”संदीप दीक्षित करते हैं दूसरों के पैसे लाने, ले जाने का कारोबार?” पूछा मध्य प्रदेश भाजपा ने

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बुधवार की रात को भोपाल एक्सप्रेस से निजामुद्दीन से रवाना हुए दिल्ली के सांसद संदीप दीक्षित को लेकर अब सियासत गर्माती दिख रही है। गुरूवार को रेल के सफाई कर्मी को एक बैग मिला जिसमें दस लाख रूपए थे। ये बैग दक्षिण दिल्ली के सांसद संदीप दीक्षित का है। ज्ञातव्य है कि संदीप की मां शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं, जिन पर कामन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचारियों को बचाने के संगीन आरोप हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार सुबह सवा सात बजे यह ट्रेन हबीबगंज पहुंची जहां संदीप दीक्षित उतरे। इसके बाद यह गाड़ी आठ बजे के लगभग यार्ड में चली गई। दोपहर को जब सफाई कर्मियो ने इसकी सफाई आरंभ की तब उन्हें एक बैग मिला। पतासाजी पर यह बैग सांसद संदीप दीक्षित का पाया गया।  एक सांसद के द्वारा दस लाख रूपए की रकम नकद लेकर चलने को लेकर तरह तरह की चर्चाएं फैलना स्वाभाविक ही है।

मामला गरमाते देख संदीप दीक्षित ने बताया कि यह रकम उनके साथ यात्रा कर रहे उनके मित्र जयेश माथुर की थी। जयेश ने भी उनकी बात का समर्थन किया है। उनका कहना था कि वे भी उसी ट्रेन में दूसरे कोच में यात्रा कर रहे थे और सुरक्षा के लिहाज से अपना सुपयों से भरा बैग सांसद के सामान के साथ छोड़ आए थे।

उधर स्थानीय भाजपा संदीप और उनके मित्र की दलीलों से संतुष्ट नहीं दिख रही है। भाजपा ने मांग की है कि अगर यह रकम संदीप दीक्षित या उनके मित्र की है तो वे इसके स्त्रोत को अवश्य ही उजागर करें। पार्टी का सवाल है कि अगर संदीप किसी दूसरे के पैसे ले जा रहे थे तो इतनी बड़ी रकम ले जाने का जोखिम उन्होंने क्यों उठाया? पार्टी नेताओं का सवाल है कि क्या सांसद संदीप दीक्षित किसी के लिए पैसे लाने ले जाने का काम करते हैं? इतनी बड़ी रकम आखिर किस बैंक से निकाली गई? क्या इतनी बड़ी रकम निकासी के वक्त बैंक द्वारा इसकी सूचना आयकर विभाग को दी थी?

आयकर के एक विशेषज्ञ का कहना है कि समरथ को नहीं दोष गोसाईं। अगर किसी आम आदमी के पास एक लाख रूपए भी मिल जाते तो पुलिस और आयकर विभाग नहा धोकर उसके पीछे पड़ जाता। विशेषज्ञ का कहना है कि मामला एक सम्मानीय और हाई प्रोफाईल सांसद का है, इसलिए इसमें ज्यादा कुछ निकलने की उम्मीद नहीं है और इसे जल्द ही ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया जाएगा।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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