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बाँग्लादेश में इसलामी चरमपंथियों के लिए दुश्मन नम्बर एक कौन है?
भारत में हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए दुश्मन नम्बर एक कौन है?
अमेरिका में ईसाई चरमपंथियों के लिए दुश्मन नम्बर एक कौन है?

हैरान मत होइए कि इन तीनों का दुश्मन एक ही है और वह है सेकुलरिज़्म! क्यों?

इसलामी राष्ट्रवाद, हिन्दू राष्ट्रवाद और ईसाई राष्ट्रवाद तीनों का एक ही चरित्र क्यों है? और इन तीनों को ही आधुनिक और सेकुलर विचार क्यों बर्दाश्त नहीं?

-क़मर वहीद नक़वी||

कहीं का इतिहास कहीं और का भविष्य बाँचे! बात बिलकुल बेतुकी लगती है न! इतिहास कहीं और घटित हुआ हो या हो रहा हो और भविष्य कहीं और का दिख रहा हो! लेकिन बात बेतुकी है नहीं! समय कभी-कभार ऐसे दुर्लभ संयोग भी प्रस्तुत करता है! आप देख पाये, तो ठीक. वरना इतिहास तो अपने को दोहरा ही देगा. क्योंकि इतिहास बार-बार अपने को दोहराने को ही अभिशप्त है!islam

बात बांग्लादेश की है. वहाँ अभी हाल में एक और सेकुलर ब्लागर की हत्या कर दी गयी. सेकुलरिस्टों और इसलामी चरमपंथियों के बीच बांग्लादेश में भीषण संघर्ष चल रहा है. सेकुलर वहाँ जिहादी इसलाम के निशाने पर हैं. आज से नहीं, बल्कि पिछले पैंतालीस सालों से. और संयोग से सेकुलर यहाँ अपने देश में भी निशाने पर हैं! किसके निशाने पर? आप सब जानते ही हैं!

वसीक़ुर्रहमान की ग़लती क्या थी

तो ब्लागर वसीक़ुर्रहमान की ग़लती क्या थी? वह सेकुलर था. धर्मान्धता, साम्प्रदायिक कट्टरपंथ और चरमपंथ के ख़िलाफ़ लिखता रहता था. उसने अपनी फ़ेसबुक वाल पर लिखा था, ‘मैं भी अभिजित राॅय.’ यह अभिजित राॅय कौन हैं? अभिजित भी एक सेकुलर ब्लागर थे, जिनकी इसीफ़रवरी में ढाका में हत्या कर दी गयी थी. और अभिजित राॅय से पहले वहाँ के राजशाही विश्वविद्यालय के दो शिक्षक शैफ़ुल इसलाम और मुहम्मद यूनुस इसलामी चरमपंथियों के हाथों मारे गये थे. उसके पहले डैफ़ोडिल विश्वविद्यालय के छात्र अशरफ़-उल-आलम की हत्या हुई थी और उसके भी पहले फ़रवरी 2013 में जब ढाका के शाहबाग़ स्क्वायर पर धार्मिक अनुदारवादियों और स्वतंत्रता आन्दोलन विरोधियों के ख़िलाफ़ ‘गणजागरण मंच’ का उद्घोष अपने उफ़ान पर था, इस आन्दोलन के एक प्रणेता अहमद राजिब हैदर की हत्या कर दी गयी. उसके भी कुछ और पीछे जायें तो तसलीमा नसरीन को चरमपंथियों की धमकी के कारण देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा और 2004 में मशहूर लेखक हुमायूँ आज़ाद पर क़ातिलाना हमला हुआ, जिनकी बाद में जर्मनी में इलाज के दौरान मौत हो गयी.

बांग्लादेश: कौन था आज़ादी का विरोधी?

बांग्लादेश में कट्टरपंथी इसलाम और सेकुलर ताक़तों के बीच लड़ाई बहुत पुरानी है, उसके जन्म से भी पहले की. एक ताक़त वह है, जो बांग्लादेश को एक पुरातनपंथी, शरीआ आधारित, डेढ़ हज़ार साल पहले की ‘आदर्श’ समाज व्यवस्था वाला इसलामी राष्ट्र बनाना चाहती है, जिसका नेतृत्व राजनीतिक तौर पर जमात-ए-इसलामी करती है और जिसके पीछे हुजी, जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) जैसे जिहादी संगठन हैं और अल बदर, अल शम्स जैसे तमाम छोटे-बड़े चरमपंथी गुट हैं. और इन्हें वहाँ के सबसे बड़े विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की गुपचुप सहानुभूति हासिल है. दूसरी तरफ़, आधुनिक, उदार, प्रगतिशील, लोकतंत्रवादी सेकुलर ताक़तों और बुद्धिजीवियों का बड़ा जमावड़ा है, जो बांग्लादेश को एक सेकुलर राष्ट्र बनाये रखने के लिए जी-जान से जुटा है. शेख़ हसीना वाजेद की सत्तारूढ़ अवामी लीग इसी सेकुलर विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है.

कहानी शुरू होती है 1970 से. जब चुनाव जीतने के बावजूद बंग-बन्धु शेख़ मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया गया. तब एक सेकुलर, स्वतंत्र बांग्लादेश बनाने के लिए आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ा, मुक्ति वाहिनी ने सशस्त्र संघर्ष छेड़ा. लेकिन सेकुलर राज्य की यह कल्पना ही जमात-ए-इसलामी के लिए ‘इसलाम और ईश्वर-विरोधी’ थी. उसने न केवल खुल कर स्वतंत्रता आन्दोलन का विरोध किया, बल्कि पाकिस्तानी सेनाओं की भरपूर मदद भी की, अल बदर, अल शम्स जैसे संगठनों और रज़ाकारों के ज़रिए भयानकतम नरसंहार कराया, जिसमें लाखों लोग मारे गये और लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ. और जब अन्त में इन्हें लगा कि बांग्लादेश बनने से नहीं रोका जा सकता तो 14 दिसम्बर 1971 को उन्होंने चुन-चुन कर बुद्धिजीवियों, चिन्तकों, लेखकों, साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों, शिक्षकों, वकीलों, डाक्टरों, इंजीनियरों आदि को पकड़-पकड़ कर मार डाला क्योंकि उन्हें लगता था कि बांग्लादेशी जनता को सेकुलरिज़्म की रोशनी दिखाने में इन बुद्धिजीवियों का ही हाथ है.

इसलामीकरण बनाम सेकुलर राष्ट्र की जंग

सेकुरलवादियों और इसलामी कट्टरपंथियों की जंग बांग्लादेश की आज़ादी के बाद भी भीतर ही भीतर चलती रही और इसकी परिणति 1975 में शेख़ मुजीबुर्रहमान की हत्या के रूप में हुई. उसके बाद सत्ता पर क़ाबिज़ हुए जनरल ज़ियाउर्रहमान ने सेकुलरिज़्म के बजाय देश के इसलामीकरण का रास्ता चुना और जमात-ए-इसलामी इस दौर में ख़ूब फली-फूली. उसने अकादमिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से लेकर हर जगह अपने पैर पसारे. शिक्षण संस्थाएँ खोलीं, बड़े-बड़े अस्पताल शुरू किये, चैरिटी और जनकल्याण के कई संगठन खड़े किये, मीडिया संस्थानों में घुसपैठ की और राज्यसत्ता के सहारे इसलामी पुनर्जागरण के अपने लक्ष्य की तरफ़ बढ़ना शुरू किया. लेकिन उनका मिशन अधूरा रह गया क्योंकि सेकुलर चेतना ने अन्ततः ज़ोर मारा और शेख़ मुजीब की बेटी हसीना वाजेद 1996 में सत्ता पर क़ाबिज़ हो गयीं. उसके बाद से तमाम राजनीतिक उथल-पुथल के लम्बे दौर से ले कर अब तक बांग्लादेश के कुख्यात नरसंहार के तमाम आरोपी पूरी दबंगई से राजनीतिक-सामाजिक जीवन में सक्रिय थे. किसी की हिम्मत नहीं थी कि उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होती. लेकिन बांग्लादेश की सेकुलर युवा शक्ति ने दो साल पहले शाहबाग़ आन्दोलन के तौर पर इतना दबाव बनाया कि वाजेद सरकार को 1971 के युद्ध आरोपियों पर मुक़दमे से सम्बन्धित क़ानून में संशोधन करना पड़ा और अन्तत: अब्दुल क़ादिर मुल्ला समेत कुछ बड़े नाम फाँसी चढ़ा दिये गये.

इसलामी राष्ट्र बनाम सेकुलर राष्ट्र की यह लड़ाई बांग्लादेश में पिछले पैंतालीस साल से जारी है और अब तो और तेज़ हो गयी है. अब दो कल्पनाएँ कीजिए. एक यह कि बांग्लादेश सेकुलर जन्मा था, अगर तब से वह लगातार सेकुलर राष्ट्र बन कर चला होता, तो आज क्या होता, कैसा होता और कहाँ होता? अच्छे हाल में होता या बुरे? और अगर, सेकुरलवादी 1971 में अपनी पहली ही लड़ाई न जीते होते, तो बांग्लादेश बना ही न होता, क्योंकि जमात-ए-इसलामी तो पाकिस्तान के साथ थी! या फिर अगर जनरल ज़ियाउर्रहमान के बाद से बांग्लादेश लगातार इसलामी राष्ट्र बना रह गया होता तो आज कहाँ होता, कैसा होता?

वहाँ और यहाँ, कुछ-कुछ एक जैसा क्यों?

क्या बांग्लादेश की इस लम्बी कहानी का कोई साम्य हम अपने यहाँ नहीं देखते? अपने यहाँ हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा का इतिहास देखिए और आज़ादी की लड़ाई के दिनों से लेकर अब तक देश में जो हुआ, जो हो रहा है, ज़रा उस पर नज़र दौड़ाइए तो आप आसानी से सब समझ जायेंगे! जिस शेख़ मुजीब ने बांग्लादेश को दुनिया के मानचित्र का हिस्सा बनाया, चार साल बाद उनकी हत्या क्यों कर दी गयी? और यहाँ आज़ादी मिलने के डेढ़ साल के भीतर गाँधी की हत्या क्यों कर दी गयी! वहाँ इतिहास बदल कर शेख़ मुजीब को देशद्रोही साबित करने की पूरी कोशिश की गयी, यहाँ इतिहास बदल कर गाँधी को देशद्रोही और गोडसे को महानायक साबित करने की कोशिश की जा रही है! वहाँ सेकुलर बुद्धिजीवियों के ख़ात्मे के लिए हिंसक अभियान चलाया गया, अब भी चलाया जा रहा है, ये सेकुलर वहाँ इसलामी राष्ट्रवाद के लक्ष्य में रोड़ा हैं? तो क्या आपको इस सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला कि हमारे यहाँ के ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ आख़िर सेकुलर शब्द से इतना क्यों चिढ़ते हैं? यहाँ सेकुलर उनके किस लक्ष्य में रोड़ा हैं?

ज़रा ईसाई राष्ट्रवाद को भी देखिए

और दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका में भी पिछले तीन दशकों से ईसाई धर्म-राज्य की कल्पना भी ज़ोर पकड़ने लगी है. इसके पैरोकारों की नज़र में आधुनिक और सेकुलर विचार ईश्वर-विरोधी हैं और शैतान की देन हैं. क्योंकि सेकुलरिज़म तर्क पर चलता है, और शैतान ने सृष्टि की शुरुआत में मनुष्य को तर्क से बहकाया और ‘वर्जित’ फल चखा दिया! इसलिए सेकुलरिज़्म ईश्वर-विरोधी ‘वर्जित’ फल है! तर्क और बुद्धि बुरी चीज़ है, आस्था ही ईश्वर को प्रिय है! चरमपंथी ईसाइयत के विचार से राज्य पर चर्च का पूरा नियंत्रण होना चाहिए, स्कूलों और सरकारी दफ़्तरों में ईसाई प्रार्थनाएँ होनी चाहिए. बाइबिल आधारित समाज व्यवस्था होनी चाहिए. और इस उग्र ईसाई राष्ट्रवाद के लिए वहाँ भी धर्म और संस्कृति की रक्षा, देशभक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा की गुहार लगायी जा रही है! एक अमेरिकी संगठन ‘एलाएंस डिफ़ेंडिंग फ़्रीडम’ पिछले पन्द्रह साल से ‘ब्लैकस्टोन लीगल फ़ेलोशिप’ चला रहा है, जिसके तहत क़ानून के छात्रों को विशेष ढंग से पुरातनपंथी ईसाई विचारों में प्रशिक्षित और दीक्षित किया जाता है. इसके पीछे सोच यह है कि अमेरिकी न्याय व्यवस्था में कट्टर दक्षिणपंथी पुरातनवादी वकीलों, जजों और विधिवेत्ताओं की संख्या लगातार बढ़ायी जाये ताकि एक दिन अमेरिका का समूचा क़ानूनी तंत्र सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं पर चलने लगे और आधुनिक व सेकुलर विचारों व क़ानूनों का अन्त हो जाये! यह फ़ेलोशिप अब तक गर्भपात, समलैंगिक यौन सम्बन्ध, विवाह में स्त्री-पुरुष की बराबरी जैसी आधुनिक अवधारणाओं का विरोध करनेवाले वकीलों की अच्छी-ख़ासी फ़ौज खड़ी कर चुकी है. है न ख़तरनाक योजना!

अद्भुत है न! इसलामी राष्ट्रवाद, हिन्दू राष्ट्रवाद और ईसाई राष्ट्रवाद तीनों का एक ही चरित्र क्यों है? और तीनों के लिए सबसे बड़ा दुश्मन सेकुलरिज़्म ही क्यों है? इतिहास बोल रहा है, आप सुनेंगे क्या?

(लोकमत समाचार, 4 अप्रैल 2015) http://raagdesh.com
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