असहनीय मानसिक पीड़ा के दौर से गुजर रहे हैं जनसंचार के शोधार्थी..

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माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय संचार एवं पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्य प्रदेश का स्टूडेंट फोरम के एक मेल के अनुसार वहां पीएचडी छात्रों के साथ हो रहे व्यवहार के चलते जनसंचार के शोधार्थी भीषण मानसिक पीड़ा झेलने को अभिशिप्त हैं.mcu_logo

गौरतलब है कि वर्ष 2011 में पीएच. डी. के लिए शोधार्थियों से आवेदन पत्र आमंत्रित करवाये गए थे. 29 जनवरी 2012 को पीएचडी प्रवेश परीक्षा आयोजित की गई थी. 13 फरवरी 2013 से कोर्स वर्क प्रारंभ किया गया. किन्तु 2015 आने के बावजूद विश्वविद्यालय द्वारा अभी तक 2012-13 के शोधार्थीयों को शोध के लिए विषय निश्चित नहीं किया गया है जबकि शोधार्थी इसके लिए तैयार हैं.

शोधार्थी नियमित तौर पर कुलपति से पूछताछ करते हैं किन्तु उन्हें किसी प्रकार का संतोषप्रद उत्तर मिलने के स्थान पर उन्हें सरकारी नियमों का हवाला देकर वापिस कर दिया जाता है. इस लेट-लतीफी के चलते इन शोधार्थियों का न न केवल बहुमूल्य समय ही जाया हो रहा है बल्कि भविष्य भी अधरझूल में जा अटका है.

इन शोधार्थियों ने स्टूडेंट फोरम ऑफ एमसीयू के ज़रिये कुछ प्रश्न तथा संभावना खड़े किये है कि:

1. कुलपति श्री बृजकिशोर कुठियाला को यह विषय ज्ञात होने के बावजूद भी इस विषय का संज्ञान क्यों नहीं लिया जा रहा है?

2. पीएचडी में हो रही देरी के लिए प्रमुख रूप से कौन जिम्मेदार है?

3. जिन शोधार्थियों के अकादमिक करियर में गेप आया है उसका जिम्मेदार कौन है?

4. जिन शोधार्थीयों ने शोध के विषय जनसंचार विभाग में जमा करा दिये हैं उन्हें विषय क्यों नहीं दिया जा रहा है?

5. मानसिक पीड़ा से यदि कोई शोधार्थी स्वयं की क्षति करता है तो विश्वविद्यालय में कौन जिम्मेदार होगा?

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