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विनोद मेहता का कुत्‍ता और सुब्रत राय के कुत्‍ते..

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-कुमार सौवीर||
लखनऊ : आइये, हम आपको पत्रकारिता में कुत्‍ता-बाजी वाले करीब 30 साल पहले पुराने दो-एक जोरदार और दिलचस्‍प मजमा में तमाशा दिखाते हैं।10994927_10203894509667370_1494969722432406316_n
यह मजमा दो समाचार संस्‍थानों के बारे में है जिसमें एक तो मालिकनुमा पत्रकार है और दूसरा पत्रकारनुमा मालिक। एक का नाम है विनोद मेहता, जिसने पत्रकारिता में जी-दार पत्रकारिता करते हुए बेबाक पत्रकारों की टीम तैयार की और उसके बाद आज उसका देहावसान हो गया। लेकिन इसके बावजूद जिन पत्रकारों की टोली विनोद ने खड़ी की, वह आज भी विनोद की भरसक प्रशंसा करती है। दूसरे का नाम है सुब्रत राय जो पिछले एक साल से तिहाड़ जेल में बंद होकर अपनी गैर-कानूनी अट्टालिका को धराशाई करते देख रहा है। उसके पत्रकारों ने अपने मालिक के लिए शुरूआत दौर में हल्‍की-फुल्‍की कोशिश तो की, लेकिन बाद में जल्‍दी ही वे हांफ कर कोने में बैठ गये। दरअसल उन्‍हें साफ पता चल गया था कि उनका मालिक अब बुरा फंस चुका है इसलिए वो पत्रकारों ने तय किया है शिकंजे में फंसे अपने मालिक के लिए कोशिश करने में अपनी उर्जा खराब नहीं करेंगे।
शुरू से ही संस्‍कार के तौर पर मेरे घर न्‍यूज-टाइम और प्रमुख अखबारों-पत्रिकाओं के साथ हिन्‍दी में दिनमान, रविवार, आउटलुक और इंडिया टुडे नियम से आया करती थी। यह पेशागत अनिवार्यता का मसला था और जिज्ञासा-लालसा का भी विषय। दिन-रात खबरों पर बात। अक्‍सर सपनों में भी खबरें तक आ जाती थीं।
यह शायद डेढ़ दशक पहले का एक दिन रहा होगा, जब मैंने आउटलुक का एक अजीब वार्षिकांक देखा। सम्‍पादकीय लेख की लाइनों के बीच विनोद मेहता अपनी आलीशान सिंगल-सोफे पर बैठे थे। उनका हाथ अपने सम्‍पादक यानी एडीटर यानी अपने कुत्‍ते के माथे पर सहलाते हुए था। फोटो के साथ कैप्‍शन में विनोद मेहता का गर्वोक्ति वाला वाक्‍य भी कैप्‍शन में दर्ज था:- मैं और मेरा एडीटर।
चूंकि मैं खुद को वाच-डॉग यानी पहरेदारी पर लगे सजग कुत्‍ते के तौर पर मानता हूं और इसलिए भी कि मैं कुत्‍तों के प्रति ज्‍यादा आग्रही हूं। इसलिए मैंने उस कुत्‍ते को गौर से देखा। साफ देखा कि विनोद मेहता ने खबरों के साथ जानबूझ के साथ अन्‍याय किया है। क्‍योंकि इस कुत्‍ते में फोटोशॉप का कमाल दिखाते हुए उसके जननांग को ब्‍लर्क या ब्रश कर दिया गया था।
मुझे बुरा लगा कि इतना बड़ा पत्रकार इतनी बेवकूफी कैसे कर सकता था। लोक-लिहाज के चलते तो हर्गिज नहीं। लेकिन जल्‍दी ही मुझे साफ लगा कि विनोद मेहता ने इसे पूरी मंशा के साथ ही ब्रश किया था। कभी मेरी मुलाकात विनोद जी से हुई, जो मैं उस बारे में बात करता। लेकिन इतना तो समझ गया कि उन्‍होंने अपने कुत्‍ते को पूरी इज्‍जत और सम्‍मान-अधिकार दे रखा था। बस चंद ऐतराजों-बंदिशों के साथ। उन्‍हें लगा होगा जो बिना बंदिश के मानव का जीवन पशुवत हो जाता है, इसीलिए अनुशासन अनिवार्य है। और बंदिशों को उन्‍होंने प्रतीक के तौर पर अपने एडीटर पर लागू कर दिया, ताकि बाकी लोगों के बीच मैसेज सामान्‍य तौर पर जाता रहे। वह तो सुमन्‍त भट्टाचार्य से मैंने इस बारे में फोन पर आज बात की, तो पता चला कि उन्‍होंने अपने मालिक रहेजा-बंधुओं के दबावों को भी नामंजूर कर दिया था। यह हाल‍त विनोद मेहता की अपने पत्रकारीय मूल्‍यों के प्रति अकाट्य आस्‍था का प्रतीक है।
त्रिकड़ त्रिकड़ डम्‍म डम्‍म
तिरकट तिरकट डम्‍म डम्‍म
सलाम है विनोद जी, पत्रकारिता तो आप जैसे महारथियों के चलते जिन्‍दा है। आपके सामने मैं अपना शीश झुकाता हूं।
अब दूसरा करेक्‍टर देखिये। मैंने सहारा इंडिया के साप्‍ताहिक सहारा में प्रूफ-रीडर के तौर पर नौकरी शुरू की थी। यह 2 जून-1982 की बात है। यह अखबार सुब्रत राय निकालते थे। प्रबंध-सम्‍पादक के तौर पर। अखबार चल गया तो कुछ ही दिनों में सुब्रत राय के तेवरों में परिवर्तन शुरू हो गया। नतीजा, श्रमिक आंदोलन हुआ और अहंकारी सुब्रत राय ने अखबार बंद कर दिया। लम्‍बी लड़ाई चली। आखिरकार हमें जीत मिली। उप श्रम आयुक्‍त की मध्‍यस्‍थता से समझौता हुआ कि मुआवजा समेत सारे देयों का भुगतान हो!
यह भी शर्त जुड़ी कि यदि भविष्य में सहारा इंडिया ने कोई अखबार निकाला तो साप्‍ताहिक सहारा के कर्मचारियों को वरीयता के आधार पर समायोजित किया जाना सहारा इंडिया का दायित्व होगा।
इस फैसले के एक हफ्ते में सुब्रत राय ने अपने मुख्यालय में एक सौहार्द्र समारोह आयोजित किया। नाश्ता-पानी हुआ, हल्का हंसी-मजाक भी चला। लेकिन पूरे दौरान सुब्रत राय की भंगिमा अहंकारी व्यक्ति से बाहर निकल नहीं पायी। अचानक एक साथी ने मजाक किया:- तो सर, अब जब आप सहारा का अखबार निकालेंगे तो हम लोगों को सबसे पहले बुलायेंगे ना।
बस, सुनते ही तिलमिला गये सुब्रत राय। बोले:- न न । अब नहीं। हर्गिज नहीं। चाहे कुछ भी हो जाए, अब साप्ताहिक सहारा के कर्मचारियों को सहारा इंडिया में घुसने तक नहीं दूंगा।
शाबास सुब्रत राय। उन्होंने जो भी कहा, उसे कर दिखाया। उन्होंने तीन साल बाद ही राष्ट्रीय सहारा अखबार समूह का गठन कर कई अखबार और चैनल जरूर खोले, लेकिन एक भी पुराने कर्मचारी को उसमें जगह नहीं दी। हां, बाद में पता चला कि जो पुराने दो-एक लोगों को टिप के तौर पर उसमें समायोजित करा लिया गया था। वैसे हकीकत तो यह भी थी कि बाकी किसी पुराने कर्मचारी ने उसके बाद कभी भी सहारा इंडिया की ओर निगाह तक नहीं डाली।
ऐसा नहीं था कि सुब्रत के उस बयान पर कोई नाराज नहीं हुआ था। खूब भड़के थे हम लोग। लेकिन यह मान कर कि सुब्रत राय आक्रोश में हैं और यह भी कि अब विदाई के मौके पर क्या झंझट-टंटा किया जाए, हम सब खामोश ही रह गये थे।
कुछ भी हो, उसके बाद सुब्रत राय ने जो भी सम्पादक बनाया, उनकी हालत कुत्तों से बदतर भी रही। हां, बाकी अखबारों के पत्रकारों को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने अपने पत्रकारों को वेतन ज्यादा ही दिया, लेकिन उससे सहस्र-गुणा अपमान भी खूब किया। हर पल किया। सम्पादकों को इस दड़बे से उस दड़बे तक बेवजह परोसा गया। पूरा का पूरा अखबार सुब्रत राय की यशो-गाथा की पुस्तिका ही बन गया।
नतीजा, अखबार का स्तर रसातल तक पहुंचने लगा। एक बार तो एक सम्पादक ने अपने वाराणसी एडीशन में मायावती को मादर-बेटी तक की गालियां छाप दीं।
तो कुल मिलाकर यह, कि विनोद मेहता ने अपने कुत्ते को प्रतीक तौर पर सम्पादक पर कुछ बंदिश लगायीं, लेकिन असल सम्पादक को सम्पादक ही बनाये रखा, जबकि सुब्रत राय ने सम्पादक को कुत्ते को प्रतीक के तौर पर पेश करते हुए सम्पादक को हमेशा सिर्फ अपमानजनक बंदिशें लगायीं, और कुत्ते को कूकुर ही बनाये डाला।
डफ्फर डफ्फर
डुमरडुमा डुमरडुमा
चलो मेरे जेल-नशीन सुब्रत राय! तुमने देश-समाज को बेहद आर्थिक धोखाधडी की है और खासकर पत्रकारों का अक्षम्‍य अपमान किया है। पत्रकारिता की जो लानत-मलामत चल रही है, उसमें तुम्‍हारा योगदान सर्वाधिक है।
लानत है तुम पर सुब्रत राय, लानत।
तो बच्‍चों। डुग्गी-डमरू बज चुका है!
मजमा खत्तम

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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