प्रभाकर ग्वाल की बर्खास्तगी: आधुनिक समय का स्याह यथार्थ..

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-मसूद अख्तर||

सुकमा के सीजेएम प्रभाकर ग्वाल की बर्खास्तगी इसलिए नहीं की गयी कि वे अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर रहे थे या फिर भ्रष्ट थे या उनके होने से न्याय को खतरा था. बल्कि वे इसलिए बर्खास्त कर दिए गए कि वे अपने कर्तव्य का पालन बड़ी तन्मयता से कर रहे थे और जिससे भ्रष्ट तंत्र व प्रशासन को मुश्किल आन पड़ने लगी. इस बर्खास्तगी की वजह जनहित में बताया गया है. यह अलग बात है कि वे अपने निष्पक्ष फैसले व कानून के पालन के लिए जनता में लोकप्रिय हैं. जिला प्रशासन व सरकार की जगह अपने निर्णय में संविधान व क़ानून का ध्यान रखना व उसी के आलोक में फैसला देना उनके लिए घातक बन गया.prabhakar

वैसे तो 2006 में यह सेवा ज्वाइन करने के साथ ही अपनी प्रतिबद्धता व सच्चाई के लिए स्थानीय प्रशासन व सरकार की नजर में खटकने लगे थे और उन्हें विभिन्न तरीके से इसके लिए समझाया भी गया कि वो राह का रोड़ा न बनें और जो चल रहा उसे चलने दें.

यह वही छत्तीसगढ़ है जिसका नाम आते ही सोनी सोरी के साथ तमाम आदिवासियों का माओवाद के नाम पर उत्पीड़न आँखों के सामने कौंधने लगता है. यहाँ पत्रकारों को यह प्रशासन की तरफ से इज़ाज़त नहीं है कि वो खबर की अपने तरीके से तहकीकात करें और सच लिखें. बल्कि उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे बस वही लिखें व बोलें, जो उन्हें सरकार या प्रशासन की तरफ से कहा जाता या मुहैया कराया जाता है. इसके अतिरिक्त यदि वो किसी खबर के सच तक पहुँचने की कोशिश करेंगे तो उन्हें भी माओवादियों का समर्थक बता लम्बे समय के लिए अन्दर कर दिया जाएगा.

प्रभाकर ग्वाल एक तो दलित थे और ऊपर से ईमानदार व न्यायप्रिय. ऐसे में इन्हें आखिर कबतक बर्दाश्त किया जाता. प्रभाकर ग्वाल की बर्खास्तगी से छत्तीसगढ़ की स्थिति को समझा जा सकता है और यह भी अनुमान किया जा सकता है कि वहां जब एक सीजेएम की यह स्थिति है तो वहाँ आम आदिवासियों का क्या हाल होगा.

गांधीवादी व बस्तर में आदिवासियों के बीच कार्य करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो की रिपोर्ट 2008-14 के आधार पर बताते हैं कि सन् 2014 में छत्तीसगढ़ में 7,39,435 लोगों के खिलाफ पुलिस कार्यवाही की गई. इनमें से 1,44,017 लोगों के खिलाफ जमानती वांरट जारी हुए। 81,329 को गैर-जमानती वारंटों पर जेल भेजा गया और 4,88,366 लोगों को पूछताछ के लिए थाने बुलाया गया। यही नहीं साढ़े छः सौ से अधिक गाँव को उजाड़ दिया गया और आदिवासियों को मजबूर कर दिया गया कि वो अपने घर-गाँव छोड़कर चले जाएँ. ये आंकड़े अपनी कहानी खुद कहते हैं.

ऐसे में एक दलित न्यायाधीश जब ईमानदारी के साथ निर्णय लेने लगता है और भ्रष्ट अधिकारी, प्रशासन को न्याय के कटघरे में घेरता है तो दिक्कत शुरू होती है. पहले प्रभाकर ग्वाल का स्थानान्तरण कर रायपुर भेज दिया जाता है. यहाँ फिर वो छत्तीसगढ़ व्यापम यानी कि पीएमटी प्रवेश परीक्षा की धांधली में दोषियों को सज़ा के साथ पुलिस अधीक्षक के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दायर करने का आदेश भी देते हैं. ध्यान रहे कि इस फैसले के बाद उच्च अधिकारियों व नेताओं के फंसने की संभावना के मद्देनज़र भाजपा के विधायक रामलाल चौहान व दीपांशु काबरा (जो कि पीएमटी परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने के समय पुलिस अधीक्षक रायपुर रहे हैं, व जिनके नियंत्रण में विवेचना / अन्वेषण हुया है) ने धमकी व देख लेने की बात की जिसके खिलाफ प्रभाकर ग्वाल ने सम्बन्धित थाना सिविल लाइन रायपुर में शिकायत दर्ज कराई, मगर उस शिकायत पर अभी तक किसी भी प्रकार का अपराध दर्ज नहीं किया गया है. परन्तु उलटे प्रभाकर ग्वाल पर ही माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया कि आपने बिना अनुमति एवं सूचना के थाने में क्यों शिकायत किया है. इसके बाद इनका स्थानान्तरण सुकमा कर दिया गया, जहां 26 सितम्बर 2015 से प्रभाकर ग्वाल अपना पदभार संभाल न्यायालीय कार्य करने लगे.

इसी बीच 15 अक्टूबर को बहुचर्चित भदौरा जमीन घोटाले में दो इंजीनियर विलास जाधव व एम. के. रुग्गी को 12-12 वर्ष की सश्रम कारावास व कुल एक करोड़ रूपये जुर्माने से दण्डित किये. इन निर्णयों ने आम लोगों में जहां प्रभाकर ग्वाल का सम्मान बढ़ा तो वहीँ अधिकारियों व भ्रष्ट तंत्र में दहशत फैलने लगी. इसका परिणाम यह हुआ कि प्रभाकर ग्वाल को जान का खतरा सताने लगा और उन्होंने अपनी सुरक्षा की मांग की व इसके लिए पुलिस अधीक्षक से मिलने की भी कोशिश की मगर मिलने से इनकार कर दिया गया.

31 अक्टूबर 2015 को अपने पैतृक गाँव सरायपाली जाते समय टोल टैक्स नाका रसनी थाना, जिला रायपुर आरंग के पास टोल टैक्स के तीन कर्मचारियों द्वारा उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की गयी. इसपर भी आज तक कोई कार्यवाई नहीं हुयी उलटे बाद में अभियुक्त व टोल टैक्स कर्मचारी तथा टोल टैक्स मेनेजर के द्वारा इनपर वाद दायर किया गया है और इनकी शिकायत में जो तफसील दी गयी है वो प्रथम दृष्टया आत्मव्याघाती हैं.
सुकमा ज़िले के कलेक्टर नीरज बंसोड़ द्वारा 7 दिसम्बर 15 को कथित रुप से एक ऑडियो सार्वजनिक हुया जिसमें कलेक्टर ग्वाल को एक मुकदमे को दर्ज करने से पहले उनसे सलाह लेने की सीख देने की बात कहते हुए सुने जा सकते हैं. इस मामले को ग्वाल ने न्यायिक मामले में हस्तक्षेप मानते हुए, इसकी शिकायत ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश से की थी.
इन सब मामलों के चलते प्रभाकर ग्वाल की पत्नी ने एक याचिका हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस नवीन सिन्हा समेत नौ जजों, तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और एक प्रशासनिक अधिकारी समेत कुल 21 लोगों को अभियुक्त बनाते हुए रायपुर के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अश्विनी कुमार चतुर्वेदी की अदालत में 26 मार्च 2016 को दायर किया जिसे उन्होंने स्वीकार करते हुए 18 अप्रैल 2016 को सभी पक्षों को सम्मन जारी किया. सरकार जिला प्रशासन व न्यायपालिका सबके लिए गले की फांस बन गए प्रभाकर ग्वाल से मुक्ति पाने में ही सबको राहत मिलता नज़र आया व आनन्-फानन में प्रभाकर ग्वाल के खिलाफ जनहित का बहाना लेकर उन्हें तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया गया. यही नहीं इसके बाद 18 अप्रैल को होनेवाली सुनवाई भी स्थगित कर दी गयी है.
सरकार की इच्छा के विरुद्ध जाने का मतलब या तो आप माओवादी हैं या फिर देशद्रोही. ऊपर से यदि आप आदिवासी, दलित व मुस्लिम हैं तो फिर आप इसके लिए बहुत ही सॉफ्ट टारगेट हैं. दरअसल जो लोग समाज के भौतिक उत्पादन के साधनों पर अधिकार करते हैं वो ही मानसिक उत्पादन के साधनों पर भी अधिकार कर लेते हैं. धीरे-धीरे आम जनता जाने-अनजाने इन प्रभु लोगों के पक्ष और हित को ही सबकुछ समझने लगती है. पूरे देश में और खासतौर से छत्तीसगढ़ में सरकार की तमाम कोशिश यही है कि किस तरह पूंजीवाद का शातिर खेल- शोषण व अत्याचार निर्विघ्न रूप से जारी रह सके. और किस तरह से उनके संरक्षण में चलने वाले, अन्तर्राष्ट्रीय कारपोरेट्स की और देशी पूँजीपतियों की नाभिनालबद्धता में देश की जनता की खनिज संपदा का जो दोहन हो रहा है, उसको जायज ठहराया जा सके और अरबों मूल्य वाली संपदा की  लूट को सुचारू रूप से जारी रखा जा सके. इस पूरी प्रक्रिया में जो भी बाधा बने, उसे येन-केन-प्रकरणेन रास्ते से हटा दिया जाए. यह आधुनिक दौर का वह स्याह वक़्त है जिसमें असहमति के ढेर सारे खतरे मौजूद हैं और इस स्याह दौर को खत्म करने के लिए ये खतरे उठाने ही होंगे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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