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केजरीवाल ने अड़कर प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को PAC से किया बाहर..

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-हिमांशी धवन||
आम आदमी पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर कमिटी से बुधवार को योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की छुट्टी ने पार्टी में अरविंद केजरीवाल के प्रभुत्व पर मुहर लगा दी है। यादव और भूषण खुलकर पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से असहमति जता रहे थे। हालांकि केजरीवाल ने भी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक पद से इस्तीफे का प्रस्ताव रखा लेकिन इसे सर्वसम्मति से खारिज कर दिया गया।Aam Aadmi Party candidate Yogendra Yadav

इसके साथ ही आम आदमी पार्टी में जारी गतिरोध फिलहाल खत्म हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि कलह की पूरी कहानी खत्म हो गई है। भूषण और यादव पर पॉलिटिकल अफेयर कमिटी (पीएसी) से हटाने का फैसला सर्वसम्मति से नहीं हुआ है। आठ लोगों ने इन दोनों नेताओं को कमिटी में बनाए रखने के पक्ष में मतदान किया और 11 लोगों ने इन्हें कमिटी से निकालने के पक्ष में। इससे साबित होता है कि आप की पीएसी में कई ऐसे लोग हैं जो भूषण और यादव की चिंताओं से सहमति रखते हैं।

संभवतः खराब सेहत के कारण केजरीवाल ने इस मीटिंग से खुद को दूर रखा। इसके साथ ही केजरीवाल ने इस मीटिंग में शामिल न होकर एक संदेश देने की कोशिश है कि उनका इस कलह से कोई लेना देना नहीं है और उनके लिए सभी एक समान हैं। केजरीवाल ने खुद को भूषण और यादव की तरफ से उठाए गए मुद्दों में उलझने नहीं दिया। यहां तक की पिछली रात इन दोनों ने एक साथ या अलग-अलग केजरीवाल से मिलकर समस्या को खत्म करने की कोशिश की लेकिन इन्हें कोई तवज्जो नहीं मिली। बुधवार सुबह केजरीवाल ने पार्टी के बीच साफ कर दिया था कि वह राष्ट्रीय संयोजक के पद पर तभी कायम रहेंगे जब यादव और भूषण की पीएसी से छुट्टी की जाती है।

बुधवार को पीएसी की मीटिंग से पहले केजरीवाल और इन दोनों नेताओं के बीच सुलह की गंभीर कोशिश की गई। कई विकल्पों पर विचार किया गया जिसमें इन दोनों से माफी मंगवाने का भी प्रस्ताव था। आप के सीनियर नेता चाहते थे कि इस विवाद में पार्टी की एकता प्रभावित न हो। हालांकि जब पार्टी के नेता केजरीवाल के पास पहुंचे तो उन्होंने दो टूक कहा कि इन दोनों को पीएसी से निकाला जाए। केजरीवाल का तेवर आम आदमी पार्टी में सत्ता की राजनीति में वर्चस्व का यह एक संकेत है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी के भीतर ज्यादातर लोग इस बात को मानते हैं कि यादव और भूषण ने जिन मुद्दों को उठाया है वे अहम हैं और इन पर सोचने की जरूरत है। यादव और भूषण के सवालों से पीएसी पूरी तरह से असहज स्थिति में थी।

मीटिंग में भूषण और यादव ने पीएसी में नए लोगों को शामिल कर पुनर्गठन की सलाह दी लेकिन केजरीवाल के वफादारों ने इसका विरोध किया। केजरीवाल समर्थकों ने इन दोनों को पीएसपी से हटाने का प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के पास गया। इसके बाद प्रस्ताव पर वोटिंग हुई। भूषण और यादव इस वोटिंग में 11-8 से हार गए। दिलचस्प यह है कि कुछ सीनियर आप नेताओं में जैसे- प्रफेसर आनंद कुमार, अजित झा और राकेश सिन्हा ने इन्हें हटाने के खिलाफ वोट किया। दूसरी तरफ मुंबई के मयंक गांधी और कोषाध्याक्ष कृष्णकांत सेवादा ने खुद को वोटिंग से अलग रखा।

सूत्रों का कहना है कि इस प्रस्ताव को केजरीवाल का समर्थन हासिल था। इसलिए बिना किसी डर के इस मामले में ओपन वोटिंग की प्रक्रिया अपनाई गई। योगेंद्र यादव को पार्टी के चीफ प्रवक्ता पद से भी हटा दिया गया। केजरीवाल समर्थकों ने 6 घंटे तक चली इस मीटिंग में यादव और भूषण की दिल्ली इलेक्शन टीम में भरोसा नहीं जताने के लिए आलोचना की। इन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि इन दोनों नेताओं के अविश्वास के बावजूद आप को दिल्ली चुनाव में जबर्दस्त जीत मिली। इस बैठक में केजरीवाल समर्थकों ने भूषण और यादव की खूब आलोचना की। भूषण और यादव ने भी अपने नोट में इंटरनल एथिक्स कमिटी की जरूरत पर जोर दिया।

आप के एक सीनियर नेता ने कहा, ‘पार्टी के भीतर दो ग्रुपों में भरोसे में भारी कमी आई है। दोनों गुटों के बीच इस खाई को पाटने में वक्त लगेगा। पिछले कुछ दिनों में पार्टी के भीतर से एक दूसरे के बारे में बहुत कुछ कहा गया। सभी ने एक दूसरे पर तोहमत लगाए।’ भूषण और यादव की पीएसी से छुट्टी की घोषणा कुमार विश्वास ने की। उन्होंने कहा कि इन दोनों नेताओं को पीएसी से मुक्त कर दिया गया है और इन्हें नई जिम्मेदारी दी जाएगी। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि नई जिम्मेदारी किस तरह की होगी। कुमार विश्वास ने कहा कि निजी राय और आपसी मतभेद को पार्टी की एकता में आड़े नहीं आने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि हम जनता से किए वादों को पूरा करेंगे और उसके भरोसे को किसी कीमत पर नहीं तोड़ेंगे।

पीएसी से यादव और भूषण को निकालने के बाद साफ संदेश गया है कि आम आदमी पार्टी में केजरीवाल से ऊपर कोई नहीं है। केजरीवाल कैंप ने इसे साफ जता दिया है कि यहां किसी और का प्रभुत्व नहीं चलेगा। इसके बावजूद यादव और भूषण पार्टी नहीं छोड़ना चाहेंगे। वे इन मुद्दों को आप के नैशनल काउंसिल, ऑल इंडिया बॉडी ऑफ लीडर्स, सदस्यों और कार्यकर्ताओं के सामने उठाएंगे। इन सभी के साथ बैठकें इस महीने के अंत में हैं। सूत्रों का कहना है कि इन दोनों की यहां अच्छी पैठ है। मीटिंग के बाद भूषण ने कहा, ‘बहुमत से यह फैसला लिया गया कि हमलोग अब पीएसी में नहीं रहेंगे। हम उम्मीद करते हैं कि पार्टी लाखों जनता को पारदर्शिता, जवाबदेही, पार्टी के भीतर लोकतंत्र के मुद्दों पर निराश नहीं करेगी।’ इस मीटिंग के बाद यादव ने कहा, ‘मैं एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह पार्टी के लिए काम करता रहूंगा। पार्टी को हजारों समर्थकों ने खून और पसीने से खड़ा किया है और इनके भरोसे के साथ हम धोखा नहीं कर सकते।’

(नभाटा)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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