सरकार तब कहां थी जब सिटी मैजिस्ट्रेट को पीटा था रामवृक्ष ने..

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अब तो केवल बकलोल कमिश्नरी ही होगी कमिश्नरी जांच के नाम पर.. एक दर्जन से ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं रामवृक्ष यादव पर, कार्रवाई एक नहीं.. एसएसपी आफिस के सामने से सैल्यूट लेता था रामवृक्ष यादव..

-कुमार सौवीर॥

लखनऊ : मथुरा में आतंक बन चुके रामवृक्ष यादव ने डेढ़ साल पहले भी जवाहर बाग में पुलिस और प्रशासन की टीम पर हमला बोल दिया था। उद्यान विभाग के कर्मचारियों के मकान पर कब्जा करने के मामले में सिटी मजिस्ट्रेट जांच करने गये तो उनकी जान के लाले पड़ गए। खरबों रूपयों कीमती वाली इस करीब तीन सौ एकड सरकारी जमीन पर जबरिया काबिज बैठे  रामवृक्ष के चेलों ने सिटी मैजिस्ट्रेट को सरेआम सडक पर लाठियों से पीटा और वहां मौजूद पुलिस वालों से वायरलैस सेट और लाठियां लूट लीं।ramvriksh yadav

लेकिन इस हादसे, और इसके पहले और उसके बाद के ऐसे किसी भी हिंसक और गुण्डांगर्दी पर पुलिस और प्रशासन ने कोई भी कड़ी कार्रवाई नहीं की। सभी अफसरों में यह खुली चर्चा चलती है कि यह अवैध कब्जा सरकार की शह पर है और इस कब्जे को बरकरार रखने के लिए ही सरकार वहां अपना और अवैध कब्जेदारों का पसंदीदा डीएम और एसएसपी तैनात करती है। इतना ही नहीं, रामवृक्ष यादव के नाम पर पूरा प्रशासन ही दहल जाता था। कलेक्ट्रेट और एसएसपी आफिस के सामने से वह उस अंदाज में निकलता था जैसे कोई पुलिस या प्रशासन का अफसर सैल्यूट लेता है। उसके सामने डीएम और एसएसपी की घिग्घी बंध जाती थी।

डेढ़ साल पहले हुए ऐसे एक हादसे में भी ताबड़तोड़ फायरिंग भी की गयी थी। घायल एसओ की हालत गंभीर होने पर आगरा रेफर कर दिया गया। देर रात हुए बवाल में पुलिस ने शुक्रवार को 20 सत्याग्रहियों सहित 600 अज्ञात के खिलाफ संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। एक समाचार पत्र के अनुसार गत 15 मार्च से डेरा जमाए बैठे सत्याग्रही सुभाष चंद्र बोस जयंती मनाने के लिए हाईवे पर गेट बना रहे थे। इसकी भनक लगते ही सिटी मजिस्ट्रेट हेमसिंह, एसओ सदर प्रदीप पांडेय मौके पर पहुंचे। सत्याग्रहियों ने लाठियों से इन पर हमला बोल दिया। अधिकारियो और पुलिस में भगदड़ मच गई। पुलिसकर्मियों से डंडा-वायरलेस सेट छीन लिए गए।

इसी दरम्यान फायरिंग होने लगी। सिटी मजिस्ट्रेट हेमसिंह एक खोखे के पीछे दुबक गए। एसओ प्रदीप पांडेय, एसओ हाईवे सुरेंद्र यादव, शहर कोतवाल कुंवर सिंह यादव सहित आधा दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए। मौके पर मौजूद सूत्रों के अनुसार, सिटी मजिस्ट्रेट डर के मारे थर-थर कांप रहे थे। घायलों को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां से एसओ प्रदीप पांडेय को शुक्रवार को आगरा रेफर कर दिया गया।

शुक्रवार को पुलिस ने बलवा, पुलिस की पिटाई और उस पर जानलेवा हमला करने, सरकारी सेट छीनने, फायरिंग करने के आरोप में थाना सदर बाजार में सत्याग्रहियों के नेता रामवृक्ष यादव, चंदन बॉस, शिवमंगल, वीर सिंह यादव, अशरफीलाल चौहान, महीपाल सिंह, प्रेमचंद, वंशगोपाल पटेल आदि समेत 20 लोगों को नामजद किया गया। जबकि कुल 500-600 अज्ञात लोगों के खिलाफ उक्त आरोपों में रिपोर्ट दर्ज की गई।

लेकिन इसके और इसके बाद की कई अनेक हिंसक वारदातों पर पुलिस ने कोई भी कार्रवाई नहीं की। वजह यह कि सरकार की शह थी और प्रशासन में आला अफसर उन उपद्रवियों के ही पक्ष में काम कर थे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “सरकार तब कहां थी जब सिटी मैजिस्ट्रेट को पीटा था रामवृक्ष ने..

  1. समाजवादी पार्टी की अपनी शह ही उसे यहाँ काबिज होने में मददगार थी,इसीलिए प्रशासन भी खा कर चुप था , यह मुलायम समाजवाद का अखिल यू पी उदाहरण था , कहा जाता है कि शिवपाल सिंह यादव का उस पर परम हाथ था , यह तो हाई कोर्ट का डंडा नहीं पड़ता तो अभी और चलना था ,
    लेकिन विचारणीय यह है कि ऐसी हालत अगले चुनाव के समय हुई तो क्या हालत होगी ? या किसी अन्य जाति या समुदाय के द्वारा असलाह इकट्ठा कर शासन को चुनौती देने का सिलसिला चल पड़ा तो क्या होगा ?यह तो वाकई गुंडा राज की ओर चलने की मिसाल है
    मायावती के राज में अपनी तरह की गुंडागर्दी थी , मुलायम- अखिल की अपनी तरह की , जनता का साबका तो गुंडों से ही पड़ना है , और उन्हें ही यह तय करना है कि वे किसका चयन करे या कोई नया विकल्प देखें

  2. समाजवादी पार्टी की अपनी शह ही उसे यहाँ काबिज होने में मददगार थी,इसीलिए प्रशासन भी खा कर चुप था , यह मुलायम समाजवाद का अखिल यू पी उदाहरण था , कहा जाता है कि शिवपाल सिंह यादव का उस पर परम हाथ था , यह तो हाई कोर्ट का डंडा नहीं पड़ता तो अभी और चलना था ,
    लेकिन विचारणीय यह है कि ऐसी हालत अगले चुनाव के समय हुई तो क्या हालत होगी ? या किसी अन्य जाति या समुदाय के द्वारा असलाह इकट्ठा कर शासन को चुनौती देने का सिलसिला चल पड़ा तो क्या होगा ?यह तो वाकई गुंडा राज की ओर चलने की मिसाल है
    मायावती के राज में अपनी तरह की गुंडागर्दी थी , मुलायम- अखिल की अपनी तरह की , जनता का साबका तो गुंडों से ही पड़ना है , और उन्हें ही यह तय करना है कि वे किसका चयन करे या कोई नया विकल्प देखें

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