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वेद जी बड़े पत्रकार और उससे भी बड़े इंसान थे..

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पिछले दिनों हुए उनके दुखद निधन से जम्मू- कश्मीर की आज तक की पत्रकारिता का सबसे बड़ा स्तम्भ नहीं रहा..

-शकील अख्तर॥

1990 का सर्द दिसम्बर। श्रीनगर ज्वाइन करने के बाद पहली बार जम्मू आए। रात कास्मो में रूके। सुबह सबसे पहले बगल में स्थित कश्मीर टाइम्स के दफ्तर पहुंच गए। श्रीनगर करीब एक हफ़्ता रह कर आए थे। वहां जो नाम सबसे ज्यादा सुना वह वेद जी का था। कश्मीर टाइम्स के संपादक वेद भसीन।images (7)
मुस्कराते हुए वेद जी बड़ी गर्मजोशी के साथ मिले। उन्हें भी पता चल गया था कि नवभारत टाइम्स से किसी पत्रकार ने श्रीनगर ज्वाइन किया है। उनकी बड़ी सी टेबल के सामने बैठते ही जिस चीज पर हमारी निगाह सबसे पहले गई वह एक तख्ती थी, जिस पर अंग्रेजी में लिखा हुआ था- नो स्मोकिंग! एकदम आक्रामक सा, आदेशनुमा। एक झटका सा लगा। कैसे बड़े और उदार संपादक हैं, जो सामने वाले के लिए ऐसी शर्त लिखे बैठे हैं। ये वो दिन थे जब हम खूब सिगरेट पिया करते थे। खैर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। वह कश्मीर में आतंकवाद का सबसे खतरनाक दौर था। तो आतंकवाद से लेकर राजनीति और दूसरे कई विषयों पर बात होने लगी। पहली मुलाकात में ही समझ में आ गया कि वेद जी बहुत पढ़े- लिखे और कश्मीर की गहराई से जानकारी रखने वाली शख्सियत हैं। चाय आई। और चाय खतम करते ही वेद जी ने अपनी ड्राअर खोली और सिगरेट के पैकेट निकालकर हमें सिगरेट आफर करने लगे। हमने हैरानी से उस नौ स्मोकिंग वाले बोर्ड को देखा। वेद दी ने फौरन बोर्ड ड्राअर के अंदर कर दिया। सिगरेटें जल गईं। मगर हमारे चेहरे से हैरानी और हल्के से गुस्से के भाव कम नहीं हुए। वेद जी खूब जोर से हंसे। हमें भी हंसी आ गई। बोले ये सेल्फ कंट्रोल का तरीका है। ऐसे थे वेद जी। कई बार बिल्कुल बच्चों की तरह मासूम हरकतें करते हुए। और उसे खूब इन्ज्वाय करते हुए। दोस्तों के ग्रेट फ्रेंड मगर उन्हें सताने और मजाक करने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाले।
वेद जी जितने बड़े पत्रकार थे उतने ही बड़े या उससे और बड़े इंसान। उनके बारे में लिखना आसान नहीं है। उनके व्यक्तित्व के इतने पहलू थे कि उन्हें समझना और उन पर लिखना इस वक्त संभव नहीं हो सकता। उसे कई- कई बार में लिखना होगा। दुःख और यादों का सिलसिला किसी एक पहलू पर आपको रूकने नहीं देता। उनके न रहने से जम्मू- कश्मीर की पत्रकारिता में आई अपूरणीय क्षति के बारे में जब सोचते हैं तो लगता है कि न भूतो न भविष्यति शायद उन्हीं के लिए कहा गया था।
वेद जी ने पत्रकारों की कई पीढ़ियां तैयार कीं। कई लेखक बनाए। आज प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्रि डा. जितेन्द्र सिंह बरसों नियमित रूप से कश्मीर टाइम्स में कालम लखते रहे। वैचारिक असहमति के आधार पर कभी वेद जी ने उनका कालम नहीं रोका। आज जम्मू कश्मीर का देश या विदेश में काम करने वाला शायद ही कोई ऐसा पत्रकार हो जो वेद जी को अपना गुरु न मानता हो या उनका प्रभाव उस पर न पड़ा हो। और यह वह दिखावे के लिए नहीं कहता बल्कि दिल से कहता है और वेद जी के प्रति उसकी कृतज्ञता में ईमानदारी झलकती है।
वेद जी जैसे निडर पत्रकार अब शायद ही देखने को मिलें। अख़बार और जिसे आज व्यापक रूप से मिडिया कहा जाता है वह अब बहुधंधी मीडिया मालिकों का रक्षा कवच बन गया है। अख़बार अब कमजोर की आवाज नहीं हैं। वे ताकतवर लोगों और सत्ता के पक्ष में तर्क गढ़ते हैं। ऐसे में वेद जी, जो कभी खुद को अख़बार मालिक नहीं मानते थे बल्कि पत्रकार ही कहते थे का नहीं रहना पत्रकारिता जगत के लिए बहुत बड़ी त्रासदी है।
शायद 1997- 98 की बात है। आई के गुजराल प्रधानमंत्री बने। एक साहब ने वेद जी को बधाई दी। जनाब आपके दोस्त प्रधानमंत्री बन गए। वेद दी हंसे, कहा एक और अच्छा दोस्त, दोस्तों की लिस्ट से निकल गया। कोई सत्ता वेद जी को नहीं लुभा पाई। सरकारों से और व्यवस्था से हमेशा लड़ते रहे। अपने अख़बार को उन्होंने हमेशा गरीब , कमजोर , सताए हुए हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज बनाया।
वेद जी के सबसे नजदीकी दोस्तों में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद हैं। मगर जब 2002 में वे पहली बार मुख्यमंत्री बने तब भी और अभी भी वेद जी के अख़बार ने उन्हें इस आधार पर कभी रियायत नहीं दी कि वे बहुत खास दोस्त है। इसी तरह 1989 में जब वीपी सिंह सरकार में मुफ्ती साहब गृहमंत्री बने तब भी वेद जी की पत्रकारिता दोस्ती के दबाव में कभी नहीं आई। मुफ्ती साहब भी हंसते थे और कहते थे कि वेद जी को कन्वींस करना सबसे मुश्किल काम है। वेद जी को पत्रकारों की संगत में बड़ा मजा आता था। छोटे अखबारों की वे बड़ी मदद करते थे। ऐसे अख़बार मालिक हमने नहीं देखे जो बड़ा अख़बार साम्राज्य स्थापित हो जाने के बाद भी छोटे अख़बारों के पत्रकारों की मदद को हमेशा तैयार रहते हों। छोटे अखबारों की समस्याओं पर वे केन्द्र और राज्य सरकार से मुकाबला करने में कभी पीछे नहीं हटते थे। वे ऐसे बेखौफ और जन समर्पित पत्रकार थे जो जम्मू- कश्मीर के सबसे बड़े अख़बार मालिक बनने के बाद भी पत्रकारिता के मूल उसूलों जैसे कमजोर की आवाज बनना, सत्ता की शक्ति से नहीं डरना अख़बार को पैसे कमाने का जरिया नहीं बनाने पर आजीवन कायम रहे। अंग्रेजी के कश्मीर टाइम्स के बाद जब उन्होंने करीब 30 साल पहले जम्मू से हिन्दी का पहला अख़बार दैनिक कश्मीर टाइम्स निकालने के बारे में सोचा तो उनके बहुत सारे शुभचिंतकों ने इसे घाटे का सौदा बताया। वेद जी ने कहा कि अगर इसमें कुछ पेज डोगरी के डालें जाएं तो? लोगों ने कहा कि फिर तो महा घाटा होगा। वेद जी ने कहा कि डोगरी के पेज सहित हिन्दी अखबार निकालने का फैसला फाइनल। अख़बार को घाटे- लाभ से अलग की चीज मानने वाले अब शायद ही कहीं मिलें।
वेद जी के साथ निकट से काम करने का मौका हमें प्रेस क्लब जम्मू में मिला। तब देखा कि वे कितने लोकतांत्रिक हैं। और किस तरह उनमें सबको साथ लेकर चलने की क्षमता है। प्रेस क्लब की स्थापना के मूल विचार के साथ इसे अंजाम तक पहुंचाने में वेद जी की असाधारण भूमिका रही है। वे इसके संस्थापकों में से थे। इस पूरी कहानी को कभी अलग से लिखेंगे। फिलहाल इतना ही कि वेद जी असहमति का पूरा सम्मान करते थे। वे प्रेस क्लब के अध्यक्ष थे हम सैकेट्री जनरल। कई मुद्दों पर तीखी बहस , मतभेद होते थे मगर वेद जी कभी अपने व्यक्तिगत असर से किसी निर्णय को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करते थे। अगर वेद जी की प्रेरणा और सहयोग नहीं होता कहना मुश्किल है कि प्रेस क्लब बन पाता या नहीं। अब प्रेस क्लब को चाहिए उनकी याद को स्थाई बनाने के लिए वह प्रेस क्लब में उनके नाम का सभागार और बड़े स्तर की एक वार्षिक व्याख्यानमाला ( लेक्चर) की शुरूआत करे।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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