रहा है. कई जिलों में महाआंदोलन की शुरुआत हो चुकी है. लाखों की भीड़ देखकर राजनीतिक पार्टियों के होश उड़े हुए हैं. महाराष्ट्र के जिलों में लाखों मराठा सड़क पर उतर रहे हैं, इसमे बड़ी तादाद में महिलाएं हैं, स्कूली लड़किया हैं, मराठा समाज के युवा और बुजुर्ग भी हैं.maratha-movement

इस मराठा आंदोलन का नेतृत्व कोई पार्टी नहीं कर रही है. फिर भी लाखों लोग इसमें शामिल हो रहे हैं. महाराष्ट्र में सबसे पहला मराठाओं का मोर्चा मराठवाड़ा के औरंगाबाद में निकला. यहीं से इसकी शुरुआत हुई और अब इस आंदोलन की आग पूरे राज्य में फैल रही है.

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मराठा समाज अहमदनगर जिले के कोपर्डी में एक मराठा समाज की नाबालिग लड़की से बलात्कार और हत्या का विरोध कर रहा है. यहां आरोपी दलित समाज थे. इन मराठा आंदोलनकारियों की तीन बड़ी मांगे हैं.

पहली मांग- कोर्पर्डी बलात्कार और हत्या के आरोपीयों को फांसी दी जाए
दूसरी मांग- एट्रॉसीटी कानून रद्द किया जाए
तीसरी मांग- मराठा समाज को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण दिया जाए.
मराठा आंदोलन के पीछे कौन

मराठा आंदोलन के पीछे कौन है. इसका सच क्या है. कोई इसके पीछे एनसीपी मुखिया शरद पवार का दिमाग बता रहा है तो कोई आध्यात्मिक गुरु भैय्यू जी महाराज को वजह बता रहा है. तो कोई इसे फडणवीस सरकार के विरोधियों का काम बता रहा हैं.

सच तो ये है कि मराठा आंदोलन ने सभी पार्टियों की नींद उड़ा दी है. इस आंदोलन का आखिरी पड़ाव मुंबई में होगा, जहां 25 लाख मराठाओं को जमा करने की तैयारी है. 9 अगस्त को औरंगाबाद में मराठा समाज का सबसे पहला मोर्टा निकला था. बताया जाता है कि इस मोर्चे में पांच लाख से ज्यादा मराठा शामिल हुए थे. उस्मानाबाद, जलगांव, बीड, परभणी इन सभी जगहों पर लाखों मराठा सड़कों पर उतरे.

औरंगाबाद में कोपर्डी बलात्कार और हत्या के विरोध में मोर्चा निकालने के लिए सबसे पहली बैठक 22 जुलाई को सिंचाई भवन में हुई थी. इस बैठक में 16 लोग शामिल थे. विजय काकडे नाम के एक शख्स ने बताया कि इस बैठक मे किसी राजनैतीक पार्टी का कोई प्रतिनिधी शामिल नहीं था. बाद में दिन-पर-दिन ये आंकड़ा बढ़ता चला गया. मोर्चे में लोग और संगठन जुड़ते चले गए.

2 अगस्त की बैठक में 270 लोग आए, इसमें सभी राजनैतीक पार्टी के स्थानीय नेता और सभी मराठा संगठन शामिल थे. लेकिन 9 अगस्त को जब लोग जुटे तो सबकी आंखे खुली रह गई, भीड़ ने पांच लाख का आंकड़ा पार कर लिया, जाहिर है इस मोर्चे की नींव मराठा संगठनों ने रखी थी, ना की किसी राजनीतिक पार्टी ने. लेकिन इस भीड़ को देख कर सभी राजनीतिक पार्टीयों ने इस मोर्चे को स्थानीय स्तर पर सहायता मुहैया करानी शुरु कर दी.

मराठा समाज को आरक्षण मिलने के समीकरण

मराठा नेताओं का कहना है कि मराठाओं में भी एक बड़ा वर्ग पिछड़ा है और महाराष्ट्र में आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किसान मराठा है. 2014 में राज्य की तत्कालीन एनसीपी सरकार ने मराठाओं के लिए 16 फीसदी आरक्षण घोषित किया. लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने नवबंर 2014 में मराठा आरक्षण पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि मराठाओ को पिछड़ो में नहीं गिना जा सकता.

इसके लिए कोर्ट ने 1990 के मंडल कमिशन और फरवरी 2000 के राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग और जुलाई 2008 के महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग यानी बापट कमिशन का हवाला दिया. कोर्ट ने राणे आयोग की रिपोर्ट में कई खामियां निकाली. कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय कर दी है और राज्य सरकार को ये सीमा लांघने का कोई अधिकार नहीं है.

कोर्ट ने इस और भी ध्यान खींचा कि सामाजिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों से ऐसे संकेत मिलते हैं कि मराठाओं कि शुरुआत किसानों से हुई. लेकिन 14वीं सदी के बाद राजनीतिक, शिक्षा और सामाजिक तौर पर बड़े रुतबे के साथ ये समाज अलग तौर पर उभरा है.

मराठा नेताओं का आरोप है कि नाटकों, फिल्मों, और किताबों में मराठा समाज को सालों से बदनाम करने की कोशिश की जा रही है, जिसमें हाल ही में मराठी में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म सैराट भी शामिल है.

मराठा आंदोलन का महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा ?

सवाल ये भी है कि मराठा आंदोलन का महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा. क्या ये आंदोलन फडणवीस सरकार के लिए खतरे की घंटी है, इस आंदोलन की वजह से मराठा और दलितों में संघर्ष तो नहीं खड़ा हो जाएगा. ये सवाल अब राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि सभी पार्टी के मराठा नेता इन मोर्चाओं को सहायता कर रहे हैं.

राजनीति में शामिल लोग मानते हैं कि इस आंदोलन की वजह से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को घेरने का मौका उनकी पार्टी के भीतर के और बाहर के दोनों विरोधीयों को मिल रहा है.

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडनवीस के ब्राह्मण मुख्यमंत्री होने पर सबसे पहले शरद पवार की उस चुटकी पर विवाद खड़ा हो गया था, जो उन्होंने कोल्हापुर के संभाजी महाराज को बीजेपी ने राज्यसभा में लेने पर की थी. महाराष्ट्र में अगले साल स्थानीय निकायों के चुनाव होने वाले हैं, जिसे मिनी विधानसभा चुनाव के तौर पर देखा जाता है, राजनीतिज्ञ मान रहे हैं कि इन आंदोलनों का इस्तेमाल उन चुनाव के लिए जमीन तैयार करने के लिए किया जा रहा है.

मराठवाड़ा मे दलित और मराठा संघर्ष का इतिहास रहा है, मराठवाड़ा युनिवर्सिटी के नामांतर के वक्त ये संघर्ष पूरे महाराष्ट्र ने देखा था. अब मराठा आंदोलन की एक मांग एट्रॉसीटी रद्द करने की हैं, जिसकी वजह से अब कुछ दलित नेता इसका विरोध कर रहे हैं.

कुछ दलित संगठनो ने इस मांग के खिलाफ मोर्चा निकालने की तैयारी शुरु कर दी तो, दलित नेता प्रकाश आंबेडकर ने कहा मराठाओं के आंदोलन के खिलाफ दलित आंदोलन ना करें, क्योंकि मराठाओं का आंदोलन दलितों के खिलाफ नहीं है.

लेकिन एक बात तो साफ है की लाखों मराठाओं के सड़क पर उतरने से महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है और इस पर अब सबकी नजरें टिकी हैं. जाहिर सी बात है कि एक समाज का असंतोष जब इतने बड़े पैमाने पर सड़क पर आएगा तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

(एबीपी न्यूज़)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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