सीवीबी से 25 मीडियाकर्मियों की छुट्टी, चैनल की योजना खटाई में

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खबर है कि यशवंत देशमुख की न्यूज़ चैनल लाने की महत्वाकांक्षी योजना खटाई में पड़ गई है। सूत्रों के मुताबिक उनके एक प्रमुख फायनैंसर ने चैनल से हाथ खींच लिया है और अब उनके संस्थान सी वोटर ब्रॉडकास्ट यानि सीवीबी से बड़े पैमाने पर छंटनी भी होने लगी है।

बताया जा रहा है कि पिछले लगभग एक महीने में दो दर्जन से भी अधिक मीडियाकर्मियों को संस्थान से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। इसमें से एक दर्ज़न से भी अधिक मीडियाकर्मी वे हैं जिन्हें प्रोजेक्ट  कात्यायनी के लिए नौकरी पर रखा गया था। कात्यायनी के लिए कार्यक्रम बनाने की जिम्मेदारी इस संस्थान को कुछ ही महीने पहले मिली थी, लेकिन गठबंधन लंबा नहीं खिंच पाया।

हालांकि कात्यायनी से अनुबंध टूटने की आशंका पहले ही से जताई जा रही थी, लेकिन पहले कहा जा रहा था कि इन्हें आने वाले न्यूज़ चैनल  में रख लिया जाएगा। अब तो आलम यह है कि न्यूज़ चैनल के लिए भर्ती तो दूर यूएनआई टीवी के समय बनाए गए ब्यूरो को भी तोड़ा जा रहा है। गौरतलब है कि पिछले साल बड़े ही जोर-शोर से यशवंत देशमुख के सी वोटर ने यूएनआई टीवी  की फ्रेंचाइज़ी के तौर पर न्यूज़ एजेंसी की शुरुआत की थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद यह व्यवस्था भी खत्म हो गई। बाद में उन्होंने इस एजेंसी को सी वोटर के ही नाम पर सीवीबी बना दिया।

सीवीबी की योजना एजेंसी के साथ-साथ एक न्यूज़ चैनल लाने की भी थी, जिसके लिए स्टार न्यूज़ और आईबीएन में वरिष्ठ पदों पर रह चुके प्रशांत टंडन को भी रखा गया। एजेंसी और चैनल के लिए छोटे-बड़े कई पत्रकारों की एक टीम भी बनाई गई, लेकिन अब फायनैंसर के इंकार के बाद सारी रणनीति बदल रही है। कहा जा रहा है कि आगरा के इस फायनैंसर को सब्ज बाग दिखाया गया था कि न्यूज़ एजेंसी भारत में मौजूद वीडियो एजेंसी एएनआई के मुकाबले में खड़ी हो जाएगी और चैनलों से कमाई भी करने लगेगी, लेकिन  कमाई तो दूर, खर्च भी नहीं निकल रहा। लगभग सभी चैनलों को इसकी फीड तो दी जा रही है, लेकिन ज्यादातर जगह बार्टर अनुबंध ही किए गए हैं। यानि इसका माल उसके घर, उसका माल इसके घर, लेना एक न देना दो।

एएनआई के रॉयटर की तरह सीवीबी के पास कोई अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी का साथ भी नहीं रहा जिसके कारण भारत को कोई भी चैनल इसकी फीड खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा पाया। हालांकि लोगों की फौज इकट्ठा करने में यशवंत ने भी लगभग वही रणनीति अपनाई जो कभी एनडीटीवी में डॉक्टर प्रणय रॉय ने अपनाई थी। चर्चित चेहरों और बड़े लोगों के सगे संबंधियों की संस्थान में भरमार है। कोई किसी संपादक की पत्नी है तो कोई पूर्व सरकारी अघिकारी। कोई किसी फ्लॉप चैनल का निकाला गया कर्मचारी है तो कोई किसी अधिकारी का रिश्तेदार।

जानकारों का कहना है कि इस विशाल नाकारा फौज़ का भार अकेले यशवंत के कंधों पर है जो अपने संबंधों के दम पर फायनैंस तो जमा कर लेते हैं, लेकिन उनके सलाहकार व्यवयाय लाने की कोई ठोस योजना बनाने की बजाय उसे उड़ाने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैँ। अब ताजा जानकारी ये है कि सी वोटर प्रिंट मीडिया के लिए एक एजेंसी लाने की तैयारी में है जिसकी कमान अजीत शाही के हाथों में होगी। इस एजेंसी में दुर्नाम मीडियाकर्मी उदय चंद्र की भी प्रमुख भूमिका रहेगी। जाहिर है आगे क्या होगा यह उपरवाले के ही भरोसे है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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