नोएडा। जिन डीपी यादव के नाम की कई राज्यों में धाक थी, जिनके नाम से बड़े-बड़े फैसले बिना विवाद के सुलझ जाते थे, वह बचपन से ही बहुत महत्वाकांक्षी थे। उन्होंने दूधिया से मंत्री बनने तक का सफर पूरा किया। शराब की दुनिया में कदम रखने के बाद उन्होंने खूब पैसा कमाया और फिर राजनीति में अपने पैर जमाकर अपना कद बढ़ाया। अपनी छवि सुधारने के लिए तमाम तरह के सामाजिक कार्यो में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।Akhilesh_Lacks_13455

करीब 66 साल पहले नोएडा के सर्फाबाद गांव में डीपी यादव का जन्म महाशय तेजपाल के घर हुआ था। पिता कई बार लगान देने के विरोध में जेल भी गए थे। आर्य समाजी परिवार में पले बढ़े डीपी ने अपने नाम के पीछे यादव की जगह आर्य जोड़ लिया था। पढ़ाई में ज्यादा रुचि नहीं थी इसलिए दूध का कारोबार शुरू कर दिया लेकिन ज्यादा दिन तक यह कारोबार रास नहीं आया।

अति महत्वाकांक्षी यादव ने 70 के दशक में शराब माफिया बाबू किशन लाल से संपर्क साधा और यहीं से उसके जीवन ने पलटी खाई। अपनी दबंग कद काठी के चलते डीपी यादव किशन लाल के नजदीकी बन गए। कुछ ही समय बाद वह किशन लाल के बिजनेस पार्टनर बन गए। दोनों मिलकर जोधपुर से कच्ची शराब लाते और पैकिंग के बाद अपना लेबल लगा कर उस शराब को आसपास के राज्यों में बेचते थे। इस बीच डीपी ने अपनी टीम बनाई। जगदीश पहलवान, कालू मेंटल, परमानंद यादव, श्याम सिंह, प्रकाश पहलवान, शूटर चुन्ना पंडित, सत्यवीर यादव, मुकेश पंडित और स्वराज यादव वगैरह डीपी के खास गुर्गे बन गए।

कच्ची शराब से हुई थी 128 लोगों की मौत

1990 के आसपास कच्ची शराब पीने से हरियाणा में 128 लोग मौत के मुंह में समा गए। जांच के बाद डीपी यादव को दोषी मानते हुए हरियाणा पुलिस ने उसके खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल की। पैसा, पहुंच और दबंगई के बल पर धीरे-धीरे डीपी यादव अपराध की दुनिया का स्वयंभू बादशाह हो गया।

एनएसए के तहत भी हुई कार्रवाई

दो दर्जन से अधिक आपराधिक मुकदमों के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक सिद्ध होने पर 1991 में डीपी यादव पर एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम) के तहत भी कार्रवाई हुई। इसके बावजूद उन्होंने 1992 में अपने राजनीतिक गुरु दादरी क्षेत्र के विधायक महेंद्र सिंह भाटी की हत्या करा दी। इसके बाद गैंगवार शुरू हुआ, जिसमें डीपी के गुर्गों ने कई लोगों को मारा। इसमें डीपी के पारिवारिक सदस्यों के साथ उनके कई खास लोगों की बलि चढ़ गई।

दुश्मनों से किया गुप्त समझौता

कहा जाता है कि ताबड़तोड़ हत्याओं से जब डीपी और उसके दुश्मन तंग आ गए और हर समय भय से परेशान हो उठे, तो दोनों ने गोपनीय समझौता कर लिया कि दोनों शांति से जीवन जीए।

कई आपराधिक मामले दर्ज

डीपी पर हत्या के नौ और डकैती के दो मामलों के साथ अपहरण और फिरौती वसूलने के तमाम मुकदमे दर्ज हैं। अधिकांश मामले हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, बुलंदशहर और बदायूं जिले में दर्ज हैं।

छवि सुधारने को लिया राजनीति का सहारा

अकूत संपत्ति अर्जित करने के बाद भी डीपी यादव की छवि एक गुंडे और माफिया वाली ही थी, जिससे निजात पाने के लिए वह छटपटा रहे थे। 80 के दशक में कांग्रेस के बलराम सिंह यादव ने उन्हें कांग्रेस पिछड़ा वर्ग का गाजियाबाद अध्यक्ष बना दिया। इसी बीच वह महेंद्र सिंह भाटी के संपर्क में आए और राजनीति में पदार्पण किया। पहली बार डीपी यादव बिसरख से ब्लाक प्रमुख चुने गए। इसके बाद मुलायम सिंह यादव के संपर्क में आ गए। कहा जाता है कि पार्टी गठन करने के बाद मुलायम सिंह यादव को धनाढ्य लोगों की जरूरत थी। डीपी को मंच चाहिए था और मुलायम को पैसा, सो दोनों का आसानी से मिलन हो गया। मुलायम सिंह यादव ने डीपी को बुलंदशहर से टिकट दिया और वह धनबल व बाहुबल का दुरुपयोग कर आसानी से जीत गए। सरकार बनने पर मुलायम ने उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया और पंचायती राज मंत्रालय की जिम्मेदारी दी।

मुलायम सिंह ने बना ली दूरी

जिस पैसे के लिए मुलायम ने डीपी यादव को हाथों-हाथ लिया था, उसी पैसे के कारण उन्होंने डीपी से दूरी बना ली। कहा जाता है कि मुलायम सिंह यादव के करीबियों और पार्टी के खास नेताओं को डीपी यादव आए दिन कीमती तोहफे भेजते थे। डीपी यादव पार्टी पर हावी होते, उससे पहले मुलायम ने डीपी से ही किनारा कर लिया। तब से मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार से डीपी लगातार टकरा रहे हैं। खुद मुलायम सिंह यादव को संभल लोकसभा क्षेत्र से चुनौती दे चुके हैं पर हार गए। इसके बाद प्रो. रामगोपाल यादव के विरुद्ध भी चुनाव लड़ा, पर कामयाबी नहीं मिली। पिछले लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव के विरुद्ध बदायूं लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और इस चुनाव में भी हार गए।

सांसद व विधायक रहे डीपी

डीपी यादव भाजपा और बसपा में भी रहे और एक-एक कर जब सबने किनारा कर लिया, तो अपना राष्ट्रीय परिवर्तन दल नाम की पार्टी गठित कर ली। डीपी यादव संभल लोकसभा क्षेत्र से सांसद एवं राज्य सभा सदस्य के साथ बदायूं के सहसवान क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं। पिछली बार पूर्ण बहुमत की बसपा सरकार आने पर उन्होंने अपने दल का बसपा में विलय कर लिया था और सत्ता का दुरुपयोग कर अपने भतीजे जितेंद्र यादव को एमएलसी बना दिया। इसके अलावा अपने साले भारत सिंह यादव की पत्नी पूनम यादव को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन करा दिया।

आवास पर पसरा रहा सन्नाटा

अदालत का फैसला आने के बाद डीपी यादव के गाजियाबाद में राजनगर स्थित आवास और भाजपा नेता प्रणीत भाटी के दादरी स्थित आवास पर सन्नाटा पसरा रहा।

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