खेती करके वह पाप कर रहे हैं क्या..

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हर आधे घंटे में भारत की जीडीपी में क़रीब साढ़े छह अरब रुपये जुड़ जाते हैं और हर आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या कर लेता है! ये हैं विकास की दो तसवीरें!

यानी हर दिन औसतन 46 किसानों की आत्महत्याएँ, यानी हर दिन 46 परिवारों पर मुसीबत का पहाड़!
किसान को खेती से क्या मिलता है? एक हेक्टेयर में गेहूँ बोने पर फ़सल अगर ठीक हो गयी तो छह महीने की मेहनत के बदले किसान को कुल कमाई होगी चौदह हज़ार की, यानी महीने के सिर्फ़ 23 सौ रुपये!
इसलिए हैरानी नहीं कि 2001 से 2011 की जनगणना के बीच देश में 77 लाख किसान कम हो गये? खेती न छोड़ते तो क्या करते?

 

-क़मर वहीद नक़वी।।
किसान मर रहे हैं. ख़बरें छप रही हैं. आज यहाँ से, कल वहाँ से, परसों कहीं और से. ख़बरें लगातार आ रही हैं. आती जा रही हैं. किसान आत्महत्याएँ कर रहे हैं. इसमें क्या नयी बात है? किसान तो बीस साल से आत्महत्याएँ कर रहे हैं. इन बीस बरसों में क़रीब तीन लाख किसान आत्महत्याएँ कर चुके हैं. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक के नाम सुसाइड नोट छोड़ कर मर चुके. कुछ नहीं हुआ. किसी ने नहीं सुना.image1

बीस सालों से आत्महत्याएँ
और किसान क्या पिछले बीस सालों से ही मर रहे हैं! मुंशी प्रेमचन्द के ज़माने में भी वह ऐसे ही मरा करते थे. ‘मदर इंडिया’ के ज़माने में भी किसान ऐसे ही मरा करते थे. अन्दर पिक्चर हाल में नरगिस के बलिदान पर ख़ूब तालियाँ बजतीं, साहूकार कन्हैयालाल को भर-भर गालियाँ farmer-suicideपड़तीं, बाहर असली खेतों वाले गाँवों में साहूकार किसानों का टेंटुआ दबाते रहते और किसान मरते रहते! ईस्टमैन कलर से चल कर अब डिजिटल प्रिंट का ज़माना आ गया, समय कितना बदल गया न! बस देश के लैंडस्केप में एक चीज़ नहीं बदली, क़र्ज़ के बोझ तले किसानों का मरना! वह वैसे ही जारी है. बल्कि आँकड़े कहते हैं कि 1995 के बाद से किसानों की आत्महत्याएँ लगातार बढ़ी हैं. 1991 में देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई थी. विश्व व्यापार संगठन के खुले बाज़ार ने देश का नक्शा बदल दिया, जीडीपी बढ़ती गयी, और किसानों की आत्महत्याओं की तादाद भी. अब हर आधे घंटे में भारत की जीडीपी में क़रीब साढ़े छह अरब रुपये जुड़ जाते हैं और एक किसान आत्महत्या कर लेता है! ये हैं विकास की दो तसवीरें!

कम हुए 77 लाख किसान!
और जब जीडीपी इतनी भारी-भरकम हो जाये कि आप दुनिया में सातवें नम्बर पर पहुँच जायें तो सब तरफ़ विकास ही विकास दिखता है. लेकिन इस विकास के बीच में किसान क्यों लगातार आत्महत्याएँ कर रहे हैं? विकास की इस बहार में 2001 से 2011 की जनगणना के बीच देश में 77 लाख किसान क्यों कम हो गये? उन्होंने खेती क्यों छोड़ दी? वह कहाँ गये, अब क्या कर रहे हैं? यह सवाल गम्भीर नहीं हैं क्या? देश के विकास कार्यक्रमों की प्राथमिकताओं में यह मुद्दा है क्यों नहीं?
बात सिर्फ़ अभी की नहीं है कि दैवी आपदा आ गयी, अचानक बेमौसम बरसात ने फ़सलें तबाह कर दी, इसलिए किसान आत्महत्याएँ करने लगे. अगर ऐसा होता तो कभी-कभार ही होता. लेकिन यहाँ तो किसान हमेशा ही आत्महत्याएँ करते रहते हैं. सूखा पड़ जाये तो भी, बरसात हो जाये तो भी, बाढ़ आ जाये तो भी, फ़सल ख़राब हो जाये तो भी, फ़सल ज़्यादा हो जाये तो भी! फ़सल चौपट हो गयी, तो पैसा डूब गया, क़र्ज़ चुका नहीं पाये, इसलिए आत्महत्या पर मजबूर होना पड़ा. और फ़सल अगर ज़रूरत से ज़्यादा अच्छी हो गयी, तो कहीं रखने का ठिकाना नहीं, बाज़ार में न दाम मिला, न ख़रीदार, फ़सल फेंकनी पड़ गयी, न लागत निकली, न क़र्ज़ चुका, तो आत्महत्या ही एकमात्र रास्ता बचा!

गेहूँ बोओ, महज़ 23 सौ कमाओ!
आँकड़े चौंकाने वाले हैं. हर दिन औसतन 46 किसानों की आत्महत्याएँ, हर दिन क़रीब 46 परिवारों पर मुसीबत का पहाड़, पिछला क़र्ज़ कैसे चुकेगा, पेट कैसे पलेगा, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई कैसे होगी, खेती कौन सम्भालेगा, लड़कियों की शादी कैसे होगी? इस भयावह मानवीय त्रासदी को कैसे रोका जाये, इस पर देश में कभी कोई गम्भीर सोच-विचार नहीं हुआ. उलटे बेशर्मी की हद यह है कि छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने इन आँकड़ों को छुपाना शुरू कर दिया और ‘शून्य आत्महत्याएँ’ घोषित करना शुरू कर दिया. कहा जाने लगा कि आत्महत्याएँ खेती की वजह से नहीं, बल्कि नशे की लत, पारिवारिक झगड़े, बीमारी की परेशानी, लड़की की शादी या ऐसे ही किसी कारण से लिये गये क़र्ज़ को न चुका पाने के कारण हो रही हैं!
जबकि सच्चाई यह है कि खेती लगातार किसान के लिए घाटे का सौदा होती जा रही है. उसकी लागत लगातार बढ़ती जा रही है, जबकि बाज़ार में फ़सल की क़ीमत उस हिसाब से बढ़ कर नहीं मिलती, ऐसे में सामान्य हालत में भी किसान के हाथ कुछ नहीं लग पाता. ख़ुद सरकारी आँकड़े बताते हैं कि गेहूँ की फ़सल पर औसतन एक हेक्टेयर में क़रीब 14 हज़ार, सरसों की फ़सल पर क़रीब 15 हज़ार, चने की फ़सल पर महज़ साढ़े सात हज़ार रुपये और धान पर सिर्फ़ साढ़े चार हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर ही किसान को बच पाते हैं. अब एक छोटा-सा हिसाब लगाइए. गेहूँ की फ़सल में छह महीने लगते हैं. एक हेक्टेयर में किसान ने अगर गेहूँ बोया, और सब ठीकठाक रहा तो उसकी मासिक आमदनी क़रीब 23 सौ रुपये हुई! इसमें तो पेट भरना ही मुहाल है. और अगर किसी वजह से कोई ऊँच-नीच हुई, फ़सल ख़राब हो गयी, फ़सल इतनी ज़्यादा हुई कि बाज़ार में कोई ख़रीदने को तैयार न हो, तो किसान पिछली फ़सल का क़र्ज़ कहाँ से चुकाये, अगली फ़सल के लिए पैसे कहाँ से लाये, परिवार को क्या खिलाये, बच्चों को कैसे पढ़ाये? वह आत्महत्या नहीं करेगा तो और क्या करेगा?

भीख से भी गया-गुज़रा मुआवज़ा!
और सरकारों का रवैया क्या रहा? सरकारें चाहे राज्यों की हों या केन्द्र की, किसी भी पार्टी की रही हों, इनमें से किसी ने खेती के इस गणित को सुधारने के लिए कुछ नहीं किया ताकि एक किसान ठीक से परिवार चलाने लायक़ पैसा कमा सके. होता यह है कि जब कोई आपदा आती है, तो मुआवज़े बँट जाते हैं. वह भी अभी तक तब मिलते थे, जब आधी से ज़्यादा फ़सल का नुक़सान हुआ हो. भला हो अधर में लटके भूमि अधिग्रहण क़ानून का कि किसानों को मरहम लगाने के लिए मोदी सरकार ने यह सीमा घटा कर 33 फ़ीसदी कर दी. लेकिन ऊपर दिये ‘खेती के मुनाफ़े’ की गणित से आप भी अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि छोटी जोत के किसानों के लिए तो यह तैंतीस प्रतिशत की सीमा भी कितनी बड़ी नाइन्साफ़ी है. वह तो रत्ती भर भी घाटा सह पाने की हालत में नहीं हैं.
और मुआवज़ा क्या मिलता है? आधा-अधूरा. कभी 75 रुपये, तो कभी दो-तीन रुपये भी! याद है न कि दो साल पहले हरियाणा सरकार ने किसानों को दो-दो, तीन-तीन रुपये के चेक बाँटे थे! किसान को कितना नुक़सान हुआ, इसके आकलन की कोई व्यवस्था ही नहीं है. उसके ब्लाक में जो औसत नुक़सान हुआ, उसके आधार पर सरकारी अफ़सर अपने दफ़्तर में बैठे-बैठे मुआवज़ा तय कर देते हैं. इस बार हरियाणा सरकार ने न्यूनतम मुआवज़ा पाँच सौ रुपये और उत्तर प्रदेश सरकार ने पन्द्रह सौ रुपये तय किया है. आप ख़ुद समझ सकते हैं कि इतने मामूली मुआवज़े में होगा क्या?

उद्योग के लिए निहाल, किसान के लिए मुहाल!
यह मुआवज़ा मुँह नहीं चिढ़ाता क्या? इस मुआवज़े से न नुक़सान की भरपाई होगी, न क़र्ज़ पटेगा, न घर चलाने भर का इन्तज़ाम हो पायेगा, फिर किसान अगली फ़सल कैसे बोयेगा? खेती से मुनाफ़ा मामूली, नुक़सान होने पर भरपाई की कोई व्यवस्था नहीं, कहने को फ़सल बीमा योजनाएँ हैं, लेकिन मुश्किल से दस फ़ीसदी किसान उसकी कवरेज में हैं, वह भी ज़बरन उन्हें लेना पड़ता है, जिन्होंने किसी सरकारी एजेन्सी या बैंक से क़र्ज लिया है, ताकि बैंक का पैसा न डूबे! वरना इतनी कम कमाई में बीमा प्रीमियम का बोझ कौन उठाये?
पिछले बीस सालों में सरकारों ने उद्योगों के लिए तो बड़ी चिन्ता की. लेकिन मर रहे किसानों को मुआवज़े की भीख बाँट देने के सिवा कुछ नहीं किया गया. देश के आधे से ज़्यादा लोगों को खेती से रोज़गार मिलता है? फिर भी कृषि क्षेत्र की इतनी बुरी हालत क्यों? उद्योगों के पहाड़ जैसे मुनाफ़े के बदले किसान को राई जैसा मुनाफ़ा क्यों मिलता है? उसको न्यूनतम सुरक्षा की गारंटी क्यों नहीं? खेती करके वह पाप कर रहे हैं क्या?

(लोकमत समाचार, 18 अप्रैल 2015) http://raagdesh.com

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