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अबकी बार कुशवाहा सरकार..

-दिलीप सी मण्डल॥
बिहार की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है त्रिवेणी संघ। लगभग सौ साल पहले के इस राजनैतिक सामाजिक आंदोलन की छाप बिहार की राजनीति पर अमिट है। सवर्ण वर्चस्व को तोड़ने के लिए पिछड़ी जातियों की एकजुटता से बने त्रिवेणी संघ की अग्रिम पंक्ति में यादव, कुर्मी, कुशवाहा, बनिया आदि थे। बिहार ने पिछले 25 वर्ष में यादव और कुर्मी नेतृत्व को आज़मा लिया है। ऐतिहासिक निरंतरता का तक़ाज़ा है कि अब कमान कुशवाहा नेता के पास आए।11693814_886134311480561_1266198907920204121_n
बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं है। बीजेपी इस बार बिहार को 1991 से पहले के दौर में ले जाना चाहती है और संभवत: वह किसी भूमिहार नेता को सामने लाए। या वह किसी को सामने न लाकर बाद में किसी भूमिहार नेता को सीएम बना दे। ठीक उस तरह जैसे महाराष्ट्र में फड़नवीस को सीएम बनाया गया।
ऐसी स्थिति में, बिहार में बीजेपी और रणबीर सेना को रोकने के लिए क्या लालू और नीतीश इस बार उपेन्द्र कुशवाहा को आगे करके चुनाव लड़ेंगे? लालू प्रसाद जब नीतीश के लिए क़ुरबानी दे सकते हैं तो कुशवाहा के लिए क्य़ों नहीं? नीतीश कुमार को तो यूँ भी सत्ता का लालच नहीं है। वे सिद्धांतवादी हैं।
अगर लालू-नीतीश-कुशवाहा समीकरण बन जाता है, तो बिहार में बीजेपी का गठबंधन 50 सीट से कम पर निपट सकता है।
फुले समता परिषद के नेता उपेन्द्र कुशवाहा के नेतृत्व पर लालू और नीतीश को विचार करना चाहिए।
रिले रेस में इस बार बैटन पकड़ने की बारी कुशवाहा की है। इसके लिए उपेन्द्र कुशवाहा को साहसी और लालू-नीतीश को उदार बनना पड़ेगा।

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