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मीडिया बदनाम हुई, दौलत तेरे लिये..

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मफतलाल अग्रवाल।।

देश के चैथे स्तम्भ के रूप में स्थापित मीडिया की स्वतन्त्रता पर लगातार हमले बढ़ने की घटनायें आये दिन सामने आ रही हैं। जिसमें कहीं पत्रकारों की हत्यायें की जा रही हैं तो कहीं उन्हें जेल भेजा जा रहा है। केन्द्र में भाजपा की सरकार हो या फिर दिल्ली में केजरीवाल अथवा यूपी में सपा की सरकार हो या फिर विपक्ष में बसपा सुप्रीमो मायावती, प्रशासनिक अफसर, पुलिस से लेकर माफिया तक हर कोई मीडिया पर हमला करने में जुटा हुआ है। हालत यह हो गयी है कि अब सोशल मीडिया पर जनता भी पत्रकारों को गाली देने में किसी से पीछे नजर नहीं आ रही है। इस हमले के लिये क्या एक तरफा वही लोग जिम्मेदार हैं जो मीडिया पर हमला बोल रहे हैं या फिर स्वंय मीडिया भी इसके लिये जिम्मेदार है? पुराने पत्रकार मानते हैं कि इसके लिये सर्वाधिक 60 प्रतिशत मीडिया के लोग ही जिम्मेदार हैं जिन्होंने अधिक धन कमाने की चाहत में मीडिया की पूरी साख ही सट्टे की भांति दाव पर लगा दी है। जो धन के बदले (विज्ञापन, लिफाफे के नाम पर) मदारी के बंदर की तरह नाचने लगते हैं।201953374
भाजपा नेता दयाशंकर द्वारा बसपा सुप्रीमो मायावती की तुलना दौलत की खातिर ‘‘वैश्या’’ से किये जाने पर जेल जाना पड़ा तो वहीं पूर्व जनरल एवं केन्द्रीय मंत्री वी.के. सिंह द्वारा पत्रकारों की तुलना ‘‘वैश्याओं’’ से किये जाने पर उन्हें ना तो जेल जाना पड़ा और न ही अपने पद से त्याग पत्र देना पड़ा। हां उन्हें माफी मांगकर मीडिया से पीछा छुड़ाना पड़ा। यदि महिला और दलित के सम्मान की बात हो सकती है तो मीडिया के सम्मान की क्यों नहीं। लेकिन पत्रकारों के सम्मान की बात करने वाले पत्रकारों का ही सम्मान राजनेताओं के यहां गिरवी रखा हो तो फिर वह किस मुंह से किसके सम्मान और अपमान का मुद्दा क्यों उठायेंगें।
आज मीडिया के लोग ही पत्रकारों को दलाल, भाड़ मीडिया, चोर-उचक्के बता रहे हैं तो दूसरों से सम्मान की क्या उम्मीद की जा सकती है। लखनऊ के वरिष्ट पत्रकार एवं ‘दृष्टांत’ पत्रिका के संपादक अनूप गुप्ता ने एक चर्चा के दौरान कहा कि आज वरिष्ट पत्रकार दलाली की खातिर राजनेता, अफसरों, माफियाओं के तलबे चाट रहे हैं वहीं बड़े-बड़े मीडिया संस्थान भी सरकारों एवं उद्योगपतियों, माफियाओं से अनैतिक लाभ अर्जित कर रहे हैं। जिनके विरूद्ध वह लड़ाई लड़ने जा रहे हैं। वह कहते हैं कि मीडिया के नकाब में छिपे कथित पत्रकारों ने करोड़ों-अरबों की अवैध सम्पत्ति अर्जित कर ली है। जिसके कारण आम पत्रकारों को गाली खाने पर मजबूर होना पड़ रहा है। श्री गुप्ता के मुताबिक 15 प्रतिशत मात्र भ्रष्ट पत्रकारों ने पूरी मीडिया को बदनाम करके रख दिया है। और अच्छे पत्रकारों के लिये रोजी-रोटी की समस्या उत्पन्न कर दी है।
मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार का एक मामला मथुरा में चर्चित हुआ जिसमें एक एमबी, की छात्रा ने उत्तरप्रदेश के चर्चित पत्रकार संगठन उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष कमलकांत उपमन्यु पर यौन उत्पीड़न की शिकायत एसएसपी मंजिल सैनी (वर्तमान लखनऊ में तैनात) से 3 दिसम्बर 2014 को की गई। जिसकी प्रति मीडिया को दी गई। लेकिन किसी भी पत्र एवं स्थानीय इलैक्ट्रोनिक मीडिया में पीड़िता की आवाज को जगह नहीं दी गई। बल्कि कई प्रमुख नेता, पत्रकार, वकील आरोपी के पक्ष में खड़े हो गये। लेकिन पीड़िता के साथ कुछ सामाजिक लोगों के खड़े होने से दोषी पत्रकार के खिलाफ 6 दिसम्बर को मामला दर्ज हो सका। लेकिन इसके बावजूद भी 7 दिसम्बर 2014 के किसी भी समाचार पत्र में घटना का उल्लेख नहीं किया गया। जब उक्त मामला सोशल मीडिया ने उछाला तब कुछ पत्रकारों ने खानापूरी की। लेकिन एक राष्ट्रीय चैनल ने घटना को प्रमुखता से दिखाया। उक्त घटना पर पर्दा डालने वाली मीडिया ने 7 फरवरी 2016 को छोटे-बड़े लगभग सभी समाचार पत्रों ने प्रमुखता से पीड़िता के करीब 15 माह पुराने शपथ पत्र को आधार बनाकर कमलकांत के आरोप मुक्त की खबर प्रकाशित कर दी। जबकि मथुरा न्यायालय द्वारा आरोपी पक्ष के विरूद्ध आदेश पारित किया गया था तथा मामला उच्च न्यायालय इलाहाबाद में भी लम्बित था। खबर के साथ बलात्कार करने के बदले पत्रकारों और सम्पादकों ने उसके बदले क्या कीमत वसूली ये तो वही जानें लेकिन इसकी शिकायत अदालत के आदेश के साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा मीडिया संस्थानों के उच्च अधिकारियों से की गई। लेकिन इसके बावजूद भी आरोपी की पकड़ मीडिया ढ़ीली नहीं हो सकी। इस संबंध में कुछ पत्रकारों ने खुलासा किया कि आरोपी पत्रकार कुछ संस्थानों से विज्ञापन तो दिलाता ही है प्रत्येक वर्ष दीपावली पर आम पत्रकारों को चांदी का सिक्का और मिठाई का डिब्बा तथा वरिष्ट पत्रकारों-सम्पादकों को मंहगे उपहार, लिफाफा आदि भी दक्षिणा में भेंट देता है। इसके अलावा चुनाव के मौसम में भी प्रत्याशियों से दक्षिणा दिलाता है। हालांकि कई पत्रकार ऐसे भी हैं जो इस आरोपी पत्रकार दूरी बनाये हुए हैं।
उक्त मामले में हालांकि पिछले दिनों हाईकोर्ट द्वारा की गई सीबीआई जांच की टिप्पणी को प्रमुख समाचार पत्रों द्वारा प्रमुखता से छापा गया हो लेकिन इसके बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में पत्रकार, सम्पादक, राजनेता, अधिकारी तथा-कथित सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो आज भी आरोपी का साथ छोड़ने को तैयार नहीं है। यह एकमात्र ऐसा मामला नहीं है बल्कि मीडिया में प्रतिदिन माफियाओं, राजनेताओं, प्रशासनिक अफसरों, बिल्डरों के हितों की खातिर समझौता कर मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रश्न चिन्ह लगया जाता है। यही कारण है अब पत्रकार भी कहने लगे हैं ‘‘मीडिया बदनाम हुई, दौलत तेरे लिये।’’

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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