सरकार, पुलिस प्रशासन और मीडिया की जाति देखने का समय..

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-शीबा असलम फहमी॥

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू में देश के विरुद्ध जिसने भी नारा लगाया हो, वह निंदनीय है, अगर सचमुच ऐसा नारा किसी ने लगाया हो, क्योंकि यह जांच का विषय है. लेकिन, देश के विरुद्ध नारा जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने नहीं लगाया, ताे फिर उन्हें गिरफ्तार क्यों किया गया? यूट्यूब का यह लिंक है:

इसे देखने के बाद आप सही-गलत का फैसला खुद कर सकते हैं. लेकिन, मैं वीडियो देखने की बात कर ही क्यों रही हूं? इसका कोई मतलब नहीं है, क्योंकि जहां मंशा ही नहीं है दूध का दूध पानी का पानी करने की, वहां आप कोई भी सुबूत पेश कर दें, उससे आप खुद को सच साबित नहीं कर सकते. जबरा जब मारने ही बैठा है, तो वह क्यों देखेगा कोई सबूत?
याद कीजिए, साल 2009 में पीलीभीत (उत्तर प्रदेश) में वरुण गांधी की चुनावी रैली में खुल्लम-खुल्ला दिया गया उनका वीभत्स भाषण. उस भाषण की तमाम वीडियो सब देखते रहे, लेकिन केस नहीं हुआ. केस करने से पहले उन वीडियो की जांच हुई, तब जाकर केस हुआ. एक दूसरी भी घटना है- मुजफ्फरनगर दंगों में भाजपा विधायकों की उन वीडियोज को देखा जा सकता है, जिनमें वे दंगा भड़काते हुए साफ देखे जा रहे हैं. उन वीडियोज की भी पहले जांच हुई थी. तो फिर कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करने से पहले वीडियो की जांच क्यों नहीं हुई? क्योंकि इस ताबड़तोड़ कार्यवाही का मकसद जेएनयू में चल रहे जाति-विरोधी आंदोलन की कमर तोड़ना है, मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के विरुद्ध लग रहे आरोपों से ध्यान हटाना है, जेएनयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) की गुंडागर्दी को संरक्षण देना है.
जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार का हर नारा देश, देश के लोगों और संविधान के आदर्शों से भरा हुआ है. कन्हैया को देशद्रोही बतानेवाले कुछ लोग रोहित वेमुला की हत्या के पाप को धोने के लिए यह वितंडा खड़ा कर रहे हैं. विश्वविद्यालयों में छात्रों के संगठन या दल छात्रों के मुद्दे उठाने के लिए ही होते हैं. जबकि, एबीवीपी मौजूदा सरकार की भयानक शिक्षा-विरोधी, छात्र-विरोधी, और देश-विरोधी नीतियों के समर्थन के लिए कटिबद्ध है. छात्रहित में कभी न बोलनेवाला जातिदंभ से लैस यह गिरोह हिंदू संस्कृति-बचाओ की आड़ में देशभर में छात्रों के जरिये आतंक का राज स्थापित करने की कोशिश कर रहा है.
कोई अचरज नहीं होता कि जिस वक्त देश का हर विश्वविद्यालय दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकशी के लिए ब्राह्मणवाद पर सवाल उठा रहा था, जब एबीवीपी की हिंसक अराजकता पर सवाल उठ रहे थे, जब द्रोणाचार्यों को चिह्नित किया जा रहा था, ठीक उसी समय जेएनयू कैंपस में कश्मीर/ अफजल गुरु का बेमौका राग क्यों छेड़ा गया? ब्राह्मणवाद को ‘मौके पर मदद’ की यह किसकी साजिश है? ब्राह्मणवाद को ऑक्सीजन देनेवाले ये देवदूत कौन हैं? विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे भीतरघातियों को चिह्नित करे, तभी संभव है कि जेएनयू जैसे उच्च शिक्षण संस्थान की मर्यादा बरकरार रहेगी.
दूसरी तरफ, हमारा मीडिया भी पत्रकारिता छोड़ कर जातिवाद को संरक्षण देने में जुटा हुआ है. रोहित की आत्महत्या ने शिक्षण संस्थाओं में बजबजाते जातिवाद पर से मखमली पर्दा गिरा दिया है. ऐसे में आरक्षण के विरुद्ध बहस को हवा देनेवाला मीडिया मुद्दे को भटकाने के लिए मुसलमान महिलाओं के हाजी अली की ‘खाली/खोखली’ दरगाह में प्रवेश की ‘ऐतिहासिक जंग’ और हिंदू महिलाओं के दो मंदिरों में पूजा/अभिषेक/प्रवेश के अधिकार का महान संघर्ष, आदि मुद्दों को सरोकार सूची में सबसे ऊपर रखता रहा है. आखिर क्यों? क्या इसलिए नहीं कि रोहित की आत्महत्या को सुनिश्चित करनेवाली शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के कुलपति-गिरोह के अपराधों से ध्यान हटाया जा सके? इस मीडिया को प्रोफेसर अमर्त्य सेन और जस्टिस मार्कंडेय काटजू पर सवाल उठाने की हिम्मत क्यों नहीं होती, जो साफ-साफ कह रहे हैं कि ‘अफजल गुरु और याकूब मेमन मासूम थे’? इस देश में बोलने की आजादी क्या सिर्फ उच्च पदासीन, शहरी, शिक्षित, ब्राह्मण पुरुष को ही है? जेएनयू की वैचारिकता को बचाने के लिए जरूरी है कि इन सब सवालों पर से पर्दा उठे.
इस लेख को लिखते लिखते वो वीडियो भी आ गयी जिसमे दूध का दूध और पानी का पानी हुआ है. ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे लगाने वाले एबीवीपी के लोग वीडियो में साफ़ देखे जा सकते हैं. यानी की एबीवीपी ही रात के धुंधलके का फायदा उठा कर ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद ‘ के नारे लगाती है, और सुबह के उजाले में इन नारों का विरोध भी करती है. लेकिन सत्तापक्ष का होने के कारण इनका आत्मविश्वास इतना बढ़ा हुआ था की ये अपने रात वाले कपड़ों में ही पहुँच गए, अपनी ही करतूत का विरोध करने और पोल खुल गयी। अब क्या कहेंगे मीडिया के वो चैनल हेड जो दो दिन से बेकुसूर युवाओं के खून के प्यासे बने हुए हैं?
बड़ा सवाल है की जातिवादी संगठन, मंत्रालय, छात्रदल, मीडिया और सियासीदल अब खुल के देश के बहुसंख्यकों, बहुजनो, दलितों के विरुद्ध तालमेल बना के षड्यंत्र कर रहे हैं. लेकिन इस साज़िश की मेहनत भी क्यों करते हो, सीधे फायर-स्क्वॉड ही भेज दो न?

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2 thoughts on “सरकार, पुलिस प्रशासन और मीडिया की जाति देखने का समय..

  1. एक तरफा और आंख मूंदकर लिखा गया लेख.लेखिका जानती है शायद भारतीय मूर्ख हैं जो भी मैं कहूंगी उसको मान लेगे.सच की तरफ आंख मूंद लेंगें.वो जमाना गया.मीडिया सब बता देता हैं.घटना के बारे में भी और अपनी सोच के बारे में भी.जनता निर्णय लेने की शक्ति स्वयं के पास रखती हैं.किसी के बहकाने से नहीं.डीबेट में हमने देख लिया हैं उन गुरूजनो को जो कन्हैया के लिये झूठ पर झूठ बोल रहेथे.जबाव नहीं सूझ रहा था.इन घटनाओ को निस्पक्ष तरिके से रखना चाहिये न कि पूरी तरह से एक तरफा होकर.
    मन उचाट जाता हैं .

  2. sheeba ji sawaal bahut hai JNU ke peechhe yadi aapko in sabooton par wishwaas hai aur lagta hai ki kanhaiya kumaar nirdosh hai to aap court kyon nahi jaati aur unako bhi lekar jinase aap ko yah lagta hai ki ABVP ne ye sab kiya hai aise lekh likh kar aap jhoot ko sahi nahi bata sakti mera sirf yahi sawwal hai afzal ke samrthan ke program huya hi kyon aur aap ke lekh ka yah matlab nikala jaaye ki aap bhi Afazal ki samrthak hai aur aap bhi hindustaan ke tukade hote dekhna chahti hai

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