ब्राह्म्णवाद की देन है डायन कुप्रथा..

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– नवल किशोर कुमार॥
अंधविश्वास और धर्म के बीच गहरा रिश्ता है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब हो जाती है जब धर्म को स्थापित करने के लिए अंधविश्वास को जायज ठहराया जाता है और जायज ठहराने के क्रम में मानवीय मूल्यों की सारी सीमायें लांघी जाती हैं। ऐसा ही एक अंधविश्वास “डायन कुप्रथा” है। यह एक ऐसी कुप्रथा है जिसके कारण पूरे हिन्दी पट्टी राज्यों में हर पांच मिनट पर एक महिला इसका शिकार होती है। पीड़ित महिलाओं के साथ प्रताड़ना का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि अधिकांश मामलों में उन्हें सार्वजनिक तरीके से मारा-पीटा जाता है और हालत तो उस समय असह्य हो जाती है जब उन्हें अर्द्धनग्न कर, बाल मुंड़कर पूरे गांव में घुमाया जाता है। इससे भी समाज का मन नहीं भरता है तो उन्हें जबरन मल तक पिलाया जाता है।images (6)
डायन कुप्रथा खत्म हो, इसके लिए आवश्यक है कि इस समस्या के सभी आयामों पर ईमानदारी से चिंतन-मनन हो। यह केवल सरकार के स्तर पर नहीं बल्कि समाज को भी यह सच स्वीकारना होगा। यदि इसके विभिन्न आयामों की बात करें तो सबसे पहला आयाम इस कुप्रथा का धर्म से जुड़ाव है।

बंगाल से है डायन कुप्रथा का जुड़ाव
हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक तरफ़ इस धर्म में महिलाओं को देवी माना जाता है तो दूसरी ओर उन्हें इसका शिकार भी होना पड़ता है। images (8)सबसे अधिक शक्ति की देवी यानी दुर्गा की पूजा पश्चिम बंगाल में होती है। नवरात्र के दौरान यहां के दुर्गा मंदिरों में भूत-पिशाच का खेल खेला जाता है। पश्चिम बंगाल का काला जादू भी इसी से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्यों में भी इसका खूब प्रसार हुआ है। एक उदाहरण असम का कौड़ी कामख्या मंदिर है, जो जादू-टोने से लेकर भूत-पिशाच आदि के लिए कुख्यात है।

इस्लाम भी देता है अंधविश्वास को बढावा
बिहार और उत्तरप्रदेश के कई हिस्सों में यह अत्यंत ही सामान्य बात है कि बड़ी संख्या में हिन्दू धर्मावलम्बी मजारों पर जाते हैं। दिलचस्प यह है कि उनकी यह आस्था इसलिए नहीं होती कि उन्हें इस्लाम कबूल होता है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए वे मजारों पर जाते हैं और ऐसा करने वालों में अधिकांश गरीब हिन्दू परिवारों की महिलायें होती हैं। इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि धर्म को अपना बिजनेस बनाने वाले मुल्ला इन महिलाओं को जमकर बेवकूफ़ बनाते हैं और वहां भी महिलाओं के शरीर से भूत उतारने की प्रक्रिया बखूबी की जाती है। एक दिलचस्प उदाहरण यह भी बिहार की राजधानी पटना जिलाधिकारी आवास में एक मजार है और यहां सरकार की आंखों के सामने रोजाना सैंकड़ों भूतों का कल्याण किया जाता है।

केवल महिलायें ही क्यों कहलाती हैं डायन?
यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण है कि डायन की उपाधि पाने वाली केवल महिलायें होती हैं। images (5)पुरुष कभी भी डायन नहीं होते। कई समाजशास्त्री मानते हैं कि इस कुप्रथा के जरिए पुरुष समाज में महिलाओं पर अपना अधिकार बनाये रखना चाहता है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि किसी महिला को अकारण ही बांझ कहा जाता है जबकि नपुंसकता उसके पति में होती है। पुरुष कभी भी इस तथ्य को स्वीकार ही नहीं करना चाहता है कि वे नपुंसक भी हो सकते हैं।

दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की महिलायें होती हैं डायन
एक अध्ययन बताता है कि पूरे देश में डायन कुप्रथा की शिकार महिलाओं में अधिकांश दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की होती हैं। images (4)यह इसलिए भी संभव है क्योंकि इन वर्गों में सामाजिक चेतना का विकास अभी उस स्तर को नहीं प्राप्त कर पाया है जैसी चेतना का उच्च जाति वर्ग में हुआ है। अशिक्षा भी वंचित वर्गों की महिलाओं में सबसे अधिक है।

क्या कहता है कानून?
भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना में ही हर किसी को सम्मान के साथ जीने का अधिकार निहित है। महिलाओं को डायन कहकर प्रताड़ित करने वालों के खिलाफ़ कानून भी है। अंग्रेज इसके लिए बधाई के पात्र हो सकते हैं क्योंकि उन्होंने ही यह कानून 1857 में बनाया था। उस समय जोतिबा फ़ुले का आंदोलन भी महत्वपूर्ण कारण था, जिनके कारण महिलाओं को पढने का अधिकार हासिल हुआ था। आजाद भारत में भी अंग्रेजों के इस कानून को स्वीकार किया गया और डायन कहकर किसी को प्रताड़ित करने के लिए अधिकतम 7 वर्षों तक की सजा का प्रावधान है।

क्या है कानून की लाचारी?
असल में जब किसी महिला को डायन कहकर प्रताड़ित किया जाता है तब ऐसा करने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं होता है। कई मौकों पर तो यह भी बात सामने आती है कि महिलाओं पर जुल्म करने वाले लोगों में उसके अपने परिजन भी शामिल होते हैं। ऐसे में पुलिस भी गांववालों या स्थानीय समाज पर कार्रवाई करने
के बदले चुप रहना ही बेहतर समझती है।

क्या है समाधान?
शिक्षा और जागरुकता डायन कुप्रथा को समाप्त करने के लिए अनिवार्य है। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि सरकार कानून में संशोधन करे। ठीक वैसे ही जैसा शराबबंदी कानून बनाकर बिहार सरकार ने किया है। इस कानून के हिसाब से यदि किसी गांव या कस्बे में शराब का व्यवसाय होता है तो सामूहिक जुर्माना का प्रावधान है। इसी प्रकार डायन कहकर प्रताड़ित करने के मामले में किसी एक व्यक्ति को दंडित करने के बदले पूरे समाज को दंडित किया जाय। यह एक संशोधन अनिवार्य है। वजह यह है कि डायन कुप्रथा सामाजिक बुराई है और इसके लिए सजा भी पूरी सामाजिक व्यवस्था को दी जानी चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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