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सच बोलोगे तो मारे जाओगे..

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-महेंद्र दुबे॥
21 मार्च को शाम लगभग 5 बजे पुलिस द्वारा उठाये गए हिंदी दैनिक “पत्रिका” से संबद्ध और ईटीवी न्यूज से हाल ही में हटाये गये बस्तर क्षेत्र के युवा और निर्भीक पत्रकार प्रभात सिंह को पुलिस ने कल जगदलपुर की एक अदालत में पेश किया जहां से उन्हें 26 मार्च तक के लिए जेल भेजा गया है। पुलिस ने जगदलपुर के परपा थाने में उनके खिलाफ शिकायतकर्ता संतोष तिवारी की रिपोर्ट पर धारा 69, 69A आई.टी.एक्ट और 292 आईपीसी का अपराध दर्ज किया है।
खबर है कि पत्रकार प्रभात सिंह के खिलाफ बस्तर दंतेवाड़ा के अलग अलग थानों में 3 और आपराधिक प्रकरण दर्ज किये गए है जिनमे भी उनको कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है। बस्तर दंतेवाड़ा में पिछले एक साल में पुलिस के हत्थे चढ़े प्रभात सिंह तीसरे पत्रकार है, इससे पहले दो पत्रकार सोमारू नाग और संतोष यादव को गिरफ्तार किया जा चुका है जो अभी भी जेल में है हालांकि स्वतंत्र पत्रकार मालनी सुब्रह्मण्यम और बीबीसी संवाददाता आलोक पुतुल जरूर किस्मत के धनी रहे जो किसी तरह अब तक बचे हुये है।
प्रभात सिंह बस्तर अंचल में निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए जाने जाते है और कई अवसरों में उन्होंने अपनी जान का जोखिम उठाकर पुलिस और माओवादियों के बीच पिस रहे आदिवासियों का दर्द दुनिया के सामने लाया है। अंचल के पुलिसिया अत्याचार की बेबाक रिपोर्टिंग के कारण वो बहुत दिनों से पुलिस के निशाने पर थे। पिछले साल 17 अप्रैल को अंचल के सुदूर गाँव पोदेनार में पुलिस ने नक्सलियों के साथ जबरदस्त मुठभेड़ होने का दावा किया था और इस मुठभेड़ को छत्तीसगढ़ पुलिस ने बतौर उपलब्धि प्रचारित किया था! प्रभात सिंह को पुलिस की कहानी में कई पेंच नज़र आने लगे थे इसलिये वो पोदेनार गाँव पहुँच गए और वहां से कथित मुठभेड़ के प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीणों और पीड़ित पक्षों से सीधे बात कर 29 अप्रैल को रायपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक “पत्रिका” में अपनी तथ्यपरक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमे उन्होंने पुलिस की मुठभेड़ की कहानी को सिरे से ख़ारिज करते हुए ग्रामीणों के हवाले से पुलिस पर गम्भीर आरोप लगाये और इस मुठभेड़ की पुलिसिया कार्यवाही को कटघरे में ला कर खड़ा कर दिया। बस यहीं से प्रभात सिंह बस्तर पुलिस को खटकने लगे। प्रभात सिंह को बस्तर आईजी एस. आर. कल्लूरी ने मई 2015 में एक प्रेस कांफ्रेंस में सार्वजनिक रूप से उनकी “अलग तरीके की पत्रकारिता” करने की शैली के खिलाफ बोलते हुये उन्हें धमकाया था। इस घटना के बाद बस्तर क्षेत्र में पुलिस और उनके सरंक्षण मे पल रहे कुछ कथित पत्रकारों ने उनके खिलाफ अभियान छेड़ रखा था। क्षेत्र के एक व्हाट्सअप ग्रुप में प्रभात सिंह के पोस्ट में हुई एक मात्रा की गलती को आधार बना कर उन्हें देशद्रोही के रूप में प्रचारित किया गया। इस व्हाट्सअप ग्रुप में उनके खिलाफ की जा रही टिप्पणियों को लेकर प्रभात सिंह ने संतोष तिवारी, महेश राव और सुब्बा राव के खिलाफ 1 मार्च 2016 को एक लिखित शिकायत दंतेवाड़ा थाने में दी थी। यहां दिलचस्प ये है कि प्रभात सिंह की रिपोर्ट पर पुलिस ने तो कोई कार्यवाही नहीं की लेकिन जिनके खिलाफ प्रभात सिंह ने रिपोर्ट लिखाई थी उन्ही में से एक संतोष तिवारी की रिपोर्ट पर उनके खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया गया है।
बस्तर क्षेत्र में प्रभात सिंह आप नेता सोनी सोढ़ी और उनके भतीजे लिंगा राम कोड़ापी की मदद करते रहते थे जो खुद पुलिसिया अत्याचार का शिकार रहे है, पुलिस अट्रोसिटिस के कई मामले जो सोनी सोढ़ी ने उजागर किये है उनकी तह तक पहुँचने में प्रभात सिंह ने ही उनकी मदद की थी। पत्रकार संतोष यादव और सोमारू नाग की रिहाई और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर आन्दोलनरत पत्रकार सुरक्षा संयुक्त संघर्ष समिति के कार्यक्रमों भी प्रभात सिंह सक्रिय रहे थे। प्रभात सिंह कोे करीब एक सफ्ताह पहले ईटीवी न्यूज छोड़ने पर मजबूर किया गया था और उन्होंने आरोप भी लगाया था कि उन्हें आई जी कल्लूरी के दबाव में ही ईटीवी न्यूज से हटाया गया है और खबर है कि प्रभात सिंह के ईटीवी से हटने के ठीक पहले इस न्यूज चैनल के वरिष्ट पदाधिकारी नें हेलीकाप्टर से आईजी कल्लूरी के साथ बस्तर का दौरा भी क्या था।
प्रभात सिंह को लेकर छत्तीसगढ़ में अघोषित चुप्पी है। राजधानी में ज्यादातर स्थापित पत्रकारों की जुबान बंद है और वो इस मामले में खुल कर बोलने और प्रभात सिंह के समर्थन में आने से कतरा रहे है। बस्तर दंतेवाड़ा में ईमानदार और निर्भीक पत्रकारों को अप्रत्यक्ष रूप से लगातार धमकियां दी जा रही है और उन्हें कभी भी गिरफ्तार किये जाने का मेसेज दिया जा रहा है और कथित पत्रकारों का एक धड़ा पुलिस के साथ लगातार बैठकें कर रहा है। हालात बदतर हो चुके है, लोकतंत्र की लाश पर बैठे कमल शुक्ला (Kamal Shukla) तामेश्वर सिन्हा (Tameshwar Sinha )जैसे ईमानदार और निर्भीक पत्रकार कब जेल भेज दिये जायेंगे कोई नहीं जानता। प्रभात सिंह के खिलाफ आरोपों की फेरहिस्त काफी लंबी है और इनमें कभी भी देशद्रोह का आरोप जुड़ सकता है। फिलहाल प्रभात सिंह सच लिखने और बस्तर क्षेत्र के गरीब आदिवासियों का दुःख दर्द दुनिया के सामने लाने के कारण जेल में है और जेल जाने से पहले पुलिस ने उनको यातना देने में कोई कसर नहीं छोड़ी होगी। मैं उनके पत्रकार मित्रों के लगातार संपर्क में हूँ और उनकी पैरवी के लिए जल्दी ही बस्तर जा रहा हूँ।
दुआ कीजिये की उन्हें जल्दी न्याय मिले और सच बोलने के लिए तय की उनकी सजा ज्यादा लंबी न हो।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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