/* */

भूमि अधिग्रहण बिल – आखिर आपको वोट दिया है..

admin
Page Visited: 34
0 0
Read Time:6 Minute, 18 Second

-प्रवीण दत्ता।।

तो आखिरकार संसद में विपक्ष के तीखे हमले झेलने के बाद विवादों में घिरे भूमि अधिग्रहण बिल को संसद की संयुक्त समिति को सौंप दिया गया है। इस समिति में कुल 30 सदस्य होंगे जिनमे से 20 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से होंगे। सरकार का नया कदम ये सुनिश्चित करने का प्रयास है कि बिल के कानून बनने पर सरकार पर अलोकतांत्रिक और दंभी होने का आरोप न लग सके जैसा कि दिसम्बर 2014 के आखिरी दिन तब लगा था जब मोदी सरकार भूमि अध्यादेश लायी थी।साफ़ है कि प्रधानमंत्री मोदी  इस बिल को जल्द से जल्द कानून बनाकर न केवल भारत में निवेश के इच्छुक देशों को अपनी सरकार के सचमुच सुधारवादी होने का सन्देश देना चाहते हैं और साथ ही बिहार (जो कि एक कृषि प्रधान प्रदेश है) में नवम्बर में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ही इस कानून से उपजने वाले चुनावी आरोपों का डैमेज कंट्रोल भी करना चाहतें हैं। संसद की संयुक्त समिति अपनी रिपोर्ट संसद के मानसून सत्र के पहले दिन ही दे देगी और इसके बाद लगभग तय माना जा रहा है की मोदी सरकार संसद का संयुक्त सत्र (संसदीय इतिहास में तीसरी बार) बुलाकर राज्य सभा की अपनी कमजोरी से पार पा लेगी और भूमि अधिग्रहण कानून पास हो जायेगा।इसी संयुक्त समिति का गठन,देश के विकास और निर्णय करने की गति ही, वे मुद्दे होंगे जिससे मोदी सरकार और भाजपा- विपक्ष के सड़क आंदोलन का मुकाबला करेगी।

land 3

अब सवाल यह है की जब मोदी के नितिन गडकरी सरीखे मंत्री ‘आज तक’ की लाइव बहस में दिग्विजय सिंह को स्पष्ट रूप से ये कह सकते हैं कि ‘सरकार भूमि अधिग्रहण कानून के तहत एक इंच जमीन भी अडानी ,अम्बानी या टाटा के लिए अधिग्रहित नहीं करेगी’ तो फिर गडकरी और भाजपा के अन्य नेता क्यों संसद में इतना ही स्पष्ट नहीं बोलते और ‘सूट-बूट की सरकार’ जैसे आरोपों का जवाब ‘सूटकेस की सरकार’ जैसे जुमलों से तो देते हैं पर तथ्यों पर आधारित बात नहीं रखतें हैं। तथ्य आधारित व्यक्तव्य न केवल सरकार की सही छवि पेश करेंगे बल्कि देश में भूमि अधिग्रहण के पक्ष में माहौल भी बनेगा। ऐसे में कुछ सवाल हैं जिनके जवाब सरकार द्वारा रेखांकित भूमि अधिग्रहण बिल के मूल उद्देश्य “किसानों के भले के साथ ही देश की सामरिक जरूरतों और विकास के दोहरे लक्ष्य को त्वरित गति से हासिल करना” को सुस्पष्ट कर देंगे।
1. केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों के पास कितनी भूमि अधिग्रहित पड़ी हुई है ?
2. इस अधिग्रहित भूमि में से कितनी जमीन का विकास औद्योगिक या आधारभूत ढांचे के लिए किया गया है ?
3. इस अधिग्रहित जमीन में से कितनी भूमि अभी तक अनुपयोगी पड़ी हुई है ?
4. सरकार के प्रतिरक्षा और रेल जैसे विभागों के पास कितनी भूमि खाली पड़ी हुई है ?
5. प्रतिरक्षा और रेल विभाग की भूमि में से कितनी जमीन का कोई अन्य उपयोग सुरक्षा कारणों से नहीं हो सकता ?
6. आधारभूत सरंचना के कितने प्रोजेक्ट भूमि की कमी की वजह से लंबित पड़ें हैं ?
7. सरकार के अनुमान के हिसाब से आधारभूत सरंचना विकास के लिए अगले 10 वर्ष में कितनी जमीन की आवश्यकता होगी ?
8. उपलब्ध लैंड बैंक की जमीन की गणना करने के बाद कितनी और भूमि की आवश्यकता अगले 10 वर्षों में होगी ?

उपरोक्त सवालों के आधिकारिक जवाबों में समय लग सकता है तब तक कुछ ऐसे तथ्य जो आपके-हमारे इस इंतज़ार और उम्मीद को आसान बना सकतें हैं।
इस बात को मानने का कोई कारण नहीं दिखता की जमीन की कमी की वजह से आधारभूत सरंचना के कार्य लंबित हैं क्योंकि आरटीआई से हासिल जानकारी के अनुसार लंबित प्रकरणों में से सिर्फ 8% ही आधारभूत सरंचना के हैं बाकि तो मॉल,मल्टीप्लेक्स व अन्य प्रोजेक्ट हैं। दूसरा तथ्य ये की यूपीए सरकार के कार्यकाल के आखिरी 3 वर्षों में विकास दर गिरी थी अन्यथा 7 वर्षों तक 8% – 9% रही तो यह भी समझ के बाहर है कि भूमि अधिग्रहण का विकास दर से ऐसा क्या खास संबंध है कि सरकार इस कानून को हर हाल में लाना चाहती है ? इस सवाल और ऊपर दिए गए सवालों के जवाब निश्चित ही विपक्ष,बुद्धिजीवियों,विचारकों और किसान संघठनो के सभी शको-शुबहे को दूर कर देंगे।
मुझे अभी तक एक भी भारतीय ऐसा नहीं मिला है जो देश का विकास नहीं चाहता हो।
हाँ मैं एक ऐसा भारतीय हूँ जो अपने सवालों के जवाब भी चाहता हूँ.… आखिर आपको वोट जो दिया है।

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

क्या ड्रैगन देगा हाथी का साथ..

-प्रवीण दत्ता।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा ने हमारे इस विशालकाय पडोसी से हमारे द्विपक्षीय संबंधों को सुर्ख़ियों में […]
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram